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हाय रे ये बेटियाँ

अभी- अभी २९ मार्च को मेरा जन्म दिन था। अब आजकल जन्म दिन १२ बजे रात को ही मना लिया जता है। सो २८ की रात को जब मैं एक नाटक देखकर घर लौटी तो कोशी केक लेकर मेरा इंतज़ार कर रही थी। ने खाना नही खाया था। १२ बजे, केक कटा, हैप्पी बर्थ दे का अंतर्राष्ट्रीय गान हुआ। दूसरे दिन कोशी ने मुझे बरा प्यारा सा गले और कान का सेट भेंट किया। आज इसे पहन कर दफ्तर आई हूँ और सभी इसकी बड़ी तारीफ़ कर रहे हैं। मुझे भी बताने में बहुत अच्छा लग रहा है कि इसे मेरी बेटी ने प्रेजेंट किया है। २९ को फ़िर भी मैं बेचैन थी। तोषी का फोन नही आया था। जन्म दिन था न सो मैं भी बच्ची बन गई थी। अपनी ही बच्ची कि बच्ची। सो अपने अभिमान में थी कि फोन तो उसे करना चाहिए। आशंका भी हो रही थी कि कहीं वह भूल तो नहीं गई मेरा जन्म दिन। आख़िर मेरा जन्म दिन मनाने की आदत उसी ने तो डाली है। अब वही भूल गई? कि ११ बजे के करिओब उसका फोन आया। और मेरा जन्म दिन पूरा हुआ। बेटियों के बिना कुछ भी पूरा कहाँ लगता है। याद आता है, टैब मैं अपनी माँ की बेटी थी। हिन्दी फिल्मों मी खूब जन दिन मनाते देखती थी, सो हमने भी अपना जन्म दिन मनाने की ठानी। टैब केक का कॉन्सेप्ट कहां था छोटी सी जगह में॥ सो जनाब, हमने हलुआ बनाया, उसे ही केक की तरह सजाया, उस पर घर में जलाईई जानेवाली मोमबत्ती जलाई और उसे ही बुझा दी। किसी ने जन्म दिन का अंतर्राष्ट्रीय गान नहीं गाया। (किसी को आता ही नही था। मुझे पता था, पर मैं ख़ुद अपने लिए कैसे गाती? ) माँ ने मुझे एक रुपया दिया। आज जन्म दिन पर मान की और उस एक रुपये की बहुत याद आती है। बाद में अपनी दीदी के जम दिन पर भी वही हलुए वाला केक बनाया। मैंने उसे एक अठन्नी दी। वह रुपया और वह अठन्नी नहीं भूलती। आज के समय में तो और भी याद आती है। और कितना अच्छा लगता है, बेटी बन जाना। बेटियों की तरह जीना। आज माँ होती तो और भी अच्छा लगता। है ना?

तोषी और बिरियानी

तोषी टैब बहुत छोटी थी। मैंने नौंन वेज खाना शुरू ही किया था। बनाना आता नहीं था। आज भी बनने के नाम पर कंपकंपी छूट जाती है। तोषी टैब दूसरी या तीसरी क्लास में थी। मैंने उसके लिए चिकन बिरियानी बनी। पहली बार। परोसा। वह खाने लगी। वह खा रही थी और मैं उसे इस उम्मीद में देखे जा रही थी कि अब वह इसके बारे में कुछ बोलेगी। जब काफी देर हो चुकी और उसने दूसरी बार परोसन लेकर भी खाना शुरू कर दिया, लेकिन कुछ कहा नहीं, टैब मुझसे रहा नहीं गया। बड़ी आतुरता और उम्मिओद से भरकर मैंने पूछ, "बेटू, बिरियानी कैसी बनी है?" उसने एक बार बिरियानी को देखा, फ़िर मुझे, फ़िर बिरियानी को और फ़िर से मुझे। इसके बाद बड़ी गंभीरता से बोली- "हाँ, ठीक ही बना है। दो=चार बार और बनाने लगोगी तो अच्छा बनाने लग जाओगी। " आज थोडा थिक-ठाक ही बना लेती हूँबिरियानी, मगर जब कभी कोई प्रसंग आता है, ख़ास तौर से बिरियानी का, तो यह बात याद आती ही है। अब तो और

भी, जब वह लाहौर में है, बहुत अच्छा खाना बनाती है, दीवाली में उसने अपने दोस्तों के लिए ८० लड्डू बनाये तो एक दिन ३० लोगों के लिए दोसा सांभर चटनी बनाई। अभी होली में उसने अपने सभी दोस्तों के साथ न केवल होली खेली, बल्कि ४० लोगों को खाना बनाकर खिलाया। ५ किलो matan बनाया और रस पुए, दही बड़ी और जो सब उसने मुझे होली पर बनते देख हाय, वह सब कुछ। इतना स्वादिष्ट खाना बनाती है कि आप उंगलियाँ चाटते रह जाएं। मैंने तो उसे कह दुसे कह भी दिया कि उसकी शादी में मैं खाना बनाने valii नहीं रखने वाली।

ताज़‍िल गोलमई बाप, शाज़‍िलु बेटी

  
ताज़‍िल गोलमई एक समय एनडीटीवी इंडिया के क्राइम टाइम एंकर थे। प्राइम टाइम एंकर से ज्यादा लोग उन्‍हें जानते रहे हैं। आज कल आधी रात के बुलेटिन्‍स पढ़ते हैं। रिपोर्टर तो ख़ैर कमाल के हैं ही, किस्‍सागो भी लाजवाब हैं। ख़बर का कारोबार ख़त्‍म करके ताज़‍िल के साथ बातचीत में कैसे रात बीत जाती है, पता नहीं चलता। तस्‍वीर में न्‍यूज़ रूम के बीच में वे रंगदारी दिखा रहे हैं। इस छवि को अपने मोबाइल कैमरे में उतारा है क्राइम रिपोर्टर मुकेश सिंह सेंगर ने। वैसे छवि गोलमई ताज़‍िल की बीवी का नाम है। लेकिन यहां ताज़‍िल के साथ जो तस्‍वीर है, वो शाज़‍िलु की है। शाज़‍िलु ताज़‍िल की बेटी है। अदाओं के मामले में ताज़ि‍ल को पीछे छोड़ती शाज़‍िलु की ये छवि ख़ास तौर पर बेटियों के ब्‍लॉग के लिए हमने उड़ायी है।