अनंत तस्‍वीरें दृश्‍यावलियां ख़बर ब्‍लॉग्‍स
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जल्‍दी आओ मेरी लल्‍ली


तोषी (विधा सौम्या) आजकल दिल्ली में है. दिल्ली की ठंढ उसे डरा रही थी. जाने से हिचक रही थी. खूब चाक चुबत हो कर, शॉल, जैकेट, स्वेटर के हथियारों से लैस जब वह दिल्ली पहुंची तो फूला गुब्बारा पिचक गया. मायूस हो गई वह- "अरे, यहां तो ठढ ही नहीं है. दिल्ली के लिए उसने लिखा अपने फेसबुक स्टेटस पर- "दिल्ली- इस मंगल शुरु, अगले मंगल खतम
दिल्ली- तेरी ठंढ में ठिठुरेंगे, नाक, कान, बदन और हम." 
फेसबुक पर स्टेटस है तो कमेंट्स भी आयेंगे. पर सबसे बढिया कमेंट रहा उसके बडे पापा ऋषिकेश सुलभ जी का. कमेंट नहीं, कविता हो गई. यहां है- 

दि‍ल्‍ली-दि‍ल्‍ली बेहि‍स दि‍ल्‍ली.... 
दि‍ल्‍ली हो गई बर्फ़ की सि‍ल्‍ली...
कैसे खेलें डंडा-गि‍ल्‍ली.....
मुम्‍बई है नज़र की झि‍ल्‍ली.....
पलक झपकते नोचे बि‍ल्‍ली.......
द्वार-द्वार पर लगी है कि‍ल्‍ली
पटना आओ मेरी लल्‍ली
हिंया उड़ी न तुम्‍हरी खि‍ल्‍ली
देखे तुमको बरस हुए
जल्‍दी आओ मेरी लल्‍ली
राज़ की बात बताएं तुमको
ठंडी हो रही चि‍कन-चि‍ल्‍ली
आओ-आओ मेरी लल्‍ली

दो- दो कुलों की लाज को ढोती हैं बेटियाँ

कल (२६ जनवरी २०१०) पुरानी फाइलों में दबी एक चीज़ मिली लैमिनेटेड की हुई. वह कोई प्रमाणपत्र या रसीद नहीं थी बल्कि एक कविता थी. ज़ोर देने पर याद आया कि जब मैं प्लस चैनल के जुहू तारा रोड वाले ऑफिस में काम करता था तब वह मुझे एक फिल्म वितरक मित्र राणा साहब ने दी थी. कविता पढ़ी तो बड़ी मार्मिक लगी थी और उसे मैंने संभाल कर रख लिया था. अफसोस की बात है कि इसमें कवि का नाम नहीं है बल्कि संकलनकर्ता के नाम पर किन्हीं रामगोपाल बंसल जी का नाम है जो नीमच के रहने वाले हैं. यदि पाठकों को कवि का नाम मालूम हो तो कृपया टिप्पणी में दर्ज़ कर दें. बहरहाल आप वह कविता पढ़िए-

ओस की एक बूँद-सी होती हैं बेटियाँ
स्पर्श खुरदुरा हो तो रोती हैं बेटियाँ
रौशन करेगा बेटा तो बस एक ही कुल को
दो- दो कुलों की लाज को ढोती हैं बेटियाँ
कोई नहीं है दोस्तो! एक-दूसरे से कम
हीरा अगर है बेटा, तो मोती हैं बेटियाँ
काँटों की राह पे ये खुद ही चलती रहेंगी
औरों के लिए फूल ही बोती हैं बेटियाँ
विधि का विधान है, यही दुनिया की रस्म है
मुट्ठी में भरे नीर-सी होती है बेटियाँ.

आज मेरी तोषी का जन्म दिन है। यकीन नहीं होता की वह इतनी बड़ी हो गई है। केवल बड़ी ही नहीं, बेहद समझदार भी। उतनी ही संवेदनशील, उतनी ही सबके प्रति फिक्रमंद। अभी उसने अपने अनुभव के वितान को बड़ा करना चाहा है। इसके लिए उसने मुम्बई की एक आर्ट गैलरी ज्वायन की है। उसके अनुभव में इजाफा हो रहा है। अब वह स्वतन्त्र रूप से दुनिया को देखनेसमझाने, पहचानने की कोशिश में है। मुझे पूरा यकीन है की वह अपनी ख़ास जगह बना लेगी और ज़ल्दी ही। उसके जन्म दिन पर उसके लिए एक तोहफा-

जिस दिन तुमको ना देखूं मैं

मन जोर कहीं से कसकता है,

तेरी मुस्काती सूरत से

मन बहुत-बहुत ही हरासता है।

तुम अपनी बातों के गुच्छे से

खुशबू खूब बिखेरती हो

हो गई हो अब तुम बहुत बड़ी

पर फ़िर भी लगता नन्ही हो,

जैसे बरखा की धारा में

बून्दीन कोई मेंही हो

मेरे जीवन की रचना प्रथम

मेरी साँसों का तुम आधार

तुमसे पाई खुशियाँ सब

तुम ही अब जीवन अब संसार

छूटा है बहुत कुछ पाने में

छूटेगा बहुत कुछ पाने में

तुम साथ रहोगी, बनोगी बल

अफसोस न होगा जाने में

उनकी प्रतिमा, मेरी परछाईं

तेरा तो जीवन आगे है

थाम लो सूरज-चन्दा, तारे

बस तेरे लिए सब जागे हैं।

बेटियों की ललाई

बेटियों कि आस्था,

बेटियों पर विश्वास

बनता है एक सहज पुल

अचानक जब बेटी अपनी दहलीज लाँघ पार कर अति है सात दरियाओं का अनंत उद्गार।

बेटियाँ जब होती हैं, मन मलिन कर लेते हैं

पर भर आती हैं आँखे,

जब पार कर लेती हैं वे सूरज की ऊम्चाइयां

बेटी को अब मन नही करता

बोलूँ उसे दुर्गा, सीता, सरस्वती

छोर चुकी है वह अब इन प्रतिमानों को बहुत पीछे

अपने यहाँ एक खली ग्लास है

जिसमे से छलकती है उसकी सूरत

कुछ पहचानी सी

कुछ कुछ अनजानी सी

मन कबतक धरे धीर

बेटियों का आगमन होता रहे जलस्दी ज़ल्दी

भरे वह अपनी हँसी से मान का अंचल,

पिटा का दामन

बहन की मुस्कान

भाई की बने जान

बेतिया अब सगार पुत्र भी नही

वे हैं अनंत आकाश

हर सीमा के आर-पार।

बेटी हमारी

विजयशंकर चतुर्वेदी

मन ही मन हमने फोड़े थे पटाखे
बेटी, दुनिया में तुम्हारे स्वागत के लिए.

पर जीवन था घनघोर
उस पर दाम्पत्य जीवन कठोर.

फिर एक दिन भीड़ में खो गयीं तुम
ले गया तुम्हें कोई लकड़बग्घा
या उठा ले गए भेडिये.
लेकिन तुम हमारी जायी हो
कौन कहता है कि तुम परायी हो!

जब कभी खाता हूँ अच्छा खाना
तो हलक से नहीं उतरता कौर
किसी बच्चे को देता हूँ चाकलेट
तो कलेजा मुंह को आता है.

तुमने किससे मांगे होंगे गुब्बारे
किससे की होगी ज़िद
अपनी पसंदीदा चीजों के लिए
किसकी पीठ पर बैठ कर खिलखिलाई होगी तुम?

तुम्हें हंसते हुए देखे हो गए कई बरस
तुम्हारा वह पहली बार 'जण मण तण' गाना!
पहली बार पैरों पर खड़ा हो जाना!!

जब किसी को भेंट करता हूँ रंगबिरंगे कपड़े
तुम्हारे झबलों की याद आती है
जिनमें लगे होते थे चूं-चूं करते नन्हें खिलौने.

अब कौन झारता होगा तुम्हारी नज़र?
जो तुम्हें अक्सर ही लग जाती थी.
बाद में पता नहीं किसकी लगी ऐसी नज़र
कि पत्थर तक चटक गया.

अब तो बदल गयी होगी तुम्हारी भाँख भी.
हो सकता है मैं तुम्हें न पहचान पाऊँ तुम्हारी बोली से.
लेकिन पहचान जाऊंगा आँख के तिल से
जो तुम्हें मिला है तुम्हारी माँ से.

जब भी कभी मिलूंगा इस दुनिया में
मैं पहचान लूंगा तुम्हारे हाथों से
वे मैंने तुम्हें दिए हैं.

आने दो बेटियों को धरती पर

ये तस्वीर कुसुम की है। कुसुम सुलभ इंटरनेशनल के स्‍कूल में सिलाई-कढ़ाई की छात्रा है। अभी अभी जो रविवार गुज़रा है, हम और रवीश वहां गये थे। सिर पर मैला ढोने वाली औरतों की बदली हुई जिंदगी की कहानी सुनने। और भी कई पत्रकार थे। ज़्यादातर अंग्रेज़ी के। सुलभ की रवायत ये है कि सुबह-सुबह सामूहिक प्रार्थना होती है। प्रार्थना गीत सुलभ के संस्‍थापक बिंदेश्‍वर पाठक ने रचा है, आओ हम मिलजुल के बनाएं सुलभ सुखद संसार। प्रार्थना के बाद सुलभ से जुड़े कर्मियों में से कुछ लोग अपनी रचनाएं सुनाते हैं। कुसुम ने उस दिन ये कविता सुनायी। रवीश ने कहा, ये कविता बेटियों के ब्‍लॉग के लिए प्रासंगिक है। कविता पढने के बाद कुसुम भीड़ में गुम हो गयी - लेकिन रवीश ने उसे ढूंढ़ निकाला। हमने उसकी कविता अपनी डायरी में उतार ली... और वो अब यहां पेश कर रहे हैं।
आने दो बेटियों को धरती पर
मत बजाना थाली चाहे
वरना कौन बजाएगा
थालियां कांसे की
अपने भाई-भतीजों के जन्‍म पर

आने दो बेटियों को धरती पर
मत गाना मंगलगीत चाहे
वरना कौन गाएगा गीत
अपने वीरों की शादी में

आने दो बेटियों को धरती पर
मत देना विश्‍वास उन्‍हें
वरना कैसे होंगे दर्ज अदालत में
घरेलू हिंसा के मामले

आने दो बेटियों को धरती पर
मत देना कोई आशीर्वाद उन्‍हें
वरना कौन देगा गालियां
मां-बहन के नाम पर

आने दो बेटियों को धरती पर
मत देना दान-दहेज उन्‍हें
वरना कैसे जलायी जाएंगी बेटियां
पराये लोगों के बीच

आने दो बेटियों को धरती पर
पनपने दो भ्रूण उनके
वरना कौन धारण करेगा
तुम्‍हारे बेटों के भ्रूण
अपनी कोख में।

मेरी बेटी

आज कबाड़ख़ाने पर इब्बार रब्बी साहब की दो कविताएं पोस्ट कर रहा था तो जेहन में उनकी यह कविता लगातार गूंज रही थी। चलिए इस बहाने बेटियों के ब्लॉग में मेरी पहली एन्ट्री तो हुई।
मेरी बेटी

मेरी बेटी बनती है
मैडम
बच्चों को डांटती जो दीवार है
फूटे बरसाती मेज़ कुर्सी पलंग पर
नाक पर रख चश्मा सरकाती
(जो वहां नहीं है)
मोहन
कुमार
शैलेश
सुप्रिया
कनक
को डांटती
ख़ामोश रहो
चीखती
डपटती
कमरे में चक्कर लगाती है
हाथ पीछे बांधे
अकड़ कर
फ़्राक के कोने को
साड़ी की तरह सम्हालती
कापियां जांचती
वेरी पुअर
गुड
कभी वर्क हार्ड
के फूल बरसाती
टेढ़े मेढ़े साइन बनाती

वह तरसती है
मां पिता और मास्टरनी बनने को
और मैं बच्चा बनना चाहता हूं
बेटी की गोद में गुड्डे सा
जहां कोई मास्टर न हो!

जंगल में पिकनिक

यह तुकबंदी मैंने तोषी के लिए की थी। उस समय वह दूसरी कक्षा में थी और उसे कोई कविता स्कूल में सुनानी थी। मुझे भी आश्चर्य होता है कि मैंने उसके बाद या पहले कोई तुकबंदी कैसे नहीं की।
जानवरों ने सभा बुलाई
चलो करेंगे पिकनिक भाई
हल्ला गुल्ला शोर करेंगे
आएंगे दीदी,चाचा ताई

सभी जानवर मस्त हो गए
पिकनिक की तैयारी में
बन्दर सूट पहन कर आया
और बंदरिया साड़ी में

हाथी आये, भालू आये
अपने साथ वे आलू लाये
आलू छोटे और बडे थे
शेर हिरन भी वहाँ खडे थे

बड़े जोर की भूख लगी थी
पर जंगल में आग नहीं थी
हाथी भालू सब चकराए
लकड़ी अब कैसे सुलगाएं

बिना आग के खाना कैसे
बिना खेत के दाना कैसे
फिर सब ने एक जुगत लगाई
गांव से लाओ दियासलाई

गांव भला अब जाये कौन
फंसने का खतरा उठाये कौन
गांव के आदमी बड़े दुष्ट हैं
जानवरों से बड़े रुष्ट हैं

इतने में आया खरगोश
छोटा था, पर बड़ा था जोश
बोला, गांव मैं जाऊंगा
और आग भी लाऊंगा

आई आग और उबले आलू
छक कर खाए बगुला भालू
पिकनिक में सब नाचे गाये
जंगल में खुशहाली लाये

बेटी की विदा

राजेश जोशी की ये अंत्‍यंत ही मार्मिक कविता विजय शंकर जी ने ख़ास तौर पर बेटियों के ब्‍लॉग के लिए भेजी है। हम विजय जी की भावना की क़द्र करते हुए इसे यहां प्रकाशित कर रहे हैं। लेकिन हमारी ये ख्‍़वाहिश है कि हमारी बेटियां विदा होकर कभी न जाए। हमारा घर उसके लिए पराया कैसे हो सकता है। वे अपनी दुनिया वहीं आबाद करे, जहां वे पैदा हुईं। कहीं और करना चाहे, तो ये उसकी मर्जी होगी - परंपरा से चली आ रही विदा बेला का कोई आधुनिक पाठ रचने में ये ब्‍लॉग मदद करता है, तो यही हमारी क़ामयाबी होगी। बहरहाल, शुक्रिया विजय शंकर जी। बहुत बहुत शुक्रिया।
वे तीनों अलग-अलग शहरों से चौथे दोस्त की बेटी के ब्याह में आये थे
और कई दिनों बाद इस तरह इकट्ठे हुए थे

इस समय जब दोपहर लगभग ढल रही थी
तीनों घर के सामने एक पेड़ की छांव में बैठे हुए थे
और चौथे की बेटी की विदाई हो रही थी

अभी कुछ देर पहले तक वे हंस रहे थे और आपस में बतिया रहे थे
अब चौथे की बेटी लगभग घर के दरवाजे पर आ पहुंची थी
और रस्म के अनुसार कोई मखाने और पैसे फेंक रहा था
बेटी कभी मां और कभी भाई के गले लग कर रो रही रही थी

चौथा उसे अपनी एक बांह के घेरे में लिये था
वह अपने को संयत रखने की भरसक कोशिश कर रहा था
पर उसकी आंख की कोरें बार-बार भींग जाती थीं
वह रुमाल को चश्मे के कोनों के पास लाकर चुपके से उन्हें पोंछ लेता था
वह घर के सामने बैठे तीनों दोस्तों की ओर देखने से बच रहा था

तीनों दोस्त एकायक चुप से हो गए थे
जैसे अचानक उनकी सारी बातें ख़त्म हो गयी हों

इनमें से एक की बेटी का ब्याह दस दिन बाद था
और दूसरे की बेटी का ग्यारह दिन बाद

थोड़ी देर पहले दोनों इसी बात पर अफसोस कर रहे थे
कि वे शामिल नहीं हो पायेंगे एक दूसरे की बेटी के ब्याह में
तीसरे की बेटी अभी कॉलेज में पढ़ रही थी

चौथे की बेटी लगभग घर की देहरी पर आ चुकी थी

तीनों दोस्त बीच-बीच में चौथे की तरफ देखते थे
चौथा तीनों से अपनी आँखें चुरा रहा था

तीनों में जो सबसे ज्यादा अनुभवी थी, कह रहा था
कि अभी तो चौथा अपने को बहुत संभाले हुए है
लेकिन विदा के बाद इसे संभालना होगा

तीनों दोस्त चुप थे
और एक दूसरे से अपना रोना छिपा रहे थे
तीनों एक दूसरे से नज़र चुराते हुए किसी न किसी बहाने
चुपचाप पोंछ रहे थे बार-बार भींग जाती
आंखों की कोरों को

चौथे की बेटी की विदाई में देख रहे थे तीनों
अपनी-अपनी बेटी को विदा होते

तुमने देखा है कभी
बेटी के जाने के बाद कोई घर?

जैसे बिना चिड़ियों की सुबह हो!
जैसे बिना तारों का आकाश!

बेटियां इतनी यकसां होती हैं
कि एक की बेटी में दिखती है दूसरे को अपनी बेटी की शक्ल

चौथे की बेटी जब बैठ कर चली गयी कार में
तो लगा जैसे ब्रह्मांड में कोई आवाज़ नहीं बची

एकाएक अपनी उम्र लगी हम सबको
अपनी उम्र से कुछ ज़्यादा

बिटिया होती है दो तिहाई भाग हमारे घर का

मध्‍य प्रदेश के गुना शहर में बसे निरंजन श्रोत्रिय बेटियों का ब्‍लॉग देख कर बाग़ बाग़ हो गये। उन्‍होंने मेल करके बधाई दी और ये कविताएं इस ब्‍लॉग के लिए भेजीं। बिटिया सीरीज़ की ये कविताएं हमारे समय और समाज की उलझी हुई गुत्थियों के धागे समेट रही हैं।
एक

बिटिया समुद्र होती है
उसे कुछ भी दो वह लौटा देगी
उसे याद करो न करो
वह बार-बार आकर करती है सराबोर
हमारे तटों को

अनगिनत रहस्य अपने में समेटे
बिटिया होती है दो तिहाई भाग
हमारे घर का

दो

बिटिया थक कर लेटती
और घूरती घर की छत
सो जाती छत की सिल्लियों पर बनी
आकृतियों से बतियाते

बिटिया नींद में भी देखती
घर की छत
उसके स्वप्न लौट आते
टकरा कर छत से
जाग जाती चौंक कर
नहीं बदलती करवट
घूरती रहती छत लगातार

घर की छत टिकी
फ़कत बिटिया की नज़रों पर

तीन

एक लड़की विमला चौहान सोच रही
दूसरी लड़की लिली फर्नांडीज़ के बारे में
लिली चिन्तित राधा शर्मा के बारे में
राधा जानती सलमा कुरेशी का दु:ख
सलमा पहचानती मनजीत कौर की व्यथा

शहर के इस छोर पर
यदि आप हिलाएंगे एक लड़की को नींद में
शहर के दूसरे छोर पर
चौंक जाएगी एक और लड़की!

उग आती हैं बेटियाँ

बोए जाते हैं बेटे
उग आती हैं बेटियाँ

खाद-पानी बेटों में
पर लहलहाती हैं बेटियाँ

एवरेस्ट पर ठेले जाते हैं बेटे
पर चढ़ जाती हैं बेटियाँ

रुलाते हैं बेटे
और रोती हैं बेटियाँ

कई तरह से गिराते हैं बेटे
पर सम्भाल लेती हैं बेटियाँ


बेटियों पर बात करने से पहले मेरी तरफ से यह कविता पेश है। यह मशहूर कविता नन्द किशोर हटवाल की है। हालाँकि कई जगह पोस्टर के रूप में यह कविता मिलती है लेकिन उसमें कवि का नाम नदारद रहता है। नन्द किशोर हटवाल चमोली जिले में राजकीय इंटर कॉलेज में शिक्षक हैं। सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय रहते हैं। वे उत्तराखण्ड साहित्य कला परिषद से भी जुड़े रहे हैं।

(इस पोस्‍ट में इस्‍तेमाल की गयी तस्‍वीर सना ख़ान की है। सना, नासिरुद्दीन हैदर खान (जिन्‍हें हम कब्‍बूभाई के नाम से संबोधित करते हैं) और कहकशाँ की बेटी हैं और ये तस्‍वीर उसके पैदा होने के थोड़े दिनों बाद की है: अविनाश)