मैं वहाँ गया; जो पता पिछली पोस्ट में दिया था.
चौंक पूरे गए थे. जगह-जगह बंदनवार बंधे थे. बेटी का जन्मदिन था. ज़्यादा तफसील में जाने की जरूरत मैं नहीं समझता. बस इतना ही कि उद्दी को ग्रामीण क्षेत्र में हिन्दी माध्यम से भी पढ़ते हुए आठवीं कक्षा में ९० प्रतिशत अंक मिले हैं. यह सारे सर्वेक्षणों से कहीं अधिक है.... और मध्य प्रदेश में आठवीं अब बोर्ड नहीं रहा इसलिए इसे उदारता न समझा जाए. वह पांचवीं में ९५ प्रतिशत अंकों से पास हुई थी जो कि बोर्ड था.
माफ़ कीजियेगा, बेटी की बात है इसलिए गर्व हुआ।
आते-आते बेटी से मैंने पूछा कि तुम्हें क्या चाहिए? बेटी ने कहा कि पिछली बार उसे जो साइकल दिलाई थी वह नाकाफी है, अब उसे मोटरसाइकल चाहिए। बाप तो कभी बैठा नहीं, अब मैं उसे मोटरसाइकल दिलाने के जुगाड़ में भिड़ा हुआ हूँ.
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अपने जीने का अधिकार चाहिए बेटियों को
आप कहेंगे कि इस ब्लाग में मैं क्यों ऐसी बातें लिखने लगी हूँ। पर मुझे लगता है कि यह ज़रूरी है, इस ब्लाग के ज़रिये तो और ज्ज्यादा। आज ही एक ख़बर पढी कि एक लड़की को उसके पिटा ने इसलिए गोली मार दी, क्योंकि उसने प्रेम करके अपनी मर्जी से किसी दूसरी जाती के लडके के साथ शादी कर ली थी। गोली चूक गई तो उसने कुल्हाडी से उसके सिर, धड़ पर इतने वार किए कि उसकी वहीं पर मौत हो गई।
बेटियाँ क्या महज़ घर की इज्ज़त, आबरू, घर के नाम पर मर मिटने वाली एक जीव और एक दास्ताँ भर है, या वह इंसान भी है? उसे अपने जीने का, अपने जीवन पर सोचने का, अपना भला-बुरा जानने-पहचानने का हक है या नहीं? एक और जब दुनिया इतनी आगे बढ़ रही हाय, लड़कियां मिअथाकीय समय से लेकात्र अभी तक पुरुषों के कंधे से कंधा मिला कर चल रही हैं, ऐसे में इस तरह की बातें हमारे मन को तोड़ती व झकझोरती हैं। हम समझ नहीं paate कि हम भारती मिश्र, द्रौपदी, सीता, कैकेयी, सुनीता विलियम, कल्पना चावला आदि को देखीं या वासना, अहम् और झूठी मान-मर्यादा का शिकार होती इन मासूमोंन को देखें। मैं इन उत्कर्ष बालाओं को देखते हुए भी इन मासूमों से नज़रें नहीं फेर सकती, यह कह कर कि यह तो होता ही रहता। है। कहीं ना कहीं हमें इस और बढ़ना ही होगा, इस मानसिकता के ल्हिलाफ आवाज़ उठानी ही होगी। बेटियों को अपने जीने का अधिकार चाहिए। यह उसकी मांग नहीं, उसका हक है। सससाद में ३०% का आरक्षण मानागेवाले इनदें। आम जीवन में आम बेटियों से उसका बचपन, उसकी खुशियाँ न छिनी जाएं। इस आम धरती पर की आम बेटियाँ इससे अधिक और कुछ नहीं चाहतीं।
बेटियाँ क्या महज़ घर की इज्ज़त, आबरू, घर के नाम पर मर मिटने वाली एक जीव और एक दास्ताँ भर है, या वह इंसान भी है? उसे अपने जीने का, अपने जीवन पर सोचने का, अपना भला-बुरा जानने-पहचानने का हक है या नहीं? एक और जब दुनिया इतनी आगे बढ़ रही हाय, लड़कियां मिअथाकीय समय से लेकात्र अभी तक पुरुषों के कंधे से कंधा मिला कर चल रही हैं, ऐसे में इस तरह की बातें हमारे मन को तोड़ती व झकझोरती हैं। हम समझ नहीं paate कि हम भारती मिश्र, द्रौपदी, सीता, कैकेयी, सुनीता विलियम, कल्पना चावला आदि को देखीं या वासना, अहम् और झूठी मान-मर्यादा का शिकार होती इन मासूमोंन को देखें। मैं इन उत्कर्ष बालाओं को देखते हुए भी इन मासूमों से नज़रें नहीं फेर सकती, यह कह कर कि यह तो होता ही रहता। है। कहीं ना कहीं हमें इस और बढ़ना ही होगा, इस मानसिकता के ल्हिलाफ आवाज़ उठानी ही होगी। बेटियों को अपने जीने का अधिकार चाहिए। यह उसकी मांग नहीं, उसका हक है। सससाद में ३०% का आरक्षण मानागेवाले इनदें। आम जीवन में आम बेटियों से उसका बचपन, उसकी खुशियाँ न छिनी जाएं। इस आम धरती पर की आम बेटियाँ इससे अधिक और कुछ नहीं चाहतीं।
पिता के नाम एक बेटी का पत्र
हमारे ब्लॉगजगत की एक महिला ब्लॉगर ने इस ब्लॉग के लिए मुझे एक पत्र भेजा है और निवेदन किया है इसे बेटियों वाले ब्लॉग पर प्रकाशित किया जाए। इन्होने बेटियों की तरफ़ से अपनी बात कहने की कोशिश की है। मै उनके पत्र मे किसी भी तरह का संपादन न करते हुए, उसको ज्यों का त्यों प्रकाशित कर रहा हूं।आदरणीय पापा जी,
सादर चरण स्पर्श
पापा जी मेरा यह पत्र आप तक नही पहुंचेगा, मै यह जानती हूं। फिर भी लिख रही हूं इस आशा में कि शायद आप पढ़ लें। पापा जी, आप जानते हैं, आप जो हर बात पर यह कहते हैं, कि मै बेटी का बाप हूं, यह बात मुझे बहुत अखरती है। क्यूंकि आपके कहने का लहजा मुझे पसन्द नही है। आप जानते हैं, क्या बीतती है मुझ पर? या क्या आप कभी जानने कि कोशिश करते हैं? नही न! मै जानती हूं। हां, अब तक मै यह समझ गयी हूं कि बेटी का बाप होना बहुत ही जिम्मेदारी का काम है। पर पापा जी मै आपको यक़ीन दिलाना चाहती हूं कि, मै आपकी जिम्मेदारियों मे आपका हाथ बटाऊंगी। आपकी सभी परेशानियों का समाधान भले ही न बन सकूं लेकिन अपनी तरफ से पूरा कोशिश करूंगी। मै हमेशा से यह जानती आयी हूं कि आप मेरी जगह एक बेटे को देखना चाहते थे। इसलिये मेरा होना आपको पसन्द नहीं। लेकिन अब मेरा जन्म हो ही चुका है तो इसमे मेरी कोई भूल नही। मै भी आपका ही अंश हूं। फिर ऐसा क्या है, जो एक बेटा कर सकता है और मै नहीं कर सकती? ऐसा भी नही है कि अब तक मैने जो किया है उस जगह बेटा होता तो इससे ज्यादा करता। उदाहरण के तौर पर अपने चचेरे भाइयों को जब मै देखती हूं तो लगता है मै उनसे कही ज्यादा उड़ सकती हूं। फिर भी आप मेरे पंख बांधे रखना चाहते हैं। भाई की छोटी से छोटी सफलता पर जहां आपका सर गर्व से उठ खड़ा होता है, वहीं पर मै आपको दिखती तक नही? मेरा मन तब यह जानने को इच्छुक होता है कि क्या आपके ही इस अंश को जीने का कोई हक नही?
पापा जी, बचपन से आप मेरे आदर्श रहे। दादा जी आपके किस्से हमेशा सुनाते थे। वो हमेशा कहते कि आप समाज की परवाह नही करते थे। बहुत मेहनतकश इंसान थे। जब भी कोई निश्चय कर लेते ते तो उसे पूरा करके ही दम लेते थे। मेरे मष्तिस्क पर इन कहानियो की अमिट छाप रही। और मै भी आपके नक्शो-कदम पर चलने के लिये उतारू हुई। पर यह क्या?? जब मेरे उड़ने का वक्त आया, आपको समाज का भय खाने लगा। जब मै अपनी राह पर बढ़ने को उतारू हुई, आपके अपने ही विचारों के बन्धन ने मुझे बांध लिया। आपने मुझे सोचने पर मजबूर किया कि क्या मै उसी इंसान की बेटी हूं जो मेरा आदर्श है? या आदर्श सिर्फ पुरूष समाज के लिए ही है। कुछ कर गुजरने की क्षमता सिर्फ पुरूषों की ही धरोहर होती है, हमारा उस पर कोई हक नही है? फिर पापा जी आप किस समाज से लड़े? यह समझना बहुत ही मुश्किल है, उसी समाज से आपकी ही बोली बोलेगा, या फिर वो समाज जिसे आपने अपने विचारों से बनाया तो और उसी के अधीन हो गये? इन दोनों में से कोई भी बात सच हो तो लगेगा कि मेरा हीरो कोई और ही था। लेकिन आज भी मै अपनी बात पर अडिग हू। आप ही मेरे हीरो हैं, और मै अपनी इस बात को साबित करने के लिए, इतनी मेहनत करूंगी, कि एक दिन आप भी गर्व से सर उठा कर अपनी बनी बनायी इस समाजिक परम्परा का बहिष्कार करेंगे, जो कहता है बेटी का बाप होना जिम्मेदारी का काम है। मै इस समाज को मजबूर कर दूंगी यह कहने के लिए आप इस समाज के हीरो है जो नया रास्ता बनाता है। सिर्फ बनाता ही नहीं उस पर सफलता से चल कर भी दिखाता है।
मेरा हर कदम सिर्फ आपके लिए ही होगा।
आपकी बेटी
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