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जल्‍दी आओ मेरी लल्‍ली


तोषी (विधा सौम्या) आजकल दिल्ली में है. दिल्ली की ठंढ उसे डरा रही थी. जाने से हिचक रही थी. खूब चाक चुबत हो कर, शॉल, जैकेट, स्वेटर के हथियारों से लैस जब वह दिल्ली पहुंची तो फूला गुब्बारा पिचक गया. मायूस हो गई वह- "अरे, यहां तो ठढ ही नहीं है. दिल्ली के लिए उसने लिखा अपने फेसबुक स्टेटस पर- "दिल्ली- इस मंगल शुरु, अगले मंगल खतम
दिल्ली- तेरी ठंढ में ठिठुरेंगे, नाक, कान, बदन और हम." 
फेसबुक पर स्टेटस है तो कमेंट्स भी आयेंगे. पर सबसे बढिया कमेंट रहा उसके बडे पापा ऋषिकेश सुलभ जी का. कमेंट नहीं, कविता हो गई. यहां है- 

दि‍ल्‍ली-दि‍ल्‍ली बेहि‍स दि‍ल्‍ली.... 
दि‍ल्‍ली हो गई बर्फ़ की सि‍ल्‍ली...
कैसे खेलें डंडा-गि‍ल्‍ली.....
मुम्‍बई है नज़र की झि‍ल्‍ली.....
पलक झपकते नोचे बि‍ल्‍ली.......
द्वार-द्वार पर लगी है कि‍ल्‍ली
पटना आओ मेरी लल्‍ली
हिंया उड़ी न तुम्‍हरी खि‍ल्‍ली
देखे तुमको बरस हुए
जल्‍दी आओ मेरी लल्‍ली
राज़ की बात बताएं तुमको
ठंडी हो रही चि‍कन-चि‍ल्‍ली
आओ-आओ मेरी लल्‍ली

तोषी के ड्राइंग्स की एकल प्रदर्शनी है- लाहौर केGREYNOISEमें


आज तोषी यानी विधा सौम्या के ड्राइंग्स की एकल प्रदर्शनी है- लाहौर में- "Song of the Sirens" शीर्षक से, शाम 7 बजे से गैलरी GREYNOISE, लाहौर में. वह अपने एग्जिबिशन के लिए वहीं है और रात-दिन काम कर रही है.
विधा 2008-09 में भी लाहौर में थी और वहां उसने अपने काम के बल पर बहुत ख्याति के साथ साथ असीमित प्यार, स्नेह व अपनापा पाया था, चाहे वे उसके हॉस्टल के गार्ड च्चा थे या ख़नसामा, या बस के ड्राइवर चचा या हॉस्टल में काम करनेवाली बाजी.
उसके काम में एक अलग तरह की डिटेल्स हैं जो बहुत मेहनत खोजती है. मैने उसे यहां रात-रात हर जग कर काम करते देखा है. तीन चार घंटे की नींद के बाद फिर से काम के लिए तैयार!
आज देश और बडे घराने और बडे बडे लोग "अमन की आशा" कर रहे हैं हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच. विधा यह काम पिछले दो साल से करती आ रही है, अपने चित्रों, ड्राइंगों और प्रदर्शनियों के ज़रिये. पाकिस्तान के प्रति, वहां के लोगों के प्रति उसके मन में बहुत लगाव है और वह यह शिद्दत से मानती है कि आम आदमी बस अमन, मुहब्बत और अपनी एक चैन की ज़िन्दगी चाहता है, वह चाहे पाकिस्तान के लोग हों या हिन्दुस्तान के.
अभी वह अपने एग्जिबिशन में व्यस्त होगी. उसके बारे में लिखते हुए मुझे बेहद अच्छा लग रहा है और एक अलग से गगर्व का अहसास हो रहा है. अहसास इसलिये नहीं कि वह मेरी बेटी है, बल्कि इसलिये भी कि वह दोनों मुल्कों के बीच अमन के एक दूत के रूप में काम कर रही है. उसकी यह मेहनत ज़रूर रंग लाएगी. आमेन!

और यह कोशी का ब्लॉग

बहुत इसरार करने पर आखिर कोशी ने अपना ब्लॉग बना ही लिया. वह नई नई बातें सोचने में जितनी तेज़ है, उसे कार्यांवित करने में उतनी ही आलसी. यह ब्लॉग भी लगातार कोंचते रहने का नतीज़ा है. हालांकि कम्प्यूटर पर सारे कामों में वह मेरी मदद करती है, मुझे सिखाती है, मगर अपनी ही बातों के प्रति उदासीन है. हो सकता है, यह किशोर उम्र का तकाज़ा हो. आखिर हम जब इस उम्र में थे तो क्या कर लेते थे? कुछ भी नहीं. उस लिहाज़ से आज के बच्चे बडे तेज़, समय के साथ बल्कि समय से तनिक आगे ही हैं.
कोशी ने दो साल पहले, जब वह दसवीं में थी, तब अपनी क्लास की कुछ दोस्तों के साथ मिलकर एक ब्लॉग बनाया था, उसका नाम था-http://paripoems.blogspot.com/ इसमें वह और उसकी दोस्त अपनी लिखी कविताएं पोस्ट करती रहीं. फिर जैसा कि होता है, इस ब्लॉग से उसका मन उचट गया. दोस्तों ने भी लिखना बन्द कर दिया, कोशी ने भी. बाद में इस ब्लॉग से कुछ कविताएं ले कर मैने अपने ब्लॉग http://chhutpankikavitayen.blogspot.com/ पर डालीं.
इसके बाद कोशी ने फिर एक ब्लॉग बनाया. मगर क्या बनाया, किस नाम से, क्या लिखा, कुछ याद नहीं. इस पर एक गीत लिखा जा सकता है.
कोशी के अबतक के जीवन में कई विचार आए -अपने कैरियर को ले कर. वह अपनी दीदी तोषी की तरह शुरु से मुतमईन नहीं थी कि उसे आर्टिस्ट ही बनना है. उसके कैरियर-विचार की यात्रा शुरु होती है 1994 से, जब सुष्मिता सेन मिस यूनिवर्स और ऐश्वर्या राय मिस वर्ल्ड बनी थी. तब वह दो साल की थी, मगर किसी के पूछने पर कि वह क्या बनेगी, बडे स्टाइल में गर्दन टेढी करके बोलती थी- "मिस वर्ल्ड". फिर सुन्दरता के इस संसार से उसका मोह भंग हुआ, जब वह स्कूल पहुंची. तब वह अपने टीचर्स के सम्पर्क में आई और हर बच्चे की तरह राग अलापने लगी कि वह बडी हो कर टीचर बनेगी. इसके बाद उसकी सोच में तनिक ठहराव आया और फोटोग्राफी करने लगी. तब फिर वह कहने लगी कि वह इस फील्ड में भी अपना कैरियर बनाने की सोच सकती है.
इसके साथ ही वह सोचने लगी अपने कैरियर के बारे में और कहने लगी कि वह अब फैशन डिजाइनर बनेगी. अबतक अपने कैरियर-विचार के इस जंगे मैदान में डटी हुई है. उसके प्रति तनिक गम्भीर भी है. अपने रोजाना के पहरावे में भी उसकी अलग रुचि है और पहनने के तौर तरीके एकदम अलग. इससे लगता है कि वह इस लाइन में चली जाएगी.
कोशी के इस ब्लॉग में आज के फैशन, उस पर उसके विचार, अपने पहनावे और रहन सहन पर उसकी टिप्पणियां, उसकी तस्वीरें, उसके साथ रोजाना होनेवाली बातें, उसके दोस्त, उनकी बातें सब आएंगी, मगर ज़रा धीरे धीरे. अभी वह अपने को सहेजने में लगी है और अपने रोजाना के घटनाक्रम से अपनी यात्रा की शुरुआत की है. लिखना शुरु किया है, आप सबके मार्गदर्शन, सुझाव, स्नेह से उसे अपने ब्लॉग को संवारने में मदद मिलेगी और खुद को भी. और हां, उसके ब्लॉग का नाम है- http://koshysblog.blogspot.com/

"एक्सप्लोसिव्स" में तोषी ने उकेरा ड्राइंग का एक नया पन्ना


आज जब हिन्दुस्तान और पाकिस्तान दोनों ही देश एक दूसरे के खिलाफ आग उगल रहे हैं, वैसे में तोषी यानी विधा सौम्या अपनी कला के माध्यम से दोनों देशों के बीच एक नया पुल रचने की प्रक्रिया में है. ज़ाहिर है कि पुल निर्माण की इस प्रक्रिया में वह अकेली नहीं है. उसके पाकिस्तान के दोस्त और शुभचिंतक भी हैं, जिनके लिए कला और अभिव्यक्ति एक दूसरे को समझने के बेहतरीन माध्यमों में से एक है.
आज तोषी के आर्ट एक्जीबिशन की ओपनिंग है- लाहौर के "ग्रेनॉयज" आर्ट गैलरी में. अपने लाहौर प्रवास में उसके चित्रों की कई एकल व ग्रुप प्रदर्शनियां हो चुकी थी. हिन्दुस्तान आने के बाद लाहौर के लिए यह उसकी पहली प्रदर्शनी है. मुंबई में उसका एक ग्रुप शो हो चुका है.
"एक्सप्लोसिव्स" नाम से 15 ड्राइंग के सेट की एक पूरी की पूरी किताब इस प्रदर्शनी में है. इस ड्राइंग के सेट में आज शहर में एक शहरी तरीके से जी रहे जीवन के अन्दाज़ को अपनाए हुए उन लोगों के बारे में कहा गया है जो शहर में रहते हुए और शहर की नज़ाकत के साथ पलते हुए मीडिया और पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से सेक्स और सेक्स की दुनिया को समझने की कोशिश करते हैं और तदनुसार उसे अपने जीवन में ढालने का प्रयास करते हैं. और इस तरह से सेक्स उनके जीवन में एक योजनाबद्ध रूप में प्रस्तुत होता है.
इस ड्राइंग के सेट में साहित्य में व्यंग्य की तरह इन रेखा चित्रों में व्यंग्य कुछ कुछ कार्टून की शक्ल में आते हैं, जो लोगों को तनिक हंसाते, तनिक गुदगुदाते हैं. किंतु, व्यंग्य रचना की तरह ही यह जीवन के उन गहरे पन्नों को भी खंगालने की कोशिश करते है.
प्रदर्शनी में गई पुस्तक मूल पुस्तक का प्रिट फॉर्म है. यह हाथ से बनाई एक किताब के रूप में है और इसी रूप में इसे प्रदर्शनी में रखा जा रहा है. इसे डिजिटली पुन:प्रस्तुत किया गया है, मगर इतनी सफाई से कि यह मूल कार्य का सुख देता है. बन्द रूप में यह किताब 10x8.5" इंच व खुले रूप में 10x17" इंच की है. यह प्रदर्शनी 25 -30 अक्तूबर, 2009 तक चलेगी.

वोट का अधिकार और उसका उपयोग

इस बार पहली बार तोषी अपने वोट के अधिकार का प्रयोग करेगी। लेकिन एक आम मतदाता की तरह उसकी भी भ्रमित स्थिति है की किसे वोट दे? कोई भी नेता बाद में न तो जनता के प्रति जवाबदार होता है न देश के प्रति। वह चाहे किसी भी पार्टी का हो। कल हमारी बात इसी पर हो रही थी। एक तो वह पार्टियों के प्रचार के तरीके से बेहद खफा थी। उसका कहना था की हर पार्टी दूसरी पार्टी की खामियों को गिना कर अपने लिए वोट मांग रही है। वह यह नही कह रही है की उसने क्या किया या वह क्या करेगी और इस करेगी में वह यथार्थ के कितने करीब होगी। बस, किसने क्या नही किया और क्या किया की खील बखिया उधेराने में लगी हुई है। तोषी युवा वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रही है। और ज़ाहिर है की युवा वर्ग बेहद आक्रोश में है।, उसका विशवास देश के इन नुमान्दों से उठ चुका है। जो भी पार्टी सत्ता में आयेगी या आती है, उसका सारा ध्यान तो अपने अलायांसों को संभालने में लग जाता है। देश में नौकरी नहीं है। उस पर से मंदी की मार अलग से है। शिक्षा व् स्वास्थ्य ये दोनों महत्वपूर्ण सेक्टर अमीरों की थाती होती जा रही है,।

साम्प्रदायिकता के सवाल पर तो वह बेहद मुखर है। उसका कहना है की जिस तरह से साम्प्रदायवाद को एक अत्यन्त संकीर्ण नज़रिए से बाँध दिया गया है, वह हमें अपने पर से अपने विशवास को दुला देता है। हमें एक सम्प्रदाय खतरनाक नज़र आता है मगर दूसरा सम्प्रदाय किस तरह से कट्टर बन हुआ है, उसे देखा कर तो ख़ुद को इस सम्प्रदाय का मानने को जी नजीन करता। देश में हिन्दू कट्टरता जिस तरह से बढी है, और मुसलमान जिस तरह से पीडित हो रहे हैं, उससे कौन सच्चा हिन्दू अपने आप को हिन्दू होने के गौरव बोधग से भरेगा?

नेता अपनी दूकान चलाते हैं। वे जनता और आम आदमी के दुःख दर्द से मुखातिब नही होते। मुम्बई का आतंकवाद तो पूरे विश्व के फलक पर उभरा ही है, मगर जो रोजमर्रा की परेशानी है, उससे कैसे निजात मिले? मई शुरू होने को आई है, जून में यहाँ बारिश शुरू हो जाती है। मगर मुम्बई की सालाना साफ़-सफाई नदारद है। मेट्रो परियोजना के कारण सड़को का बुरा हाल है। अभी ही ट्रैफिक भगवान भरोसे है, बारिश में क्या होगा? २००५ के बाद से सभी मुम्बईकर हिले रहते हैं बारिश के मौसम में।,

चुनाव के इस मौसम में कौन क्या करे, वह सोच नहीं पा रही है। केवल वोट के लिए वोट या कुछ और भी। तोषी की यह परेशानी एक आम मतदाता की परेशानी है।

आज मेरी तोषी का जन्म दिन है। यकीन नहीं होता की वह इतनी बड़ी हो गई है। केवल बड़ी ही नहीं, बेहद समझदार भी। उतनी ही संवेदनशील, उतनी ही सबके प्रति फिक्रमंद। अभी उसने अपने अनुभव के वितान को बड़ा करना चाहा है। इसके लिए उसने मुम्बई की एक आर्ट गैलरी ज्वायन की है। उसके अनुभव में इजाफा हो रहा है। अब वह स्वतन्त्र रूप से दुनिया को देखनेसमझाने, पहचानने की कोशिश में है। मुझे पूरा यकीन है की वह अपनी ख़ास जगह बना लेगी और ज़ल्दी ही। उसके जन्म दिन पर उसके लिए एक तोहफा-

जिस दिन तुमको ना देखूं मैं

मन जोर कहीं से कसकता है,

तेरी मुस्काती सूरत से

मन बहुत-बहुत ही हरासता है।

तुम अपनी बातों के गुच्छे से

खुशबू खूब बिखेरती हो

हो गई हो अब तुम बहुत बड़ी

पर फ़िर भी लगता नन्ही हो,

जैसे बरखा की धारा में

बून्दीन कोई मेंही हो

मेरे जीवन की रचना प्रथम

मेरी साँसों का तुम आधार

तुमसे पाई खुशियाँ सब

तुम ही अब जीवन अब संसार

छूटा है बहुत कुछ पाने में

छूटेगा बहुत कुछ पाने में

तुम साथ रहोगी, बनोगी बल

अफसोस न होगा जाने में

उनकी प्रतिमा, मेरी परछाईं

तेरा तो जीवन आगे है

थाम लो सूरज-चन्दा, तारे

बस तेरे लिए सब जागे हैं।

कोशी और उसका कंज्यूमर कोर्ट

कोशी अपने अधिकारों के प्रति सचेत हो रही है। घर में तो उसका अपना अधिकार - भाव चलता ही है, बाहर तो उसने कंज्यूमर कोर्ट के नाम से सभी को काफ़ी दारा-धमाका रखा है। कुछ बानगी देखिये-
१) कोशी अपने मोबाइल के लिए कनेक्शन लेने गई। जो स्कीम थी, दुकानदार ने उससे १०० रूपए अधिक मांगे। कोशी के मना कराने पर वह उसे कनेक्शन देने से इनकार कराने लगा। कोशी ने पहले उसे काफी समझाया की वह उससे अतिरिक्त पैसे की मांग कर रहा है, जो सही नही है। दुकानदार एक बच्ची को देख कर अकडा हुआ था। कोशी ने कहा की वह कंज्यूमर कोर्ट में उसकी शिकायत कराने जा रही है। और उसने फोन घुमा भी दिया। बस क्या था, दूकान का दूसरा आदमी बीच में आ गया और कहने लगा की वह, जो पैसे मांग रहा था, नया बन्दा है, और उसे कुछ भी नहीं मालूम। और इस तरह से कोशी अतिरिक्त पैसे देने से बच गई।
२) कोशी कहीं जा रही थी। रास्ते में उसे प्यास लगी। उसने पानी न खरीद कर एक ठंढा ले लिया। दुकानदार ने एम् आर पी से २ रुपये अधिक लिए बोतल ठंढा कराने के चार्ज के रूप में। कोशी ने कहा भी की यह ग़लत है और उसे एम आर पी से अधिक पैसे नहीं लेने चाहिए। दुकानदार के न मानने पर उसने फ़िर से कंज्यूमर कोर्ट में फोन किया उअर दुकानदार ने उसे २ रुपये चुपचाप वापस कर दिए।
३) हमारे घर के सामने एक दूकान है- किराने की। वहाँ भी कोशी की बहस शीत पेय पर ली जाने वाली अतिरिक्त राशि को लेकर हो गई। यहाँ भी कोशी ने वही किया। आज दूकानदार की यह हालत है की वह उससे अतिरिक्त पैसे लेता ही नहीं।
लेकिन अब कोशी को थोड़ी दिक्कत होने लगी है। उसने बताया की अब कंज्यूमर कोर्ट फोन पर किसी की शिकायत नहीं सुनता। शिकायत कराने के लिए शिकायतकर्ता को ख़ुद कंज्यूमर कोर्ट जाना पडेगा। यह बात व्यावहारिक नहीं है। कहां है किसके पास वक़्त की वह एक शिकायत के लिए कंज्यूमर कोर्ट तक जाए। वह या तो चुप रह जायेगा या अधिक पैसे देगा। खासकर शीत पेय या पानी लेने के लिए। कंज्यूमर कोर्ट ने अगर फोन से शिकायत लेना बंद कर दिया है तो उसे चाहिए की वह अपनी यह व्यवस्था तुंरत समाप्त कर दे, अन्यथा कंज्यूमर कोर्ट केवल नाम भर के लिए रह जायेगा। छोटे-छोटे मसाले हाल नहीं हो पायेंगे और छोटे-छोटे बच्चे इस कोर्ट की सफलता का आनंद नहीं ले पायेंगे और एक सजग नागरिक बनने से भी वंचित रह जाएनगे।

तोषी व् कोशी का सेवा-भाव

आजकल तोषी व कोशी दोनों यहीं पर हैं, हमलोगों के साथ। हमारे सास-ससुर भी यहीं हैं। हर सरदी में हम उन्हें मुम्बई बुला लेते हैं, ताकि बिहार की कडाके की सरदी से वे बच सकें। वे नवम्बर से हमारे साथ हें। उनके आने से तोषी-कोशी दोनों ही बहुत खुशी महसूस करती हैं। ज़ाहिर है, हम सब भी।

इस बार नए साल की शुरुआत कुछ अच्छी नहीं रही। २६ दिसम्बर से ही अम्मा की तबीयत ख़राब हुई। कम्प्लीट बेड रेस्ट। उस पर से ५ जनवरी को वे गिर गई व् तबसे बिस्तर पर हैं। कहना न होगा की उनकी सेवा में ये दोनों बहनें जिस तरह से लगी हैं, उसे देखा कर मन बहुत गर्वित हो उठाता है। अम्मा को बिस्तर से उठाना, बिठाना, दवा, खाना आदि सारे भारी-भारी काम तोषी ने यूँ अपने ऊपर ले लिया, जैसे वह यह सब कराने की अभयस्त हो। एक कुशल नर्स की तरह वह अम्मा की सेवा में जुटी रहती है।

कोशी भी अपनी सामर्थ्य भर उनकी सेवा में लगी रहती है। अब अम्मा को दवा, खाना, फल, पानी आदि देने का काम वह बखूबी कर रही है। आज उसने कालेज जाने से मना कर दिया। कहा की परीक्षा के कारण क्लासेस नहीं हो रहे और घर में रहूंगी तो अमा और दीदी की जो भी ज़रूरत होगी, उसे देख लिया करूंगी। साथ में अपनी पढाई भी कर लूंगी। प्रसनागावश बता दूँ की इधर तोषी भी तीन-चार दिनों से बीमार पड़ गई है।

इन सबके साथ-साथ ये दोनों बाबा की भी सेवा में लगी रहती हैं। रोज रात में मच्छरदानी लगाना कोशी के जिम्मे है। अपने बड़ों के प्रति उनका यह सेवा भाव यह आश्वस्त करता है की बुजुर्गों को दरकिनार कराने के दिन अभी दूर हैं। तोषी-कोशी के भाव हमें अपने बड़ों के प्रति आदर व सम्मान देना बखूबी सिखा रहे हैं और खासकर उनके लिए, जो अपने ही घर के बड़े बुजुर्गों को बोझ मानने लगते हैं।

तोषी और कोशी के हासिलात

तोषी और कोशी अपनी अपनी जगह अपनी-अपनी उपलब्धयों के झंडे गाद रही है। ३-६ तक कोशी के कॉलेज का वार्श्कोत्सव था। वह उसकी वर्किंग कमेटी में थी और अपने ह्रुप की सबसे अनुशासित बच्ची के रूप में थी। इस बीच उसने दो स्पर्धाओं में हिस्सा लिया उअर अव्वल आई। वह फैशन डिजाइनिंग में जाना चाहती है और इसलिए ईईती, मुम्बई के वार्षिकोत्सव 'मूड इंडिगो' में उसने इससे सम्बंधित अपनी प्रविष्टि भेजी। यह चुन ली गई है और वह अब इसमें व्यस्त है। अपने अपने उम्र के इस पड़ाव पर उसका आत्म विशवास हैरान करनेवाला है और खुशी भी देने वाला।
आज तोषी का कन्वोकेशन है। बंगलोर के सृष्टि स्कूल ऑफ आर्ट एंड डिजाइन से विजुअल कम्यूनिकेशन में पीजी कोर्स कराने के बाद आज उसका कोर्स समाप्त हो रहा है। इस बीच वह नौ महीने के लिए भारत सरकार की और से पाकिस्तान के लाहौर में भी रही। यहाम बंगलोर में उसका प्रोजेक्ट भारत और पाक के एक नामालूम सी लगनेवाली हस्ती पर था और वह था दोनों जगह के औतोरिकशावालों की बातचीत। इस बातचीत के माध्यम से उसने दोनों देशों के एक आम नागरिक की हैसियत से दोनों देशों के सोच को दिखाना चाहाता। और इसका माध्यम उसने कबूतर को चुना। कबूतर को संदेशवाहक कहा और माना जाता रहा है। इसी के माध्यम से उसने अपनी बात कहने की कोशिश की। कहना ना होगा की उसका यह प्रयास बहुत सफल रहा। उसके स्कूल के एग्ज्बिशन में उसका काम सबसे ज़्यादा पसंद किया और सराहा गया। यहाँ तक की लोगों ने उसे यहाँ भी एग्जिबिशन की स्टार कहा। अपने काम का यह संतोष उसे तो है ही, हम दोनों को भी हाय। उसके टीचर और दीं ने कहा की हम बेहद सौभाग्यशाली माता-पिटा हैं की हमें ऎसी प्रतिभावान बेटी मिली है। मैं इसे अपना सौभाग्य तो मानती ही हूँ, साथ में, उसकी अदम्य मेहनत और साहस की तारीफ़ भी करती हूँ। वह सेल्फ्मेद है और इसका मुझे अभिमान है। आज शाम में उसका कन्वोकेशन है। हम दोनों बंगलोर में हैं और शाम में उसे अपने काम के लिए सम्मानित होता देखेंगे। वैसे ही, जब हम लाहौर में थे और उसे पंजाब के गवर्नर द्वारा सम्मानित होते देखा था। मुझे यकीन है की ये दोनों बहने अपने अपने क्षेत्र में खूब नाम करेंगी। तोषी की टीचर ने तो कहा भी की इसका काम अंतर्राष्ट्रीय स्टार का है। देश में इसके काम को पहचाननेवाले शायद ना मिलें।

कोशी और दाल - भात

दफ्तर के काम से मुझे अक्सर बाहर दौरे पर जाना पङता है। कल भी गोवा गई। सुबह गई और शाम को लौट आई। गोवा की फ्लाईट एक घंटे की है और एयरपोर्ट से घर पहुँचाना भी एक घटा ले लेता है ट्रैफिक की वज़ह से। आजकल मेरी बहन और बहनोई आए हुए हैं। वे भी पुणे गए थे और लौट रहे थे, शाम में। हम दोनों ही अपने-अपने गंतव्य से लगभग एक ही समय घर पहुंचनेवाले थे। हम दोनों ही थके हुए। दीदी बड़ी है, इसलिए माँ सरीखा ममतापन उसमें है और चूंकि घर मेरा है (यह अलग मुद्दा है कि औरतों का भी घर होता है क्या?), इसलिए पूरे रास्ते मैं यह सोचती आ रही थी कि घर पहुंचाते ही क्या- क्या बना दूँगी खाने के लिए।
रात के सवा नौ बजे के करीब मैं घर पहुँची और यह देखकर बहुत सुखद लगा कि कोशी ने अपने मन सेसभी के लिए दो कुकर में अलग-अलग दाल-चावल बना कर रख दिया है। अब मुझे केवल सब्जी और चपाती बनानी थी। आजकल वह कॉलेज जाने लागी है। कॉलेज जाने से उसका आत्म विश्वास काफी बढ़ा है। वह अपने कॉलेज के सालाना समारोह की वर्किंग कमिटी में आ गई है। अपना काम बहुत सलीके और लगन, उत्साह से कर रही है। दूसरे, अपनी दीदी तोषी में उसकी जान बसती है। आप उसके ख़िलाफ़ कुछ बोल दें, तो शायद वह आपकी जान लेने से भी न हिचके।
उसमं आ रही यह तब्दीली उसके अपने विकास के लिए जरूरी तो है ही, हमें यह सुकून देती कि वह जो भी करेगी, अच्छा करेगी और जिम्मेदारी के साथ करेगी। कल ही उसने यह भी कहा कि उसकी परीक्षा शुरू होनेवाली है और अब उसने पढ़ना शुरू कर दिया है। बात दाल -भात से निकलकर यहाँ तक आ गई । यह सब उसी की महिमा है।

बिल्ली, उसके बच्चे और तोषी, कोशी

कल अचानक तोषी ने बताया कि बिल्डिंग की सीढ़ी के कोने पर बिल्ली ने बच्चे दिए हैं। फ़िर कोशी ने भी बताया और कहा, चलो देखने। देखा, पूरे मातृत्व भाव में पगी हुई बिल्ली। चार बच्चे उसने दिए थे। चारो माँ के दूध में मुह घुसाए पड़े थे और माता राम आराम से बेफिक्र हो कर बच्चों को लिपटाए हुई थीं। बचपन में माँ कहती थी कि बिल्ली अपने बच्चे को मुंह से पकड़ सात घर घुमाती है। कई बार इस दृश्य को देखा भी था। अब ऐसा है या नहीं, पता नहीं। लेकिन कोशी उसकी फ़िक्र में लगी रहती है। अभी वह १५ अगस्त के कार्यक्रम के लिए डांस का अभ्यास कर रही है। लौटते में सीदी से आई या लिफ्ट से, यह तो मालूम नहीं, मगर आकर कहने लगी, "बिल्ली के लिए कुछ खाना है? उसका खाना ख़तम हो गया है।" मिट्टी का एक बर्तन उसके हाथ में था। उसके लिए वह दूध -रोटी लेकर गई। जानवरों और बच्चों से उसे कुछ ज़्यादा ही लगाव है। अभी बच्चों के रोएँ आने शुरू हो रहे हैं। अभी उसके रोजा दिन के किस्से शुरू होंगे-बिल्ली व् उसके बच्चों को लेकर। मैंने देखा है, जिन बच्चों का घरेलू जानवरों के साथ लगाव रहता है, उनमें बहुत सी परिपक्वाताएं आती हैं, समझदारी व् संवेदनशीलता अधिक होती है। अपनी दिक्कतों के कारण हम जानवर तो नहीं पाल सके। तोषी भी बचपन में इसके लिए काफी इसरार करती रही थी। हालात ने हमें इसकी इजाज़त नहीं दी, मगर जैसे हमने कभी भी इन्हें दूसरी माताओं की तरह मिट्टी पर, मिट्टी से खेलने से रोका नहीं, उसी तरह कभी जानवरों के साथ दोस्ती करने से भी नहीं रोका। आज दोनों ही अपनी अपनी जगह इतनी संवेदनशील हैं। इसका कुछ तो श्रेय इन मूक जानवरों को तो देना ही होगा।

कोशी की सफलता और उसकी संवेदनशीलता

हमारी आशा के विअपरीत कोश्य्य १०वी के इम्तहान में ७६% अंक लाई। उसके खिलानादाद स्वभाव ने मुझे बहुत दारा रखा था। उसकी यह अप्रत्याशित सफलता हम सभी को अभिभूत कर गई। कहने को आज के अंक आधारित जगत में ७६% का कोई महत्त्व नही, मगर हमने कभी भी अपने बच्चों को अंकों की होड़ में जाने देना नही चाहा। बस यह चाहा की वे आगे बढें, कुछ करे, और इसके लिए पढाई ज़रूरी है, सो वे पढ़े। तोषी ने तो ख़ुद को बेहद अच्छे से स्थापित कर लिया है, अब कोशी के सेटल होने की बात है।
उसकी सफलता के साथ-साथ उसकी संवेदनशीलता भी गौर कराने वाली है। नौन्वेज खाने में उसकी जान बसती है। यह गुन बच्चों में अजय से आया है। लेकिन कल जब घर में मछली बनी, तो कोशी ने खाने से इनकार कर दिया। पूछने पर बताया की बारिश में मछली नही कहानी चाहिए, क्योंकि यह उसके ब्रीडिंग का समय होता है। एक मछली को खा जाने से न जाने कितनी मछलियों को संसार में आने से हम रोक देते हैं।
समय-समय पर इस तरह की कई बातें हामी चुंका देती हैं। मुझे लगाने लगता है की अब वह बड़ी हो गई है और समझदार भी। संवेदना आगे भी उसकी बनी रहे, उसकी ही नहीं, बल्कि सभी की बनी रहे, यह कामना है।

अपने ही देश में सांस्कृतिक झटके झेल रही तोषी

कल तोषी लाहौर से लौट आई- दिल्ली। दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर एक आम औपचारिकता की ठस रुई मी सने स्वागत वचन से उसका भी स्वागत हुआ। आने से पहले कुछ तकनीकी कारणों से उअसके अन्य दोस्त नहीं आ सके। इससे वह दुखी तो थी ही। सारे समय विमान में बैठकर रोंती आई। दोस्तों, जगह, वहाँ के लोगों से बिछड़ने के गम के साथ- साथ अचानक घटी यह घटना। इमाग्रेशन चेक के बाद उसके पास फोन नईं रह गया था, वहां के लोकल फोन न होने के कारण। उसने एकदम से बाल हठ की कि अपने इन दोस्तों से बात किए बिना वह विमान में बैठेगी ही नही, और हैरानी भरी खुशी यह कि उसकी यह इच्छा पीआईए यानी पाकिस्तान इन्तारानैशानल एयर लीं के अधिकारियों ने पूरी की।
दिल्ली हवाई अड्डे पर भी उसकी यही पुकार रही कि मुझे दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर नहीं, लाहौर के अलामा इकबाल हवाई अड्डे पर उतरना है। यह एक सान्स्क्रिय्तिक मांग है। मुझे पता नहीं कि भारत का कोई हवाई अड्डा देश के किसी भी साहित्यकार के नाम पर हो। मफ्गर पाकिस्तान में ऐसा है।
दिल्ली में आने के बाद यहां के लोगों की बात-चीत के टोन से उसे लगात्तार झटके डर झटके लग रहे हैं। वह यही कहती फ़िर रही है कि "कर लेते हैं भैया, इसमें इतना चीखने की क्या ज़रूरत है। ज़रा प्यार से तो बोलो।" यह प्यार बाहरी बोली अब वह मिस कर रही है। वहाँ का ऍम आदमी भी अपने लहजे में पूरादाब व कायदे बरतता है। ऑटो, तैक्सीवाले, भी 'आयें,' बैठें, देखें, करें, बिटिया से संबोधित करता है। सबसे पहले शहर में घुसते ही उसके मुंह से निकला- "उफ़, कितनी गंदगी है?' मैं हंस पडी। अभी उसका मुम्बई आना बाक़ी ही है।
यह सब अपने देश को कमतर करके आंकने की कोअशिश नहीं है। यह चंद वे बातें हैं, जिनसे हमारा -आपका जीवन रोजाना प्रभावित होता है, फ़िर ये ही बातें हमारी आम आदतों में तब्दील हो जाती हैं। तोषी को फ़िर से यहाँ के जीवन के अनुसार ढलना होगा। मगर जहाँ कहीं भी उसे वहाँ की बेहतरी नज़र आयेगी, उसके मुंह से उफ़ तो निकलेगा ही- हमारी-आपकी तरह- सहज, सामान्य।

तोषी -कोशी को समर्पित यह पुरस्कार

आज तोषी अपने ९ महीने की पाकिस्तान -पढाई की मियाद पूरी करके भारत लौट रही है। उसके स्वर में एक साथ देश लौटने की खुशी व उत्तेजना है तो दूसरे स्वर में वहां के लोगों से बिछड़ने के गम भी। लाहौर में उसे इतना प्यार, सम्मान, मिला, जितने कि हमने कल्पना तक न की थी। उसकी दीन सलीमा हाशमी ने मुझसे कहा यहा कि "आप अपनी बेटी को हमें वक्फ में दे दीजिये।'' ९ महीने के दरमियाँ उसके २ एकल और ३ ग्रुप शो हुए। उसके काम के लिए उसे वहाँ के पंजाब के गवर्नर द्वारा सम्मानित किया गया। अपने शो के दुरान अपने काम को लेकर वह प्रेस और मीडिया में छाई रही।

आज वह लौट रही है और अज ही मुझे एक ड्राइंग प्रतियोगिता में पुरस्कार मिला। चित्र बनाना मुझे आता नहीं, लेकिन उसेदेखके जो थोडा बहुत समझ पाई, उसमें धर दी कोशी ने। आज जब यह पुरस्कार ले रही थी, तो दोनों बहनें मेरे तसव्वर में थीं। आम तौर पर लोग कहते हैं कि माँ-बाप से बच्चों की पहचान बनाती है। लेकिन मुझे यहाँ यह कहते हुए गर्व हो रहा है कि यहाँ , आज मेरी पहचान मेरी तोषी, कोशी के कारण बनी है। कोशी ने ही बताया कि मुझे कैसे चित्र बनाना चाहिए और उसकी राय पर मैंने अमल किया। यह पुरस्कार मेरा नहीं, उन दोनों का है।

इस साल के कुछ संयोग रहे हैं कि एक साथ, एक ही दिन दो-दो अहम् घटनाएँ होती रही हैं।- मेरा जन्म दिन और अजय को पुरस्कार, हमारी शादी की २५वीन् सालगिरह और तोषी को पुरस्कार और आज उसका लौटना और मुझे पुरस्कार। इस संयोग को नमस्कार और तोषी व कोशी के लिए यह इनाम।

तोषी और लाहौरियों का एक -दूजे के लिए बढ़ता मोह

जैसे -जैसे तोषी (विधा सौम्या) के लाहौर से लौटने के दिन नज़दीक आते जा रहे हैं, उसका जगह और वहाँ केलोगों का उसके प्रति मोह बढ़ता ही जा रहा है। तोषी अब यह सोचा कर नर्वस हो रही है कि अब यह शहर, यहाँ के लोगुससे छूट जायेंगे। वह कहती है, बंगलूर में ऐसा नहीं हुआ क्योंकि वहाँ किसी से इस तरह के रिश्ते बने ही नहीं। पर यहाँ तो हर कोई उसे बेटी, बहन बना लेते हैं और इत्ता इत्ता प्यार देते हैं कि वह डूब सी गई है। अभी-अभी उसकी पहचान एक परिवार से हुई। वहाँ दो बच्चियां भी हैं- एक आठ साल की एक तीन साल की। छोटी तो उससे इतनी हिल मिल गई कि उसके लौटने के वक़्त उसने उसके बौग, चप्पल सब छुपा दिए, कमरा बंद कर दिया, जोर-जोर से रोने लगी और रोते रोते कहती जा रही थी-'विधा आंटी, आप मत जाओ, मैं दूध भी पी लूंगी, आपको गाने भी सुनाउंगी, आपको डांस भी दिखाउंगी। आप जो कहेंगी, करूंगी। बस आप मत जाएं। तोषी कहती है, मुझे अपना बचपन याद आ गया, जब उमा आंटी वगैरह आती थीं तो वह उनके बैग आदि छुपा देती थी। उसके पह्के सभी दरबान चाचा, रसोइया चाचा उअर बाकी सभी लोगों की उससे शिकायत है कि आपने अपने अम्मी- अब्बू से हमारी मिलाकात नहीं करवाई। हमने उनके लिए ये बनाकर रखा था। हम उन्हें अपने घर ले जानेवाले थे। हम उनके साथ बातें करना चाहते थे। वह इन सबकी बातों औ उनके स्नेह में भीगती जा रही है। कहीं नहीं लग रहा कि यह दो ऐसे मुल्कों के बीच वाक़या हो रहा है, जो सियासी रूप में हमेशा एक दूसरे को शक के दायरे में घेरे रहते हैं। यहाँ तो बस दो ज़ज्बातों का मिलन है। मैं सलीम हाशमी ने पहले ही हमसे कहा कि इसे हमें वक्फ में दे देन। वार्डन घजाला कहती हैं तोषी से कि तुम हमें सारी पहनना सिखाओ। उसके कमरे की सफाई करनेवाली बाजी अपने लिए सादियाँ पाकर बेहद खुश हीन और दुआओं की झाडी लगा दी।
यह सब ऐसे देश में हो रहा है। जी हाँ, हमें खुशी और गर्व इस बात का है कि तोषी कम से कम एक इतिहास आर्च रही है, अपने काम के साथ अपने रिश्ते कायम कराने का, एक प्यार, मुहाबत भरा ज़ज्बा बनाने का। इतिहास में बेशक उसका नाम दर्ज न होगा, पर उसे और हमें भी इस बात का सुकून मिलेगा कि हमने मुहब्बत के चाँद बीज बोये हैं। इन बीज से इंशा अल्लाह अमन और भाईचारे के फूल खिलें और सारा चमन इनकी खुसब्हू से महक उठे। आमीन।

अपने जीने का अधिकार चाहिए बेटियों को

आप कहेंगे कि इस ब्लाग में मैं क्यों ऐसी बातें लिखने लगी हूँ। पर मुझे लगता है कि यह ज़रूरी है, इस ब्लाग के ज़रिये तो और ज्ज्यादा। आज ही एक ख़बर पढी कि एक लड़की को उसके पिटा ने इसलिए गोली मार दी, क्योंकि उसने प्रेम करके अपनी मर्जी से किसी दूसरी जाती के लडके के साथ शादी कर ली थी। गोली चूक गई तो उसने कुल्हाडी से उसके सिर, धड़ पर इतने वार किए कि उसकी वहीं पर मौत हो गई।
बेटियाँ क्या महज़ घर की इज्ज़त, आबरू, घर के नाम पर मर मिटने वाली एक जीव और एक दास्ताँ भर है, या वह इंसान भी है? उसे अपने जीने का, अपने जीवन पर सोचने का, अपना भला-बुरा जानने-पहचानने का हक है या नहीं? एक और जब दुनिया इतनी आगे बढ़ रही हाय, लड़कियां मिअथाकीय समय से लेकात्र अभी तक पुरुषों के कंधे से कंधा मिला कर चल रही हैं, ऐसे में इस तरह की बातें हमारे मन को तोड़ती व झकझोरती हैं। हम समझ नहीं paate कि हम भारती मिश्र, द्रौपदी, सीता, कैकेयी, सुनीता विलियम, कल्पना चावला आदि को देखीं या वासना, अहम् और झूठी मान-मर्यादा का शिकार होती इन मासूमोंन को देखें। मैं इन उत्कर्ष बालाओं को देखते हुए भी इन मासूमों से नज़रें नहीं फेर सकती, यह कह कर कि यह तो होता ही रहता। है। कहीं ना कहीं हमें इस और बढ़ना ही होगा, इस मानसिकता के ल्हिलाफ आवाज़ उठानी ही होगी। बेटियों को अपने जीने का अधिकार चाहिए। यह उसकी मांग नहीं, उसका हक है। सससाद में ३०% का आरक्षण मानागेवाले इनदें। आम जीवन में आम बेटियों से उसका बचपन, उसकी खुशियाँ न छिनी जाएं। इस आम धरती पर की आम बेटियाँ इससे अधिक और कुछ नहीं चाहतीं।

बताएं, क्या करें बेटियाँ

इस ब्लाग को अवार्ड मिल गया। निमित्त मेरा एक लेख बना। बेटियों के गर्वीले माँ-बाप अपनी बेटियों के बारे में लिख रहे हैं। में भी उनमें से एक हू। ख़ुद भी बेटी हू। कभी कभी तो बेटी ही बने रहने का ऐसा जी चाहता है कि अपनी ही बेटी से माँ जैसे बर्ताव की उम्मीद लगा बैठती हूँ। मगर बेटी होने के कई अवसाद ग्रस्त और खून खुअला देनेवाले वाकयात कभी कभी यह सोचने पर मज़बूर कर देते हैं कि हम बेटी क्यों हुए?

आज ही एक अखबार में एक ख़बर है कि ४ साल की बच्ची को उस व्यक्ति से मुक्त कराया गया जो यह विश्वास रखता है कि कम उम्र की अक्षत योनी कन्या के साथ सम्भोग करके वे कई बीमारियों से मुक्ति पा सकते हैं। यह केवल इस भ्रम या रुधि ही नहीं, वरन नई व अनूठी खोज के लोलुप के द्वारा भी एअसी घटनाएँ सुनाने को मिलाती हैं। कई तथ्यों से, सर्वेक्षणों से यह बात सामने आई है दुध्मुम्ही बच्चियाम अपने ही करीबी और रिश्तेदारों की लोलुपता का शिकार होती रही हैं।

बच्चियां बिचारी क्या करें? वे जन्मना छोर देन, या जनम कर किसी कोने में मुंह छुपाये रहें। इन नन्ही बच्चियों का व्यवसाय करनेवालों के लिए यह एक दीर्घ कालिक निवेश हाय। कितना सही शब्द है न बाज़ार का यह। एक उपभोग की वस्तु में तब्दील होती बेटियाँ, अपने तन से, मन से नकार दी जाती हुई।

मेरे मन में यह सवाल आता है कि आख़िर कौन हैं ये लोग? क्या वे आकाश से टपक आए हैं या उन्हें भी किसी बेटी ने ही अपनी कोख मी धारा होगा, अपने कलेजे का खून दूध मी बदल कर पिलाया होगा। उनकी भी तो कोई बहन होगी, जो अपने भाई पर इस चरम आस्था के साथ कि संकट में वह उसकी रक्षा करेगा, उसकी कलाई पर राखी बांधती होगी। उसकी भी तो पत्नी होगी, जो एक पूरे समर्पण और विश्वास के साथ अपनी पूरी दुनिया छोड़ कर आई होगी। उसकी भी तो बेटी होगी, जो उसके ही अंश से जन्मी है। ऐसा भीषण कृत्य करते हुए क्या उनके मन में इन सबकी कोई छवि नहीं उभरती?

जेल में अपने काम के दौरान कई बार ये सवाल उठे। वहां के अधिकारियों से भी बातें कीं। वे सब भी इस बात पर सहमत थे किएक बार तो खून के अपराध को गलती का अंजाम माना जा सकता है, मगर रेप को नहीं। लोक पर काम करते हुए मिथिला कि एक लोक कथा इस आशय की मिल गई। उसी समय दिल्ली में एक घटना हुई थी, जिसमें पिटा व भाई द्वारा एक लड़की लगतार १५ दिनों तक पिसती रही। मुझसे रहा नहीं गया और मैंने एक नाटक लिखा- 'अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो' मोहन राकेश सम्मान इसे मिला है। मगर यह मेरे लिए नरक कि कल्पना से भी ज़्यादः भयावह है। एक बारकिसी से कहा था किबच्चे, ख़ास कर बेटियाँ कभी खोये ना। खोने से अच्छा है कि वे मर जाएं। मित्र को यह बात बुरी लगी थी। आप सबको भी बुरी लग सकती है, मगर ज़रा सोचिये कि हम उस बच्ची को कैसा जीवन दे रहे हैं, जो किसी और की हवस कया शिकार बने और उस पर भी हमारा समाज ख़ुद को सभ्य कहता रहे। यह कैसी दुनिया है। जब कभी इस तरह की ख़बर पर ध्यान जाता है, मन अकुलाने लगता है। आप सब बेटियों के बाप हैं। ऐसों को केवल समाज का कोढ़ या जंगली जानवर, मानवता कया हत्यारा आदि कह देने से काम नही चलेगा। सोचिये कि क्या किया जाए ऐसा, जहाँ हमारी बेटियाँ सुरक्षित रहें। उनके मन पर इस तरह की कोई छाप ना परे, जो उनके पूरे जीवन कू सोख कर रख दे।

आकार

बेटियों की ललाई

बेटियों कि आस्था,

बेटियों पर विश्वास

बनता है एक सहज पुल

अचानक जब बेटी अपनी दहलीज लाँघ पार कर अति है सात दरियाओं का अनंत उद्गार।

बेटियाँ जब होती हैं, मन मलिन कर लेते हैं

पर भर आती हैं आँखे,

जब पार कर लेती हैं वे सूरज की ऊम्चाइयां

बेटी को अब मन नही करता

बोलूँ उसे दुर्गा, सीता, सरस्वती

छोर चुकी है वह अब इन प्रतिमानों को बहुत पीछे

अपने यहाँ एक खली ग्लास है

जिसमे से छलकती है उसकी सूरत

कुछ पहचानी सी

कुछ कुछ अनजानी सी

मन कबतक धरे धीर

बेटियों का आगमन होता रहे जलस्दी ज़ल्दी

भरे वह अपनी हँसी से मान का अंचल,

पिटा का दामन

बहन की मुस्कान

भाई की बने जान

बेतिया अब सगार पुत्र भी नही

वे हैं अनंत आकाश

हर सीमा के आर-पार।

तेरी मम्मी चुडैल जैसी

विमल भाई ने पंचमी कि बात की तो एकदम से उसकी याद ताज़ा हो आई। टैब हम सब एक ही बिल्डिंग मी रहते थे। पंचमी बहुत ही छूती थी। वाट कोशी के साथ खेलती। उन दिनों शहर मी विशाल भारद्वाज कि फ़िल्म 'मकडी' लगी थी। उसमे शबाना आज़मी ने चुडैल की भुमिका निभाई है। हमने भी वह फ़िल्म देखी। पंचमी ने भी देख रखी थी। सो दूसरे दिन जैसे ही कोशी नीचे पहुँची, उसने कहा, 'अए कोश्य्य, तेरी मामी ना, मकडी की चुडैल जैसी लगती है।' पता नहीं, क्या संयोग रहा है कि लोग अक्सर मेरी शक्ल की तुलना शबाना से कर देते हैं। कोशी को यह मालूम है, इसलिए उसने हम सबको आ कर बताया। हम सब खूब हँसे। एकाध दिन बाद विमल भाई, तनुजा, पंचमी हमारे यहाँ आए, कोशी ने यह ज़िक्र cheedaa। पति-पत्नी तो एकदम से सकपका गए। आख़िर कोई किसी के सामने ही उसे चुडैल कहे तो... तनुजा तो लगी पंचमी को डांटने। मैंने कहा कि अरे, यह तो उसने सही कहा है, मई लगती ही हूँ, उस चुडैल जैसी। और आप यह तो देखिये कि इस बच्ची ने कितने शार्प तरीके से इसे पकडा है।' विमल भाई, झेन्पिये मत, बेटी की बात का मज़ा लीजिये। आज उसे देख कर, उसके बारे मी पढ़ कर एकदम से उसकी याद ताज़ा हो गई। यह प्रसंग भी याद आ गया। उसे हमारा ढेरों प्यार.

कल तोषी सेलिब्रिटी बन गई लाहौर में

कल तोषी का दूसरी प्रदर्शनी को बहुत अच्छी प्रतिक्रिया मिली.काफी लोग आए और मीडिया से बात करते-करते थक गई.उसने बताया कि वह बहुत आह्लादित है.मैं भी खुश हूँ कि बेटी ने यह उपलब्धि हासिल की.हालांकि यह बेटियों का ब्लॉग है,लेकिन मुझे लिखते हुए खुशी हो रही है कि कल विभा रानी का रायपुर में शानदार शो हुआ.उन्होंने अपने नाटक का प्रदर्शन किया.उनकी कामयाबी भी एक बेटी की कामयाबी है.दो पीढियों की बेटियों की यह कामयाबी अच्छी लग रही है।
पेश है सुबह-सुबह तोषी की प्रदर्शनी पर छपी यह रपट:



Baji Nama tells a story on women's rights
Rabbia Arshad

LAHORE: A solo exhibition titled 'Baji Nama' by Vidha Saumya opened here by Safdar Aseff Ahmed Ali at the Niarang Art Gallery on Tuesday. Some 35 art pieces were put on display.Vidha Saumya is an Indian artist and came to Pakistan under the SAARC exchange programme. Talking to The Post, the artist said she had once been an admirer of a lady 'at my hostel. All my sketches are a tribute to her," she added.The exhibition revolves around the employment of a main theme, baji meaning elder sister. It is this character that inspires the artist wherein different postures, styles and gestures are drawn with poetic verses to add in detail to further illustrate the general idea.The medium used is pen alone on white paper to highlight the character. The work is said to be spell-bounding, to say the least.Scores of artists including Ambreen, Siama, Abid Khan, Michhoo, Shahid and Amad along with a good gathering of students all were present to view the work.Ambreen told The Post that the strokes and the lines 'are excellent, giving forth a strong effect.' "There is a story there. All packed in a serial form," she added while Abid Khan termed the work to be thought-provoking and centring on women's rights. He said the use of free hand technique paints a story of a woman entangled in typical cultural domestic troubles. The exhibition will continue till May 8.