पटना आओ मेरी लल्ली
हिंया उड़ी न तुम्हरी खिल्ली
देखे तुमको बरस हुए
जल्दी आओ मेरी लल्ली
राज़ की बात बताएं तुमको
ठंडी हो रही चिकन-चिल्ली
आओ-आओ मेरी लल्ली
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बहुत इसरार करने पर आखिर कोशी ने अपना ब्लॉग बना ही लिया. वह नई नई बातें सोचने में जितनी तेज़ है, उसे कार्यांवित करने में उतनी ही आलसी. यह ब्लॉग भी लगातार कोंचते रहने का नतीज़ा है. हालांकि कम्प्यूटर पर सारे कामों में वह मेरी मदद करती है, मुझे सिखाती है, मगर अपनी ही बातों के प्रति उदासीन है. हो सकता है, यह किशोर उम्र का तकाज़ा हो. आखिर हम जब इस उम्र में थे तो क्या कर लेते थे? कुछ भी नहीं. उस लिहाज़ से आज के बच्चे बडे तेज़, समय के साथ बल्कि समय से तनिक आगे ही हैं. 
आज मेरी तोषी का जन्म दिन है। यकीन नहीं होता की वह इतनी बड़ी हो गई है। केवल बड़ी ही नहीं, बेहद समझदार भी। उतनी ही संवेदनशील, उतनी ही सबके प्रति फिक्रमंद। अभी उसने अपने अनुभव के वितान को बड़ा करना चाहा है। इसके लिए उसने मुम्बई की एक आर्ट गैलरी ज्वायन की है। उसके अनुभव में इजाफा हो रहा है। अब वह स्वतन्त्र रूप से दुनिया को देखनेसमझाने, पहचानने की कोशिश में है। मुझे पूरा यकीन है की वह अपनी ख़ास जगह बना लेगी और ज़ल्दी ही। उसके जन्म दिन पर उसके लिए एक तोहफा-
जिस दिन तुमको ना देखूं मैं
मन जोर कहीं से कसकता है,
तेरी मुस्काती सूरत से
मन बहुत-बहुत ही हरासता है।
तुम अपनी बातों के गुच्छे से
खुशबू खूब बिखेरती हो
हो गई हो अब तुम बहुत बड़ी
पर फ़िर भी लगता नन्ही हो,
जैसे बरखा की धारा में
बून्दीन कोई मेंही हो
मेरे जीवन की रचना प्रथम
मेरी साँसों का तुम आधार
तुमसे पाई खुशियाँ सब
तुम ही अब जीवन अब संसार
छूटा है बहुत कुछ पाने में
छूटेगा बहुत कुछ पाने में
तुम साथ रहोगी, बनोगी बल
अफसोस न होगा जाने में
उनकी प्रतिमा, मेरी परछाईं
तेरा तो जीवन आगे है
थाम लो सूरज-चन्दा, तारे
बस तेरे लिए सब जागे हैं।
इस ब्लाग को अवार्ड मिल गया। निमित्त मेरा एक लेख बना। बेटियों के गर्वीले माँ-बाप अपनी बेटियों के बारे में लिख रहे हैं। में भी उनमें से एक हू। ख़ुद भी बेटी हू। कभी कभी तो बेटी ही बने रहने का ऐसा जी चाहता है कि अपनी ही बेटी से माँ जैसे बर्ताव की उम्मीद लगा बैठती हूँ। मगर बेटी होने के कई अवसाद ग्रस्त और खून खुअला देनेवाले वाकयात कभी कभी यह सोचने पर मज़बूर कर देते हैं कि हम बेटी क्यों हुए?
आज ही एक अखबार में एक ख़बर है कि ४ साल की बच्ची को उस व्यक्ति से मुक्त कराया गया जो यह विश्वास रखता है कि कम उम्र की अक्षत योनी कन्या के साथ सम्भोग करके वे कई बीमारियों से मुक्ति पा सकते हैं। यह केवल इस भ्रम या रुधि ही नहीं, वरन नई व अनूठी खोज के लोलुप के द्वारा भी एअसी घटनाएँ सुनाने को मिलाती हैं। कई तथ्यों से, सर्वेक्षणों से यह बात सामने आई है दुध्मुम्ही बच्चियाम अपने ही करीबी और रिश्तेदारों की लोलुपता का शिकार होती रही हैं।
बच्चियां बिचारी क्या करें? वे जन्मना छोर देन, या जनम कर किसी कोने में मुंह छुपाये रहें। इन नन्ही बच्चियों का व्यवसाय करनेवालों के लिए यह एक दीर्घ कालिक निवेश हाय। कितना सही शब्द है न बाज़ार का यह। एक उपभोग की वस्तु में तब्दील होती बेटियाँ, अपने तन से, मन से नकार दी जाती हुई।
मेरे मन में यह सवाल आता है कि आख़िर कौन हैं ये लोग? क्या वे आकाश से टपक आए हैं या उन्हें भी किसी बेटी ने ही अपनी कोख मी धारा होगा, अपने कलेजे का खून दूध मी बदल कर पिलाया होगा। उनकी भी तो कोई बहन होगी, जो अपने भाई पर इस चरम आस्था के साथ कि संकट में वह उसकी रक्षा करेगा, उसकी कलाई पर राखी बांधती होगी। उसकी भी तो पत्नी होगी, जो एक पूरे समर्पण और विश्वास के साथ अपनी पूरी दुनिया छोड़ कर आई होगी। उसकी भी तो बेटी होगी, जो उसके ही अंश से जन्मी है। ऐसा भीषण कृत्य करते हुए क्या उनके मन में इन सबकी कोई छवि नहीं उभरती?
जेल में अपने काम के दौरान कई बार ये सवाल उठे। वहां के अधिकारियों से भी बातें कीं। वे सब भी इस बात पर सहमत थे किएक बार तो खून के अपराध को गलती का अंजाम माना जा सकता है, मगर रेप को नहीं। लोक पर काम करते हुए मिथिला कि एक लोक कथा इस आशय की मिल गई। उसी समय दिल्ली में एक घटना हुई थी, जिसमें पिटा व भाई द्वारा एक लड़की लगतार १५ दिनों तक पिसती रही। मुझसे रहा नहीं गया और मैंने एक नाटक लिखा- 'अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो' मोहन राकेश सम्मान इसे मिला है। मगर यह मेरे लिए नरक कि कल्पना से भी ज़्यादः भयावह है। एक बारकिसी से कहा था किबच्चे, ख़ास कर बेटियाँ कभी खोये ना। खोने से अच्छा है कि वे मर जाएं। मित्र को यह बात बुरी लगी थी। आप सबको भी बुरी लग सकती है, मगर ज़रा सोचिये कि हम उस बच्ची को कैसा जीवन दे रहे हैं, जो किसी और की हवस कया शिकार बने और उस पर भी हमारा समाज ख़ुद को सभ्य कहता रहे। यह कैसी दुनिया है। जब कभी इस तरह की ख़बर पर ध्यान जाता है, मन अकुलाने लगता है। आप सब बेटियों के बाप हैं। ऐसों को केवल समाज का कोढ़ या जंगली जानवर, मानवता कया हत्यारा आदि कह देने से काम नही चलेगा। सोचिये कि क्या किया जाए ऐसा, जहाँ हमारी बेटियाँ सुरक्षित रहें। उनके मन पर इस तरह की कोई छाप ना परे, जो उनके पूरे जीवन कू सोख कर रख दे।
आकार
बेटियों कि आस्था,
बेटियों पर विश्वास
बनता है एक सहज पुल
अचानक जब बेटी अपनी दहलीज लाँघ पार कर अति है सात दरियाओं का अनंत उद्गार।
बेटियाँ जब होती हैं, मन मलिन कर लेते हैं
पर भर आती हैं आँखे,
जब पार कर लेती हैं वे सूरज की ऊम्चाइयां
बेटी को अब मन नही करता
बोलूँ उसे दुर्गा, सीता, सरस्वती
छोर चुकी है वह अब इन प्रतिमानों को बहुत पीछे
अपने यहाँ एक खली ग्लास है
जिसमे से छलकती है उसकी सूरत
कुछ पहचानी सी
कुछ कुछ अनजानी सी
मन कबतक धरे धीर
बेटियों का आगमन होता रहे जलस्दी ज़ल्दी
भरे वह अपनी हँसी से मान का अंचल,
पिटा का दामन
बहन की मुस्कान
भाई की बने जान
बेतिया अब सगार पुत्र भी नही
वे हैं अनंत आकाश
हर सीमा के आर-पार।
कल तोषी का दूसरी प्रदर्शनी को बहुत अच्छी प्रतिक्रिया मिली.काफी लोग आए और मीडिया से बात करते-करते थक गई.उसने बताया कि वह बहुत आह्लादित है.मैं भी खुश हूँ कि बेटी ने यह उपलब्धि हासिल की.हालांकि यह बेटियों का ब्लॉग है,लेकिन मुझे लिखते हुए खुशी हो रही है कि कल विभा रानी का रायपुर में शानदार शो हुआ.उन्होंने अपने नाटक का प्रदर्शन किया.उनकी कामयाबी भी एक बेटी की कामयाबी है.दो पीढियों की बेटियों की यह कामयाबी अच्छी लग रही है।