जानवरों ने सभा बुलाई
चलो करेंगे पिकनिक भाई
हल्ला गुल्ला शोर करेंगे
आएंगे दीदी,चाचा ताई
सभी जानवर मस्त हो गए
पिकनिक की तैयारी में
बन्दर सूट पहन कर आया
और बंदरिया साड़ी में
हाथी आये, भालू आये
अपने साथ वे आलू लाये
आलू छोटे और बडे थे
शेर हिरन भी वहाँ खडे थे
बड़े जोर की भूख लगी थी
पर जंगल में आग नहीं थी
हाथी भालू सब चकराए
लकड़ी अब कैसे सुलगाएं
बिना आग के खाना कैसे
बिना खेत के दाना कैसे
फिर सब ने एक जुगत लगाई
गांव से लाओ दियासलाई
गांव भला अब जाये कौन
फंसने का खतरा उठाये कौन
गांव के आदमी बड़े दुष्ट हैं
जानवरों से बड़े रुष्ट हैं
इतने में आया खरगोश
छोटा था, पर बड़ा था जोश
बोला, गांव मैं जाऊंगा
और आग भी लाऊंगा
आई आग और उबले आलू
छक कर खाए बगुला भालू
पिकनिक में सब नाचे गाये
जंगल में खुशहाली लाये
जंगल में पिकनिक
यह तुकबंदी मैंने तोषी के लिए की थी। उस समय वह दूसरी कक्षा में थी और उसे कोई कविता स्कूल में सुनानी थी। मुझे भी आश्चर्य होता है कि मैंने उसके बाद या पहले कोई तुकबंदी कैसे नहीं की।
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तोषी
एक बेटी की डायरी
अविनाश जी
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क्या बेटियां परायी होती हैं?
मेरी शादी के आठ साल के दौरान दूसरी बार आज मेरे पापा मुझसे मिलने आये थे। पापा से मिली, तो मन हुआ, उनके हाथों को छू लूं। मगर... यह फासला 12 घंटे में भी तय नहीं हो पाया। अभी-अभी वे हरिद्वार के लिए रवाना हो चुके हैं और मेरा मन भरा हुआ है। लगता है अंदर से कुछ बह रहा। क्या बह रहा है? नहीं जानती हूं मैं। मन को खुश करने के लिए यादों को संजो रही हूं।
मेरे पापा टाटा स्टील में इंजीनियर हैं। उनके आंगन में पहले मेरी दीदी उगी। फिर मेरा नंबर आया। मेरे जन्म के ठीक सात साल बाद घर के आंगन में फिर से एक बेटी उग आयी। मेरी छोटी बहन के जन्म पर मेरे पापा ने पूरे मुहल्ले और रिश्तेदारों के घर यह कह कर मिठाइंयां बांटी कि उन्हें बेटा हुआ। जब रिश्तेदार व पड़ोसी मां के अस्पताल से लौटने पर कथित बेटे को देखने पहुंचे तो वहां बेटी को देखकर खूब हैरान-परेशान हुए। पर, पड़ोसियों व रिश्तेदारों को उल्लू बनाकर मेरे पापा बिंदास खुश थे।
मुझे याद है, जब मेरे पापा ने मुझे बिजनेस करने के लिए पांच लाख रुपये दे दिये। बिजनेस नहीं चला। पर, मेरे पापा ने इसके लिए मुझे कोई ताना नहीं दिया। मैंने जब अपने पसंद के लड़के से शादी की बात बतायी, तो भी उनकी हां मेरे हिस्से में आया।
याद करतीं हूं कि हरेक रविवार को कैसे मेरे पापा नाखून काट दिया करते थे। दूऱ घुमाने ले जाते और आते वक्त मैं उनकी पीठ पर सो जाती थी। मगर, आज मैं इतनी बड़ी हो गयी हूं कि उनका हाथ बढ़ कर छू नहीं पायी। पापा भी मेरी भावनाएं समझ नहीं पाये। पैर छूने के लिए झुकी, तो दूर हटकर आशीर्वाद दे दिया। लेकिन मुझे गले से नहीं लगाया। क्या बेटियां सचमुच परायी होती है?
एक बेटी हूं और एक बेटी की मां भी। कल रात मैंने बेटियों के ब्लॉग में थोड़ी सी जगह मांगी थी। आशा थी कि जगह मिल जाएगी। ब्लाग देखा, तो मेरी पोस्ट नहीं थी। थोड़ी निराशा हुई है। लगता है, शायद आपको मेरा मेल नहीं मिला है। इसलिए मेल फिर से भेज रही हूं।पुनीता कुमारी
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क्या बेटियां परायी होती हैं?
मेरी शादी के आठ साल के दौरान दूसरी बार आज मेरे पापा मुझसे मिलने आये थे। पापा से मिली, तो मन हुआ, उनके हाथों को छू लूं। मगर... यह फासला 12 घंटे में भी तय नहीं हो पाया। अभी-अभी वे हरिद्वार के लिए रवाना हो चुके हैं और मेरा मन भरा हुआ है। लगता है अंदर से कुछ बह रहा। क्या बह रहा है? नहीं जानती हूं मैं। मन को खुश करने के लिए यादों को संजो रही हूं।
मेरे पापा टाटा स्टील में इंजीनियर हैं। उनके आंगन में पहले मेरी दीदी उगी। फिर मेरा नंबर आया। मेरे जन्म के ठीक सात साल बाद घर के आंगन में फिर से एक बेटी उग आयी। मेरी छोटी बहन के जन्म पर मेरे पापा ने पूरे मुहल्ले और रिश्तेदारों के घर यह कह कर मिठाइंयां बांटी कि उन्हें बेटा हुआ। जब रिश्तेदार व पड़ोसी मां के अस्पताल से लौटने पर कथित बेटे को देखने पहुंचे तो वहां बेटी को देखकर खूब हैरान-परेशान हुए। पर, पड़ोसियों व रिश्तेदारों को उल्लू बनाकर मेरे पापा बिंदास खुश थे।
मुझे याद है, जब मेरे पापा ने मुझे बिजनेस करने के लिए पांच लाख रुपये दे दिये। बिजनेस नहीं चला। पर, मेरे पापा ने इसके लिए मुझे कोई ताना नहीं दिया। मैंने जब अपने पसंद के लड़के से शादी की बात बतायी, तो भी उनकी हां मेरे हिस्से में आया।
याद करतीं हूं कि हरेक रविवार को कैसे मेरे पापा नाखून काट दिया करते थे। दूऱ घुमाने ले जाते और आते वक्त मैं उनकी पीठ पर सो जाती थी। मगर, आज मैं इतनी बड़ी हो गयी हूं कि उनका हाथ बढ़ कर छू नहीं पायी। पापा भी मेरी भावनाएं समझ नहीं पाये। पैर छूने के लिए झुकी, तो दूर हटकर आशीर्वाद दे दिया। लेकिन मुझे गले से नहीं लगाया। क्या बेटियां सचमुच परायी होती है?
लो भी हम भी आ गए...
अविनाश! निमंत्रण देने का धन्यवाद। बहुत ही अच्छे विषय पर ब्लॉग बनाया है। मेरा एक सुझाव है, फ़्लिकर पर एक ग्रुप शुरु कर दिया जाएं, जहाँ पर बेटियों के कार्यकलापों पर फोटो,ड्राइंग्स वगैरहा शेयर किए जा सकें।
लो जी, हम भी आ ही गए, बेटियो वाले ब्लॉग पर। मेरी भी प्यारी प्यारी दो बेटिया है, दिव्या(उम्र १४ साल) और रीत (उम्र सात साल), बड़ी वाली थोड़ी धीर गंभीर है और छोटी वाली ज्यादा चुलबुली। वो शायद इसलिए है कि बड़ी वाली काफी समय हमारे बड़े भाईसाहब के यहाँ ज्यादा समय पली बढी है। खैर...इस बारे में फिर कभी।
बेटा हो या बेटी, हमने कभी फर्क नही समझा। हमने उसको उसी तरह पाला पोसा है जिस तरह से लड़कों को पाला पोसा जाता है। यही कारण है कि मेरी छोटी बेटी जहाँ नृत्य संगीत मे रुचि रखती है, उतनी ही बाक्सिंग/कराटे/ताइक्वांडो मे भी। हालांकि इसके इस शौंक का अक्सर शिकार मै ही बनता हूँ। अब समाज मे भी धारणाए काफी कुछ बदल चुकी है, लेकिन अभी भी गांवो/छोटे शहरों मे बेटो को बेटियों से अधिक महत्व दिया जाता है। मेरे विचार से इसके सामाजिक/आर्थिक कारण भी रहे होंगे। भारत एक कृषि प्रधान देश है, लगभग एक तिहाई लोग खेती पर निर्भर है। खेती करना मूलत: मेहनत वाला काम होता है, इसलिए लोग अक्सर परिवार को चलाने के लिए लड़के को प्राथमिकता देते थे। इसका एक बड़ा कारण अशिक्षा भी था। लेकिन आज शिक्षा के प्रसार और समान अवसरों के चलते लोग अपनी धारणाएं बदलने लगे है। लेकिन अभी समय लगेगा। कम से कम पढे लिखे लोग अपनी विचारधारा मे बदलाव लाएं, यही सबसे बड़ी बात होगी।
आप लोगो से सम्पर्क बना रहेगा, आज जानबूझ छोटी सी पोस्ट लिखी है, ताकि आगे की पोस्ट के लिए कुछ मसाला बचा कर रख सकूं।
लो जी, हम भी आ ही गए, बेटियो वाले ब्लॉग पर। मेरी भी प्यारी प्यारी दो बेटिया है, दिव्या(उम्र १४ साल) और रीत (उम्र सात साल), बड़ी वाली थोड़ी धीर गंभीर है और छोटी वाली ज्यादा चुलबुली। वो शायद इसलिए है कि बड़ी वाली काफी समय हमारे बड़े भाईसाहब के यहाँ ज्यादा समय पली बढी है। खैर...इस बारे में फिर कभी।
बेटा हो या बेटी, हमने कभी फर्क नही समझा। हमने उसको उसी तरह पाला पोसा है जिस तरह से लड़कों को पाला पोसा जाता है। यही कारण है कि मेरी छोटी बेटी जहाँ नृत्य संगीत मे रुचि रखती है, उतनी ही बाक्सिंग/कराटे/ताइक्वांडो मे भी। हालांकि इसके इस शौंक का अक्सर शिकार मै ही बनता हूँ। अब समाज मे भी धारणाए काफी कुछ बदल चुकी है, लेकिन अभी भी गांवो/छोटे शहरों मे बेटो को बेटियों से अधिक महत्व दिया जाता है। मेरे विचार से इसके सामाजिक/आर्थिक कारण भी रहे होंगे। भारत एक कृषि प्रधान देश है, लगभग एक तिहाई लोग खेती पर निर्भर है। खेती करना मूलत: मेहनत वाला काम होता है, इसलिए लोग अक्सर परिवार को चलाने के लिए लड़के को प्राथमिकता देते थे। इसका एक बड़ा कारण अशिक्षा भी था। लेकिन आज शिक्षा के प्रसार और समान अवसरों के चलते लोग अपनी धारणाएं बदलने लगे है। लेकिन अभी समय लगेगा। कम से कम पढे लिखे लोग अपनी विचारधारा मे बदलाव लाएं, यही सबसे बड़ी बात होगी।
आप लोगो से सम्पर्क बना रहेगा, आज जानबूझ छोटी सी पोस्ट लिखी है, ताकि आगे की पोस्ट के लिए कुछ मसाला बचा कर रख सकूं।
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