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मुझे लोहार के घर ब्‍याहना!

प्रसून आम तौर पर गीत लिखते हैं, विज्ञापनों के लिए कैचवर्ड लिखते हैं और मीडिया-सिनेमा पर भाषा की बहसों में हिस्‍सा लेते हैं। एनडीटीवी इमैजिन के धूम मचा दे कार्यक्रम में वो ज्‍यूरी मेंबरानों में से हैं। एक दिन धूम मचा दे के मंच पर उन्‍हें माइक थमा दी गयी। उन्‍होंने एक गीत सुनाया। यह लोगों के लिए प्रसून का पहला स्‍टेज परफॉरमेंस था। गीत में बेटी पिता से कहती है - मुझे राजा के घर मत ब्‍याहना, राज-काज मैं कुछ भी नहीं जानती। मुझे सोनार के घर मत ब्‍याहना, गहने-ज़ेवर मुझे पसंद नहीं। मुझे लोहार के घर ब्‍याहना ताकि वो मेरी ज़ंजीरें काट सके। मुझे मेरी सहयोगी गरिमा ने इस गीत के बारे में बताया और फिर कई साथियों ने कहा कि इसे बेटियों के ब्‍लॉग पर डालो। मैं उन सबका आभारी हूं, जिन्‍होंने प्रसून जोशी के गाये गीत को आप सबसे और अपनी बेटियों से साझा करने के लिए उत्‍साहित किया।

बोर हो रही हूँ....

मुझे याद है वो दिन जब पहली बार पंचमी को हमने अपने से अलग किया था, जब उसका नाम स्कूल में दर्ज़ किया गया था...और पंचमी अपने नये यूनीफ़ार्म,नये स्कूल बैग,नये पानी की बोतल,और नये टिफ़िन बॉक्स के साथ स्कूल गई थी हम भी थे उसका हौसला बढ़ाने वालों में ...पहले दिन सारे मम्मी पापा अपने बच्चों के साथ स्कूल पहँचे थे..स्कूल की टीचरें उन बच्चों के साथ कुछ गाने वाने गा रहीं थी और खेलते कूदते मन बहलाते हुए हमारी बिटिया को हमसे दूर ले जा रही थी......तनुजा(मेरी पत्नी) की तो आँख भर आई थी...उसका मन रो रहा था,चेहरा देखकर लग रहा था कि अपनी भावनाओं को दबाने की कोशिश कर रही है...यही हाल कमोबेश वहाँ सभी माँ बाप का था, खासकर जितनी मम्मियाँ थीं सबके सब रोये जा रही थी .... साड़ी के पल्लू या रूमाल से अपने चेहरे को छुपाने की कोशिश भी कर रहीं थी..मैं भी कुछ पल के लिये भावुक हो गया था और ऐसे मौके पर हमारी बिटिया पंचमी हमें छोड़ते हुए एक्दम रो नहीं रही थी उलटा वो खुश थी,उसे नये दोस्त,नई टीचरों के बीच अच्छा लग रहा था, बहुत खुश थी पंचमी....और हम सोचे जा रहे थे कि नये महौल में पंचमी रह तो लेगी? हमें कुछ देर छोड़ने पर उदास तो नहीं हो जाएगी...रोने तो नहीं लगेगी....हम तो अभी यही सोच रहे थे........ये सब देखकर मैं अपनी स्कूली यादों में खो गया,अपने स्कूल की खुशबू आज भी मेरी सांसों मे रची बसी है... .....जब मैं छोटा था तो अपने बड़े भाई की क्लास से अक्सर ढूंढ्कर मुझे मेरे क्लास में पहुँचाया जाता था........थोड़ा और बड़ा हुआ तो अक्सर मेरा बड़ा भाई मेरी क्लास में मुझे देखने चला आता था....मैं पूछता "क्यौ आये हो" तो बताता कि "मैं देखने आया था कि कोई तुम्हें परेशान तो नहीं कर रहा?" ......पर यहाँ तो पंचमी का कोई बड़ा भाई या बहन भी तो नही है..... हमने तो अपने दिन हँसते खेलते गुज़ार दिये...पर अपनी बेटी पंचमी को अपनी क्लास में जाते हम पहली बार देख रहे थे, .... अब अपने स्कूल की वजह से पंचमी हमसे अलग होने वाली थी...अरे कुछ समय के लिये लिये ही सही...स्कूल के बाद तो हम उसे घर तो ले ही आएंगे...फिर भी उसका स्कूल में एडमिशन हमारी ज़िन्दगी में एक महत्वपूर्ण घटना तो थी ही...पढ़ते बढ़ते क्लास दर क्लास अब वो छ्ठी में पहुँच गई...और अभी उसकी छ्ठी की परीक्षा समाप्त हुई है,और उसकी छुट्टियाँ चल रही हैं,मैं तो अपनी ऑफ़िस के कार्यकलापों की वजह से पंचमी को ज़्यादा समय दे ही नहीं पाता.....सारा बोझ पत्नी को झेलना पड़ा... पंचमी की परीक्षा हो और तनाव तनुजा को हो, पंचमी को पढ़ते देख और रटते देख मुझे उस दया आती है......सोचता... मैने ही पढ़ के क्या कर लिया?...पंचमी को देखकर ये साफ़ लग जाता है कि पढ़ाई में उसे मज़ा बिल्कुल नहीं मिल रहा .. पर इधर मैने एक नई बात नोट की पंचमी के बारे में "मैं बोर हो रही हूँ"...उसका तकिया कलाम होता जा रहा है।

पंचमी गोआ के रास्ते में कहीं

बोर हो रही हूँ...पता नहीं ये शब्द मेरी बेटी पंचमी के हैं या इस उम्र के सारे बच्चों का?....आजकल के बच्चे कार्टून नेटवर्क,पोगो या किसी चैनल पर चल रहे रीयलिटी शो,या घर में चल रही कोई भी फ़िल्म में तो बोर नहीं होते, ..पर इससे लग किसी भी जगह वो बोर होते हैं......इतवार को पंचमी की साईकिल, जिसकी हवा काफ़ी दिनों से निकली हुई थी...ठीक करवाया..थोड़ी देर चलाने के बाद फिर वही "बोर हो रही हूँ"........आखिर पूरे घर में एक ही तो बेटी है ...पर उसकी बोरियत को मैं कम से कम दूर नहीं कर पा रहा...असहाय महसूस कर रहा हूँ...



पंचमी
मेरे एक मित्र हैं परमानन्द मिश्र... वो हमेशा कहते हैं .... "बिमल बाबू एक और कै लेते तो का हुई जात?पंचमी पर कितना अन्याय कर रहे हैं आप लोग,अगर घर में अकेली रहेगी तो बोर तो होवे करेगी?..... आप कुछ नहीं कर सकतेअरे उसके साथ भी कोई खेलने वाला/वाली चाहिये?अब मिश्रा जी को क्या बताएं कि पंचमी का खिलौना तो अब हम ला भी नहीं सकते....ये हमारा फ़ैसला है..


तो मिश्राजी कहते हैं कि "कल को आपको कुछ हो हवा गया तो वो काम लड़की थोड़े ही करेगी"....मैने कहा तब की तब देखेंगे, पर अभी क्या किया जाय.....पंचमी की परीक्षा खत्म होते ही हम घूमने गोआ गए थे....कुछ समय मस्ती में काट कर हम वापस मुम्बई आ गए और फिर से पंचमी का...स्थाई स्वर "मैं बोर हो रही हूँ" सुन कर बड़ा अजीब सा लगता है..


पंचमी की कटहल के साथ एक तस्वीर

पंचमी भी तेज़ी से बढ़ रही हैं,खेलना,डांस करना ज़्यादा पसन्द है उसे.....पर अब एक मई को रिज़ल्ट आने वाला है....उसे तो धुकधुकी भी नहीं हो रही कि रिज़ल्ट आने वाला है..और हम माँ बाप उसके रिज़ल्ट को लेकर परेशान हैं....कैसे नम्बर आएंगे? रिज़ल्ट देने वाले दिन ,स्कूल में अभिभावकों को बुलाकर हाथ में रिज़ल्ट दिया जाता है,वहाँ ये बताया जाता है कि बच्चा कहां कहां कमज़ोर है....किन बातों का ध्यान रखें....पता नहीं बड़ी होकर क्या करेगी पंचमी....पर हम जो बड़े हो गये हैं उनका तो जीना दूभर हो गया है.... हमने तो कभी सोचा नहीं कि बड़े होकर क्या करेंगे? तो पंचमी के बारे में इतनी चिन्ता करने की क्या ज़रूरत है?

बिटिया के बाप होने की चिन्ता....

जब तक मैं बेटी का बाप नहीं बना था,मैं किसी का बेटा भर था,अपनी ज़िन्दगी में मैने खूब घुमाई की ,खूब मस्ती की और संघर्ष भी खूब रहा खैर वो तो अब भी है ,बेटी के बाप बनने से पहले किसी प्रेमी जोड़े को कही छुपकर मिलते देखता या किसी झुरमुठ में बैठे देखता तो मेरे मन में आता कि जो भी प्यार करने वाले हैं उन्हें तो मिला ही देना चाहिये...मैं भी उन्हें कनखियों से देखकर उनके मज़े से थोड़ा मज़ा चुरा लेना चाहता था..पर बेटी के बाप बनते ही सारा नज़रिया बदल सा गया,अब तो हाल ये है कि जब किसी एकदम युवा जोड़े को कहीं गलबहियाँ डाले देखता हूँ तो मेरे अंदर कुछ अलग ही विचार आते है....... जैसे "ये लड़का तो लफ़ूट लग रहा है, कैसे लड़के को चुना है इस बच्ची ने" मन में आता है कि जाकर बता दूँ बच्ची के माँ बाप को, कि बिटिया को सम्भालिये, उसके साथ भी खेला कीजिये, उसके साथ भी कुछ समय गुज़ारिये,उससे भी बात कीजिये नहीं तो ये घूमती रहेगी चिर्कुटों के साथ और उसके साथ रहते रहते उसी चिर्कुट की तरह हो जाएगी... और आप हाथ मलते रह जाएंगे।


अब अगर मेरी बेटी रात को खेल कर समय से वापस नहीं आती तो चिंतित बाप पहुँच जाता है उसके खेलने की जगह और वहाँ वह देखना चाहता है कि बिटिया कैसे बच्चों के साथ खेल रही है, और आँख फ़ाड़ फ़ाड कर उन सबको अच्छी तरह देखता है....अगर उन दोस्तों में लड़के हैं तो देख कर एक्सरे करके पूरी तरह निश्चिंत हो जाना चाहता है कि बेटी जिन बच्चों के साथ खेल रही है वहाँ सब कुछ ठीक तो है, पर मन है कि हमेशा बिटिया को लेकर शशंकित सा बना रहता है।


जब बिटिया चाव से टीवी से सटकर किसी चैनल पर कोई हाना मोन्टेना का शो देख रही हो या हाई स्कूल म्यूज़िकल जैसा कोई विदेशी सीरियल देख रही हो तो ये बाप उसकी तल्लीनता में बिना बाधा पहुँचाए अपनी तरफ़ से उस सीरियल की जाँच पड़ताल मे जुट जाता है कि आखिर क्या बात है इन सीरियलों में जो खाना वाना छोड़कर इतनी तल्लीनता से देखती रहती है बिटिया? वो कार्टून आदि देखे,बच्चों को इस उम्र में जो करना है वो सब करे,हमारे सामने हमेशा बच्ची बनी रहे पर इन सब के बावजूद हमेशा डर सा बना रहता है कि बिटिया समय से पहले बड़ी तो नहीं हो रही है ?


जो एक बात मुझे निजी तौर पर लगती है कि हम बिटिया के बाप लोग भले ही बड़ी बड़ी बाते करें, अपने और बिटिया के सम्बन्धों को लेकर शायद एक आदर्श स्थिति बयां करते रहें कि घर में बिटिया को लेकर महौल बड़ा हंसी खुशी का बना रहता है,पर इन सब के बावजूद... एक बात जो मेरे मन में स्थाई भाव सा बना रहता है कि क्या हम बिटिया के बाप-माँ कुछ ज़्यादा ही शंकालु तो नहीं हो हो गये हैं कि शायद ये स्थिति सिर्फ़ और सिर्फ़ हमारे साथ ही है या दुनिया के सारे माँ बाप कुछ ज़्यादा प्रगतिशील हैं? कि शायद हमारे मन में ही पिछड़ापन पसरा हुआ है, या कि हमारे अंदर अभी भी सामंती अवशेष हैं जिनकी वजह से हमारी सोच ऐसी हो गई है.......पता नहीं ये कुंठा है या किसी प्रकार की शंका? कि बेटी का बाप होना और बेटे का बाप होना क्या दो अलग अलग बाते हैं?