अनंत तस्‍वीरें दृश्‍यावलियां ख़बर ब्‍लॉग्‍स
Showing posts with label कोशी. Show all posts
Showing posts with label कोशी. Show all posts

कोशी और VOGUE

जुलाई, 2011 में तोषी (विधा सौम्या) VOGUE में छपी थीं. अभी 12 सितम्बर 2011 के VOGUE में कोशी (ब्रह्मात्मज) अपने हेयर स्टाइल को लेकर आई हैं. वोग ने Street style: Real hair styles in Bengaluru के तहत बंग्लुरु की कुछ कन्याओं के बालों की यूनिक शैली को खोज निकाला. इसके बाबत वोग लिखता है- 
Sick of our own hair and the humidity wreaking havoc on it, we decided to head to the cooler climates of Bangalore to search for inspiration. We hit the streets and were blown away by all the individual and very stylish takes on hair we found in the space of one weekend. Read on to find out more from the girls who seem to have figured the way to a good hair life.
कोशी भी उनमें से एक हैं. उनके बारे में वोग लिखता है-                                    Why we took her picture:
Her love for hair colour 

Her hair secret
Koshy colours her hair every two weeks and uses L'Oreal Techni Art Glue Force 6 to keep her hair in place.

अपने पहनावे, साज संवार, मेकअप व स्टाइल में कोशी आरम्भ से ही अलग रही है. उसके पास मंहगे या डिजाइनर कपडे नहीं होते. अपने रोजाना के कपडों में से ही वह एक स्टाइल निकालती है और इस रूप में उसे तब्दील करके पहनती है कि लगने लगता है कि वह कोई बहुत मंहगे ताम-झामवाले कपडे पहने हुए है. जब वह 12वीं कक्षा में थी, तब मुंबई के सेंट जेवियर्स कॉलेज के सालाना उत्सव 'मल्हार' में ड्रेस डिजाइन और मॉडलिंग की थी और उसमें अपनी टीम सहित प्रथम आई थी. बावजूद इसके उसे मॉडलिंग आकर्षित नहीं करता. 
आज भी वह अपने ड्रेस सेंस और बालों, मेकअप को लेकर अलग रूप अपनाती है. उसे जाननेवाले उसके बारे में तरह-तरह की बातें करते हैं, मसलन, वह इंटरनैशनल कैलिबर की लडकी है. ....वह समय के पार जाकर अपना इतिहास खुद रचनेवाली लडकी है....आदि आदि. वोग में आकर उसने यह दिखा दिया है कि अपनी अलग सोच और तरीका आपको एक नया स्वरूप देता है.  तोषी और अब कोशी दोनों अपने अपने तरीके से अपना स्थान बना रही हैं. एक तिमाही के दौरान दोनों की VOGUE में उपस्थिति हर्षाती है. 

कोशी को आप VOGUE के इस लिंक पर भी देख सकते हैं- http://www.vogue.in/content/street-style-real-hair-styles-bengaluru#17


 

कोशी, कचरा, भगवान व फोटो

कोशी का ब्लॉग है- Koshy's

इस पर वह अपनी बातें लिखती है. अपने काम, अपने फैशन व पहनावे आदि से सम्बन्धित. वह फोटो भी खीचती है. मगर इसके साथ साथ वह सामाजिक मुद्दों से भी जुडी रहती है और उसके भीतर उसका अपना ह्यूमर भी है. वह कचरा कभी भी न तो सडक पर खुद फेंकती है, न अपनी पहचान में किसी को फेंकने देती है. एक दिन जब वह मुंबई के लोखंडवाला परिसर से गुजर रही थी तो उसने यह दृश्य देखा और उसे अपने कैमरे में कैद कर लिया और अपने ब्लॉग पर डाला. आप भी देखें, आनन्द लें और मन करे तो अपने विचार भी व्यक्त करें.


YAHAN KACHRA PHEKNA MANA HAI


i am too bored to write what i am wearing!




और यह कोशी का ब्लॉग

बहुत इसरार करने पर आखिर कोशी ने अपना ब्लॉग बना ही लिया. वह नई नई बातें सोचने में जितनी तेज़ है, उसे कार्यांवित करने में उतनी ही आलसी. यह ब्लॉग भी लगातार कोंचते रहने का नतीज़ा है. हालांकि कम्प्यूटर पर सारे कामों में वह मेरी मदद करती है, मुझे सिखाती है, मगर अपनी ही बातों के प्रति उदासीन है. हो सकता है, यह किशोर उम्र का तकाज़ा हो. आखिर हम जब इस उम्र में थे तो क्या कर लेते थे? कुछ भी नहीं. उस लिहाज़ से आज के बच्चे बडे तेज़, समय के साथ बल्कि समय से तनिक आगे ही हैं.
कोशी ने दो साल पहले, जब वह दसवीं में थी, तब अपनी क्लास की कुछ दोस्तों के साथ मिलकर एक ब्लॉग बनाया था, उसका नाम था-http://paripoems.blogspot.com/ इसमें वह और उसकी दोस्त अपनी लिखी कविताएं पोस्ट करती रहीं. फिर जैसा कि होता है, इस ब्लॉग से उसका मन उचट गया. दोस्तों ने भी लिखना बन्द कर दिया, कोशी ने भी. बाद में इस ब्लॉग से कुछ कविताएं ले कर मैने अपने ब्लॉग http://chhutpankikavitayen.blogspot.com/ पर डालीं.
इसके बाद कोशी ने फिर एक ब्लॉग बनाया. मगर क्या बनाया, किस नाम से, क्या लिखा, कुछ याद नहीं. इस पर एक गीत लिखा जा सकता है.
कोशी के अबतक के जीवन में कई विचार आए -अपने कैरियर को ले कर. वह अपनी दीदी तोषी की तरह शुरु से मुतमईन नहीं थी कि उसे आर्टिस्ट ही बनना है. उसके कैरियर-विचार की यात्रा शुरु होती है 1994 से, जब सुष्मिता सेन मिस यूनिवर्स और ऐश्वर्या राय मिस वर्ल्ड बनी थी. तब वह दो साल की थी, मगर किसी के पूछने पर कि वह क्या बनेगी, बडे स्टाइल में गर्दन टेढी करके बोलती थी- "मिस वर्ल्ड". फिर सुन्दरता के इस संसार से उसका मोह भंग हुआ, जब वह स्कूल पहुंची. तब वह अपने टीचर्स के सम्पर्क में आई और हर बच्चे की तरह राग अलापने लगी कि वह बडी हो कर टीचर बनेगी. इसके बाद उसकी सोच में तनिक ठहराव आया और फोटोग्राफी करने लगी. तब फिर वह कहने लगी कि वह इस फील्ड में भी अपना कैरियर बनाने की सोच सकती है.
इसके साथ ही वह सोचने लगी अपने कैरियर के बारे में और कहने लगी कि वह अब फैशन डिजाइनर बनेगी. अबतक अपने कैरियर-विचार के इस जंगे मैदान में डटी हुई है. उसके प्रति तनिक गम्भीर भी है. अपने रोजाना के पहरावे में भी उसकी अलग रुचि है और पहनने के तौर तरीके एकदम अलग. इससे लगता है कि वह इस लाइन में चली जाएगी.
कोशी के इस ब्लॉग में आज के फैशन, उस पर उसके विचार, अपने पहनावे और रहन सहन पर उसकी टिप्पणियां, उसकी तस्वीरें, उसके साथ रोजाना होनेवाली बातें, उसके दोस्त, उनकी बातें सब आएंगी, मगर ज़रा धीरे धीरे. अभी वह अपने को सहेजने में लगी है और अपने रोजाना के घटनाक्रम से अपनी यात्रा की शुरुआत की है. लिखना शुरु किया है, आप सबके मार्गदर्शन, सुझाव, स्नेह से उसे अपने ब्लॉग को संवारने में मदद मिलेगी और खुद को भी. और हां, उसके ब्लॉग का नाम है- http://koshysblog.blogspot.com/

कोशी और उसका कंज्यूमर कोर्ट

कोशी अपने अधिकारों के प्रति सचेत हो रही है। घर में तो उसका अपना अधिकार - भाव चलता ही है, बाहर तो उसने कंज्यूमर कोर्ट के नाम से सभी को काफ़ी दारा-धमाका रखा है। कुछ बानगी देखिये-
१) कोशी अपने मोबाइल के लिए कनेक्शन लेने गई। जो स्कीम थी, दुकानदार ने उससे १०० रूपए अधिक मांगे। कोशी के मना कराने पर वह उसे कनेक्शन देने से इनकार कराने लगा। कोशी ने पहले उसे काफी समझाया की वह उससे अतिरिक्त पैसे की मांग कर रहा है, जो सही नही है। दुकानदार एक बच्ची को देख कर अकडा हुआ था। कोशी ने कहा की वह कंज्यूमर कोर्ट में उसकी शिकायत कराने जा रही है। और उसने फोन घुमा भी दिया। बस क्या था, दूकान का दूसरा आदमी बीच में आ गया और कहने लगा की वह, जो पैसे मांग रहा था, नया बन्दा है, और उसे कुछ भी नहीं मालूम। और इस तरह से कोशी अतिरिक्त पैसे देने से बच गई।
२) कोशी कहीं जा रही थी। रास्ते में उसे प्यास लगी। उसने पानी न खरीद कर एक ठंढा ले लिया। दुकानदार ने एम् आर पी से २ रुपये अधिक लिए बोतल ठंढा कराने के चार्ज के रूप में। कोशी ने कहा भी की यह ग़लत है और उसे एम आर पी से अधिक पैसे नहीं लेने चाहिए। दुकानदार के न मानने पर उसने फ़िर से कंज्यूमर कोर्ट में फोन किया उअर दुकानदार ने उसे २ रुपये चुपचाप वापस कर दिए।
३) हमारे घर के सामने एक दूकान है- किराने की। वहाँ भी कोशी की बहस शीत पेय पर ली जाने वाली अतिरिक्त राशि को लेकर हो गई। यहाँ भी कोशी ने वही किया। आज दूकानदार की यह हालत है की वह उससे अतिरिक्त पैसे लेता ही नहीं।
लेकिन अब कोशी को थोड़ी दिक्कत होने लगी है। उसने बताया की अब कंज्यूमर कोर्ट फोन पर किसी की शिकायत नहीं सुनता। शिकायत कराने के लिए शिकायतकर्ता को ख़ुद कंज्यूमर कोर्ट जाना पडेगा। यह बात व्यावहारिक नहीं है। कहां है किसके पास वक़्त की वह एक शिकायत के लिए कंज्यूमर कोर्ट तक जाए। वह या तो चुप रह जायेगा या अधिक पैसे देगा। खासकर शीत पेय या पानी लेने के लिए। कंज्यूमर कोर्ट ने अगर फोन से शिकायत लेना बंद कर दिया है तो उसे चाहिए की वह अपनी यह व्यवस्था तुंरत समाप्त कर दे, अन्यथा कंज्यूमर कोर्ट केवल नाम भर के लिए रह जायेगा। छोटे-छोटे मसाले हाल नहीं हो पायेंगे और छोटे-छोटे बच्चे इस कोर्ट की सफलता का आनंद नहीं ले पायेंगे और एक सजग नागरिक बनने से भी वंचित रह जाएनगे।

कोशी का बदलता स्वभाव

कोशी अब बड़ी हो रही है। अब उसे बड़ा होते देख मन करता है की वह फायर से नन्ही बच्ची बन जाए और हम सब उसके साथ फ़िर से खेलें। लेकिन कोशी इसके लिए राजी नही है। उसका कहना है की ऐसा होने से उसे फ़िर से नर्सरी से अबतक की पढाई पढ़नी पड़ेगी। उसकी बात में दम है। अब उसके काम में वज़न है। कल जब मैं दफ्तर से घर लौट रही थी तो उसने मुझे नीचे ही रुकने को कहा। नीचे आकर बोली की उसे बड़ी तेज़ भूख लगी है। वह नूडल्स खरी कर लाने लगी। लौटते में अचानक रुक कर कहने लगी की दीदी (तोषी) को भी भूख लगी होगी। उसके लिए भी ले लेते हैं। रात में आकर कहने लगी की पैसे दो, अम्मा की दवा ख़त्म हो गई है। दवा लाकर उसने ख़ुद ही उन्हें दवा दे दी। तीन दिन पहले वह अम्मा के लिए गाउन खरीद कर लाई। एक दिन ना पहनाने पर वह तनिक नाराज़ हो गई। दूसरे दिन पहना देने पर वह खुश हो गई। अब वह अपनी अम्मा से कहती है की अब आप सादी के बदले यही पहनिए। यही अच्छा लगता है। अपनी लाई हुई चीज़ के उपयोग से वह खुश है। उसकी जिम्मेदारियों का अहसास मन को अच्छा लगता है, मगर कभी-कभी लगता है की तोशी, कोशी दोनों फ़िर से बच्चे बन जायेम तो उनके साथ खेलने में कितना मज़ा आएगा!

तोषी व् कोशी का सेवा-भाव

आजकल तोषी व कोशी दोनों यहीं पर हैं, हमलोगों के साथ। हमारे सास-ससुर भी यहीं हैं। हर सरदी में हम उन्हें मुम्बई बुला लेते हैं, ताकि बिहार की कडाके की सरदी से वे बच सकें। वे नवम्बर से हमारे साथ हें। उनके आने से तोषी-कोशी दोनों ही बहुत खुशी महसूस करती हैं। ज़ाहिर है, हम सब भी।

इस बार नए साल की शुरुआत कुछ अच्छी नहीं रही। २६ दिसम्बर से ही अम्मा की तबीयत ख़राब हुई। कम्प्लीट बेड रेस्ट। उस पर से ५ जनवरी को वे गिर गई व् तबसे बिस्तर पर हैं। कहना न होगा की उनकी सेवा में ये दोनों बहनें जिस तरह से लगी हैं, उसे देखा कर मन बहुत गर्वित हो उठाता है। अम्मा को बिस्तर से उठाना, बिठाना, दवा, खाना आदि सारे भारी-भारी काम तोषी ने यूँ अपने ऊपर ले लिया, जैसे वह यह सब कराने की अभयस्त हो। एक कुशल नर्स की तरह वह अम्मा की सेवा में जुटी रहती है।

कोशी भी अपनी सामर्थ्य भर उनकी सेवा में लगी रहती है। अब अम्मा को दवा, खाना, फल, पानी आदि देने का काम वह बखूबी कर रही है। आज उसने कालेज जाने से मना कर दिया। कहा की परीक्षा के कारण क्लासेस नहीं हो रहे और घर में रहूंगी तो अमा और दीदी की जो भी ज़रूरत होगी, उसे देख लिया करूंगी। साथ में अपनी पढाई भी कर लूंगी। प्रसनागावश बता दूँ की इधर तोषी भी तीन-चार दिनों से बीमार पड़ गई है।

इन सबके साथ-साथ ये दोनों बाबा की भी सेवा में लगी रहती हैं। रोज रात में मच्छरदानी लगाना कोशी के जिम्मे है। अपने बड़ों के प्रति उनका यह सेवा भाव यह आश्वस्त करता है की बुजुर्गों को दरकिनार कराने के दिन अभी दूर हैं। तोषी-कोशी के भाव हमें अपने बड़ों के प्रति आदर व सम्मान देना बखूबी सिखा रहे हैं और खासकर उनके लिए, जो अपने ही घर के बड़े बुजुर्गों को बोझ मानने लगते हैं।

तोषी और कोशी के हासिलात

तोषी और कोशी अपनी अपनी जगह अपनी-अपनी उपलब्धयों के झंडे गाद रही है। ३-६ तक कोशी के कॉलेज का वार्श्कोत्सव था। वह उसकी वर्किंग कमेटी में थी और अपने ह्रुप की सबसे अनुशासित बच्ची के रूप में थी। इस बीच उसने दो स्पर्धाओं में हिस्सा लिया उअर अव्वल आई। वह फैशन डिजाइनिंग में जाना चाहती है और इसलिए ईईती, मुम्बई के वार्षिकोत्सव 'मूड इंडिगो' में उसने इससे सम्बंधित अपनी प्रविष्टि भेजी। यह चुन ली गई है और वह अब इसमें व्यस्त है। अपने अपने उम्र के इस पड़ाव पर उसका आत्म विशवास हैरान करनेवाला है और खुशी भी देने वाला।
आज तोषी का कन्वोकेशन है। बंगलोर के सृष्टि स्कूल ऑफ आर्ट एंड डिजाइन से विजुअल कम्यूनिकेशन में पीजी कोर्स कराने के बाद आज उसका कोर्स समाप्त हो रहा है। इस बीच वह नौ महीने के लिए भारत सरकार की और से पाकिस्तान के लाहौर में भी रही। यहाम बंगलोर में उसका प्रोजेक्ट भारत और पाक के एक नामालूम सी लगनेवाली हस्ती पर था और वह था दोनों जगह के औतोरिकशावालों की बातचीत। इस बातचीत के माध्यम से उसने दोनों देशों के एक आम नागरिक की हैसियत से दोनों देशों के सोच को दिखाना चाहाता। और इसका माध्यम उसने कबूतर को चुना। कबूतर को संदेशवाहक कहा और माना जाता रहा है। इसी के माध्यम से उसने अपनी बात कहने की कोशिश की। कहना ना होगा की उसका यह प्रयास बहुत सफल रहा। उसके स्कूल के एग्ज्बिशन में उसका काम सबसे ज़्यादा पसंद किया और सराहा गया। यहाँ तक की लोगों ने उसे यहाँ भी एग्जिबिशन की स्टार कहा। अपने काम का यह संतोष उसे तो है ही, हम दोनों को भी हाय। उसके टीचर और दीं ने कहा की हम बेहद सौभाग्यशाली माता-पिटा हैं की हमें ऎसी प्रतिभावान बेटी मिली है। मैं इसे अपना सौभाग्य तो मानती ही हूँ, साथ में, उसकी अदम्य मेहनत और साहस की तारीफ़ भी करती हूँ। वह सेल्फ्मेद है और इसका मुझे अभिमान है। आज शाम में उसका कन्वोकेशन है। हम दोनों बंगलोर में हैं और शाम में उसे अपने काम के लिए सम्मानित होता देखेंगे। वैसे ही, जब हम लाहौर में थे और उसे पंजाब के गवर्नर द्वारा सम्मानित होते देखा था। मुझे यकीन है की ये दोनों बहने अपने अपने क्षेत्र में खूब नाम करेंगी। तोषी की टीचर ने तो कहा भी की इसका काम अंतर्राष्ट्रीय स्टार का है। देश में इसके काम को पहचाननेवाले शायद ना मिलें।

कोशी और दाल - भात

दफ्तर के काम से मुझे अक्सर बाहर दौरे पर जाना पङता है। कल भी गोवा गई। सुबह गई और शाम को लौट आई। गोवा की फ्लाईट एक घंटे की है और एयरपोर्ट से घर पहुँचाना भी एक घटा ले लेता है ट्रैफिक की वज़ह से। आजकल मेरी बहन और बहनोई आए हुए हैं। वे भी पुणे गए थे और लौट रहे थे, शाम में। हम दोनों ही अपने-अपने गंतव्य से लगभग एक ही समय घर पहुंचनेवाले थे। हम दोनों ही थके हुए। दीदी बड़ी है, इसलिए माँ सरीखा ममतापन उसमें है और चूंकि घर मेरा है (यह अलग मुद्दा है कि औरतों का भी घर होता है क्या?), इसलिए पूरे रास्ते मैं यह सोचती आ रही थी कि घर पहुंचाते ही क्या- क्या बना दूँगी खाने के लिए।
रात के सवा नौ बजे के करीब मैं घर पहुँची और यह देखकर बहुत सुखद लगा कि कोशी ने अपने मन सेसभी के लिए दो कुकर में अलग-अलग दाल-चावल बना कर रख दिया है। अब मुझे केवल सब्जी और चपाती बनानी थी। आजकल वह कॉलेज जाने लागी है। कॉलेज जाने से उसका आत्म विश्वास काफी बढ़ा है। वह अपने कॉलेज के सालाना समारोह की वर्किंग कमिटी में आ गई है। अपना काम बहुत सलीके और लगन, उत्साह से कर रही है। दूसरे, अपनी दीदी तोषी में उसकी जान बसती है। आप उसके ख़िलाफ़ कुछ बोल दें, तो शायद वह आपकी जान लेने से भी न हिचके।
उसमं आ रही यह तब्दीली उसके अपने विकास के लिए जरूरी तो है ही, हमें यह सुकून देती कि वह जो भी करेगी, अच्छा करेगी और जिम्मेदारी के साथ करेगी। कल ही उसने यह भी कहा कि उसकी परीक्षा शुरू होनेवाली है और अब उसने पढ़ना शुरू कर दिया है। बात दाल -भात से निकलकर यहाँ तक आ गई । यह सब उसी की महिमा है।

बिल्ली, उसके बच्चे और तोषी, कोशी

कल अचानक तोषी ने बताया कि बिल्डिंग की सीढ़ी के कोने पर बिल्ली ने बच्चे दिए हैं। फ़िर कोशी ने भी बताया और कहा, चलो देखने। देखा, पूरे मातृत्व भाव में पगी हुई बिल्ली। चार बच्चे उसने दिए थे। चारो माँ के दूध में मुह घुसाए पड़े थे और माता राम आराम से बेफिक्र हो कर बच्चों को लिपटाए हुई थीं। बचपन में माँ कहती थी कि बिल्ली अपने बच्चे को मुंह से पकड़ सात घर घुमाती है। कई बार इस दृश्य को देखा भी था। अब ऐसा है या नहीं, पता नहीं। लेकिन कोशी उसकी फ़िक्र में लगी रहती है। अभी वह १५ अगस्त के कार्यक्रम के लिए डांस का अभ्यास कर रही है। लौटते में सीदी से आई या लिफ्ट से, यह तो मालूम नहीं, मगर आकर कहने लगी, "बिल्ली के लिए कुछ खाना है? उसका खाना ख़तम हो गया है।" मिट्टी का एक बर्तन उसके हाथ में था। उसके लिए वह दूध -रोटी लेकर गई। जानवरों और बच्चों से उसे कुछ ज़्यादा ही लगाव है। अभी बच्चों के रोएँ आने शुरू हो रहे हैं। अभी उसके रोजा दिन के किस्से शुरू होंगे-बिल्ली व् उसके बच्चों को लेकर। मैंने देखा है, जिन बच्चों का घरेलू जानवरों के साथ लगाव रहता है, उनमें बहुत सी परिपक्वाताएं आती हैं, समझदारी व् संवेदनशीलता अधिक होती है। अपनी दिक्कतों के कारण हम जानवर तो नहीं पाल सके। तोषी भी बचपन में इसके लिए काफी इसरार करती रही थी। हालात ने हमें इसकी इजाज़त नहीं दी, मगर जैसे हमने कभी भी इन्हें दूसरी माताओं की तरह मिट्टी पर, मिट्टी से खेलने से रोका नहीं, उसी तरह कभी जानवरों के साथ दोस्ती करने से भी नहीं रोका। आज दोनों ही अपनी अपनी जगह इतनी संवेदनशील हैं। इसका कुछ तो श्रेय इन मूक जानवरों को तो देना ही होगा।

कोशी की सफलता और उसकी संवेदनशीलता

हमारी आशा के विअपरीत कोश्य्य १०वी के इम्तहान में ७६% अंक लाई। उसके खिलानादाद स्वभाव ने मुझे बहुत दारा रखा था। उसकी यह अप्रत्याशित सफलता हम सभी को अभिभूत कर गई। कहने को आज के अंक आधारित जगत में ७६% का कोई महत्त्व नही, मगर हमने कभी भी अपने बच्चों को अंकों की होड़ में जाने देना नही चाहा। बस यह चाहा की वे आगे बढें, कुछ करे, और इसके लिए पढाई ज़रूरी है, सो वे पढ़े। तोषी ने तो ख़ुद को बेहद अच्छे से स्थापित कर लिया है, अब कोशी के सेटल होने की बात है।
उसकी सफलता के साथ-साथ उसकी संवेदनशीलता भी गौर कराने वाली है। नौन्वेज खाने में उसकी जान बसती है। यह गुन बच्चों में अजय से आया है। लेकिन कल जब घर में मछली बनी, तो कोशी ने खाने से इनकार कर दिया। पूछने पर बताया की बारिश में मछली नही कहानी चाहिए, क्योंकि यह उसके ब्रीडिंग का समय होता है। एक मछली को खा जाने से न जाने कितनी मछलियों को संसार में आने से हम रोक देते हैं।
समय-समय पर इस तरह की कई बातें हामी चुंका देती हैं। मुझे लगाने लगता है की अब वह बड़ी हो गई है और समझदार भी। संवेदना आगे भी उसकी बनी रहे, उसकी ही नहीं, बल्कि सभी की बनी रहे, यह कामना है।

तोषी -कोशी को समर्पित यह पुरस्कार

आज तोषी अपने ९ महीने की पाकिस्तान -पढाई की मियाद पूरी करके भारत लौट रही है। उसके स्वर में एक साथ देश लौटने की खुशी व उत्तेजना है तो दूसरे स्वर में वहां के लोगों से बिछड़ने के गम भी। लाहौर में उसे इतना प्यार, सम्मान, मिला, जितने कि हमने कल्पना तक न की थी। उसकी दीन सलीमा हाशमी ने मुझसे कहा यहा कि "आप अपनी बेटी को हमें वक्फ में दे दीजिये।'' ९ महीने के दरमियाँ उसके २ एकल और ३ ग्रुप शो हुए। उसके काम के लिए उसे वहाँ के पंजाब के गवर्नर द्वारा सम्मानित किया गया। अपने शो के दुरान अपने काम को लेकर वह प्रेस और मीडिया में छाई रही।

आज वह लौट रही है और अज ही मुझे एक ड्राइंग प्रतियोगिता में पुरस्कार मिला। चित्र बनाना मुझे आता नहीं, लेकिन उसेदेखके जो थोडा बहुत समझ पाई, उसमें धर दी कोशी ने। आज जब यह पुरस्कार ले रही थी, तो दोनों बहनें मेरे तसव्वर में थीं। आम तौर पर लोग कहते हैं कि माँ-बाप से बच्चों की पहचान बनाती है। लेकिन मुझे यहाँ यह कहते हुए गर्व हो रहा है कि यहाँ , आज मेरी पहचान मेरी तोषी, कोशी के कारण बनी है। कोशी ने ही बताया कि मुझे कैसे चित्र बनाना चाहिए और उसकी राय पर मैंने अमल किया। यह पुरस्कार मेरा नहीं, उन दोनों का है।

इस साल के कुछ संयोग रहे हैं कि एक साथ, एक ही दिन दो-दो अहम् घटनाएँ होती रही हैं।- मेरा जन्म दिन और अजय को पुरस्कार, हमारी शादी की २५वीन् सालगिरह और तोषी को पुरस्कार और आज उसका लौटना और मुझे पुरस्कार। इस संयोग को नमस्कार और तोषी व कोशी के लिए यह इनाम।

कोशी को पसंद आई बी मूवी


बी मूवी एक एनीमेशन फ़िल्म है.कोशी की छुट्टियाँ चल रही हैं.विमल भाई वह भी पंचमी की तरह बोर हो रही हूँ का पहाड़ा पढ़ती रहती है.बहरहाल एक दोस्त से मैं बी मूवी फ़िल्म लेकर आया और उसे देखने के लिए दिया.इस फ़िल्म की शुरूआत में बताया जाता है कि उड़ान के नियमों के मुताबिक मधुमक्खी उड़ नहीं सकती.उसे डैने छोटे होते है और उसके अनुपात में उसका शरीर भारी होता है.उसका उड़ पाना असंभव है.लेकिन मधुमक्खी इस बात की परवाह नहीं करती कि इंसान उसके बारे में क्या सोचते हैं?वह मजे से उड़ती है और अपने सारे काम करती है.पेड़ और जंगल कट रहे हैं तो क्या.वह ऊंची इमारतों के छत्ते के नीचे अपना छत्ता लगा देती है.ठीक ऐसी जगह कि आप मधु न निकाल सकें।

बहरहाल यह फ़िल्म मधुमक्खियों के बारे में है.बैरी बी बेंसन अभी-अभी स्नातक हुआ है.उसे बताया जाता है कि अब वह शहद बनाने के काम के योग्य हो चुका है.बैरी सोचता है कि ज़िंदगी भर शहद बनाने में कितनी बोरियत होगी.वह मधुमक्खियों की दुनिया से बाहर निकलता है और इंसानों की दुनिया में आ जाता है.उसे यह अजीबोगरीब दुनिया विचित्र लगती है,जहाँ हर इंसान उसे मारने के लिए तैयार है.वह भागता फिरता है.एक घर में वनेस्सा उसकी जान बचाती है. दोनों की दोस्ती होती है.शहर में घुमते हुए बैरी देखता है कि इंसान उसकी प्रजाति की मेहनत का व्यवसाय कर रहे हैं.अलग-अलग किस्म के पैकेज बना कर शहद का कारोबार करता है.बैरी तय करता है कि वह इंसान की इस चोरी और सीन्जोरी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएगा.वह इंसान के ख़िलाफ़ मुक़दमा कर देता है.लम्बी बहस चलती है.मधुमक्खी के वकील अपने तर्क देते हैं।

आखिरकार जज मधुमक्खियों के पक्ष में फैसला देते है और इंसानों से कहा जाता है कि वे शहद वापस करें।

यह फ़िल्म बेहद रोचक है.मौका मिला तो आप सभी अपनी बेटियों के साथ इसे देखें.हाँ,प्लीज बेटों को भी साथ में बैठने दें.

काम करते हैं लोग

बहुत पहले तोषी को यह कविता पढाई थी.बाद में कोशी ने भी इसे पढ़ा.बच्चों की एक किताब में यह कविता संबंधित चित्रों के साथ छपी थी.जितनी पंक्तियाँ हैं,उतने ही पृष्ठों में उतने चित्रों के साथ छपी तस्वीरों का प्रभाव यहाँ नहीं ला सकता मैं.काम के महत्व को इतने सरल शब्दों में किसी ने नहीं बताया.आज तोषी के जन्मदिन पर यह कविता सभी के लिए यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ.इस कविता की रचयिता हैं अनिता हार्पर...

काम करते हैं लोग
लोग हर तरह के काम करते हैं
कुछ लोग एक साथ काम करते हैं
कुछ लोग अकेले काम करते हैं
कुछ लोग ऊंचाई पर चढ़ कर काम करते हैं
कुछ लोग काम करते हैं,जबकि दूसरे सोते हैं
कुछ लोग सोते हैं,जबकि दूसरे काम कर रहे होते हैं
कुछ लोग अपना काम पसंद करते हैं
कुछ लोग अपना काम पसंद नहीं करते हैं
कुछ लोग सिर्फ़ एक काम करते हैं
कुछ लोग एक से अधिक काम करते हैं
कुछ लोग काफी देर तक काम करते हैं
कुछ लोग थोड़े समय काम करते हैं
कुछ लोग अपने काम के ढेर सारे पैसे पाते हैं
कुछ लोग कम पैसे पाते हें
कुछ लोगों को काम नहीं मिलता
कुछ लोग काम करते हें,मगर पैसे नहीं पाते
सारी दुनिया में लोग काम करते हैं.

क्या ट्रेन भी मेकअप करती है?

दस साल पहले की बात होगी.पटना से मुम्बई आया था.उन दिनों ट्रेन का देरी से पहुँचना स्वाभाविक बात मानी जाती थी.हम भी देर से पहुंचे थे.असल में पटना से ही ट्रेन देर से खुली (बिहार में हमलोगों की ट्रेन हमेशा खुलती थी,अब यह छूटती है) थी.लगभग आठ घंटे देर से.हम विभा को सब कुछ बता रहे थे.यात्रा की इस बातचीत के दरम्यान हमने कहा -लेकिन ट्रेन ने रास्ते में मेकअप कर लिया था.हमारी बातचीत को गौर से सुन रही कोशी से रहा नहीं गया और उसने तपाक से अपनी माँ से पूछा,'क्या ट्रेन भी मेकअप करती है?'
कोशी के उस मासूम सवाल ने तब भी हंसाया था और आज किस्सा चलने पर वह ख़ुद भी हंसती है और हम सभी खुशी और हँसी से सराबोर हो जाते हैं.

कोशी के लिए झींगा (Prawn) बनाया

आज रविवार का दिन है। सुबह पहले तो विभा ने बाबूजी के लिए बंगाली शैली का नाश्ता बनाया। लुची,चने कि हलकी मीठी दाल और बैंगन भाजा। मिष्टी दही बाज़ार से आ गया था, सुबह के दिव्या बंगाली नाश्‍ते के साथ बंगाली सफ़ेद रसगुल्ला भी था, जो कोशी ने मुझे खाने नही दिया। मधुमेह से ग्रस्त पिता के प्रति बेटी सचेत हो जाये, तो रसगुल्ला नहीं मिलता।

विचार हुआ कि दोपहर में झींगा खाया जाए। मैंने कोशी से पूछा कौन से स्टाइल का खाना है। उसने कहा कि नारियल डाल के साउथ या कोंकण शैली का। मुझे तो मजा ही आ गया। खाना बना कर खिलाने का आनंद कविता सुनाने के टक्कर का होता है। अगर स्वादिष्ट व्यंजन बन जाए तो सालों उसका स्वाद याद रहता है किसी प्यारी कविता की तरह। बहरहाल, मैंने एक आदत तो डाल ली है और मेरी बेटियों ने उसे अपना लिया है कि खाना कहीं का बेस्वाद नही होता। अगर कहीं घूमने जाओ तो वहीं के व्यंजन खाओ। हालांकि कपड़ों की तरह भोजन में भी एकरूपता लाने की साजिश चल रही है। इससे लड़ने का एक ही तरीका है कि गोवा में जाकर तन्दूरी रोटी और चिकेन न खाएं। खैर,आज कोशी और मैंने मिल कर केरल के कैथोलिक परिवारों में प्रचलित झींगे का व्यंजन तैयार किया और डट कर खाया।

क्या आप भी आजमाना चाहेंगें? बेटियों के लिए मैंने कई व्यंजन तैयार किये हैं। बनाने में आसान और खाने में स्वादिष्ट। यह तो बात हुई कोशी की।

तोषी की ग्रुप प्रदर्शनी कल लाहौर में शुरू हो रही है। वहां भारत के दो छात्र हैं। सार्क के 8 देशों के 22 छात्र इसमें हिस्सा ले रहे हैं। उसने हाल में ही बताया कि वह आजकल पढ़ भी रही है। मेरे लिए यह ख़ुशी और गर्व की बात है। आप भी उसकी प्रदर्शनी का आमंत्रण पत्र देखें। यह पत्र भी उसी ने डिजाईन की है।


तोषी का फोर्मल नाम विधा सौम्या है.

कोशी और तोषी

ये नाम मेरी बेटियों के हैं।

फ़िलहाल इतनी ही जानकारी कि बड़ी बेटी तोषी मुझे आप कह कर संबोधित करती है और छोटी हमेशा तुम कहती है.क्यों?मुझे नहीं मालूम और न मैंने जानने-समझने की कोशिश की.आप कहा जाऊं या तुम?दोनों ही बेहद प्यारी,समझदार और अपनी उम्र से ज्यादा अनुभवी हो गयी हैं।

बड़ी बेटी तोषी फ़िलहाल पाकिस्तान में है.लाहौर में रह कर वह अध्ययन कर रही है.छोटी मेरे साथ है.उसकी १०वी की परीक्षा शुरू होने वाली है।

आज इतना ही.