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"एक्सप्लोसिव्स" में तोषी ने उकेरा ड्राइंग का एक नया पन्ना


आज जब हिन्दुस्तान और पाकिस्तान दोनों ही देश एक दूसरे के खिलाफ आग उगल रहे हैं, वैसे में तोषी यानी विधा सौम्या अपनी कला के माध्यम से दोनों देशों के बीच एक नया पुल रचने की प्रक्रिया में है. ज़ाहिर है कि पुल निर्माण की इस प्रक्रिया में वह अकेली नहीं है. उसके पाकिस्तान के दोस्त और शुभचिंतक भी हैं, जिनके लिए कला और अभिव्यक्ति एक दूसरे को समझने के बेहतरीन माध्यमों में से एक है.
आज तोषी के आर्ट एक्जीबिशन की ओपनिंग है- लाहौर के "ग्रेनॉयज" आर्ट गैलरी में. अपने लाहौर प्रवास में उसके चित्रों की कई एकल व ग्रुप प्रदर्शनियां हो चुकी थी. हिन्दुस्तान आने के बाद लाहौर के लिए यह उसकी पहली प्रदर्शनी है. मुंबई में उसका एक ग्रुप शो हो चुका है.
"एक्सप्लोसिव्स" नाम से 15 ड्राइंग के सेट की एक पूरी की पूरी किताब इस प्रदर्शनी में है. इस ड्राइंग के सेट में आज शहर में एक शहरी तरीके से जी रहे जीवन के अन्दाज़ को अपनाए हुए उन लोगों के बारे में कहा गया है जो शहर में रहते हुए और शहर की नज़ाकत के साथ पलते हुए मीडिया और पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से सेक्स और सेक्स की दुनिया को समझने की कोशिश करते हैं और तदनुसार उसे अपने जीवन में ढालने का प्रयास करते हैं. और इस तरह से सेक्स उनके जीवन में एक योजनाबद्ध रूप में प्रस्तुत होता है.
इस ड्राइंग के सेट में साहित्य में व्यंग्य की तरह इन रेखा चित्रों में व्यंग्य कुछ कुछ कार्टून की शक्ल में आते हैं, जो लोगों को तनिक हंसाते, तनिक गुदगुदाते हैं. किंतु, व्यंग्य रचना की तरह ही यह जीवन के उन गहरे पन्नों को भी खंगालने की कोशिश करते है.
प्रदर्शनी में गई पुस्तक मूल पुस्तक का प्रिट फॉर्म है. यह हाथ से बनाई एक किताब के रूप में है और इसी रूप में इसे प्रदर्शनी में रखा जा रहा है. इसे डिजिटली पुन:प्रस्तुत किया गया है, मगर इतनी सफाई से कि यह मूल कार्य का सुख देता है. बन्द रूप में यह किताब 10x8.5" इंच व खुले रूप में 10x17" इंच की है. यह प्रदर्शनी 25 -30 अक्तूबर, 2009 तक चलेगी.

लाहौर तू बड़ा याद आयेगा मुझे

तोषी लौट आई है और इन दिनों अपनी लाहौर परियोजना पर काम कर रही है ।प्रस्तुत है उसका लिखा एक शब्द चित्र लाहौर के बारे में ...


नीले रंगबिरंगे रिक्शे
उनमें बैठे सलवार कमीज पहने ड्राईवर
आँखों के इशारे से रिक्शा रोकना
उचक कर तंग रिक्शों में
बैठना चाचा से पैसे तय करना
पर्देदार रिक्शों में महफूज़ महसूस करना
टूटे धूमिल आईनों में अपना हुलिया संवारना

रिक्शेवालों से गुफ़तगू
अपनापन सा लगना
इंडिया की बातें
उनकी आंखों का चमकना
उनकी आवाज़ की उठान
मंजिल पहुँचते-पहुँचते दोस्ती हो जाना
शुक्रिया मेहरबानी का छिडकाव
ये सब तो याद आएगा ही
भूलेगा नहीं उतारते वक्त कुरते का कील पर अटक कर फट जाना

मौसम का बदलना
बसंत के रंगबिरंगे फूल
आतिशी रंगत
यूँ लगता हो जैसे बस आप ही के लिए खिले हैं ये फूल
जैसे मौसम खेल रहा हो होली

सुर्ख गुलाबी चेहरे
झुर्रियों में भी चमक
ऊंची पायंचों वाली सलवार
ऊंची चानकों से झांकती बालाओं की कमर
गोरी चिट्टी ...आटे की लोई
मैचिंग मैचिंग का अंदाज़
लांडा कैसे घूमूंगी अब
परांदे वाली चप्पलें भी कुछ सालों में घिस ही जायेंगी
चाचा चाचा के नारे कौन लगायेगा
आते जाते बाजी कौन बुलाएगा

बिंदी लगाकर कहाँ इतराऊंगी
मैं साड़ी पहन किसे कमर दिखाऊंगी मैं
कहाँ लगेगा अब कुछ भी खास
धूल भी तो नहीं होगी तेरी मेरे पैरों के पास

आँखों ही आँखों में से इशारे करूंगी अब
माशाल्लाह की छेड़खानी कौन करेगा अब

इतने सारे हरे रंग कहाँ नज़र आयेंगे मुझे
साफ़ सड़कों पर पानी कैसे देखूँगी
इंडिया से आती नहर का भी नज़ारा नहीं होगा अब
कुछ तो हमेश जुड़ा है
ये दिलासा कौन देगा अब

इंडिया से आए मेहमान को देख
चमकती आंखों का नज़ारा न होगा अब
टूटे फूटे सवालों का जवाब कैसे दे सकूंगी अब
इंडिया की तारीफ किस से करूंगी अब
अपने मुल्क के बारे में सब नायाब कैसे लगेगा अब

गंदे नाले के पास से गुजरने पर
बॉम्बे कैसे याद आएगा अब

लेस गोटे का फैशन कैसे दिखेगा अब
ऊंची सलवारों का नज़ारा भी न होगा अब
ऊंची सलवार पहनना कितना अटपटा लगेगा अब

कैसे पियूंगी बोतल हर दुकान पर
चाय बोतल का कौन पूछेगा अब
फ़ोन रिसीव करके सिर्फ़ हेल्लो बोलेंगे अब लोग
सलाम वाले कुम बहुत याद आएगा अब

मुर्गियों की दावत बहुत खास लगेगी अब
कोक भी ठंडी नहीं ठंडा होगा अब
शोएब की जगह आमिर पिलायेंगे उसे अब
बिरयानी आम न होगी अब

खोसों की कतारें कहाँ दिखेंगी अब
पठानों के बच्चे कहाँ दिखेंगे अब पंजाबी,पश्तो कहाँ सुनूंगी अब
टूटी उर्दू कैसे सुनूंगी अब

कोरोला बीटले वाली सड़कें नजर आएंगी कहाँ
चौडी सड़कें बस ख्वाब में नजर आएंगी अब
हरियाली ही हरियाली नजर आएगी कहाँ
हवाई जहाज सी गाड़ी में केसे बैठूंगी अब

पूरी रात तेरी खूबसूरती कैसे निहारूंगी मैं
एक बजे चमन में नारंगी पिस्ता बादल आइसक्रीम कैसे खाऊगी अब मैं?

पाइन, गोल्डलीफ नहीं होगी वहां
विल्स लाइट से ही काम चलाना पड़ेगा
20 का कौन सा पैकेट मिलता है
फिर से ढूंढना पड़ेगा
रानी मुखर्जी की लाइट मारने लाइटर भी नहीं होंगे वहां

सुर्ख लाल रंग के नाखून कैसे नजर आयेंगे
लंबे लंबे नाखूनों से मुलाकात नहीं होगी
नक्काशीदार सैंडलों से झांकते खूबसूरत पैर भी नहीं होंगे कहीं
हर लिबास से मिलती चप्पलें कैसे मिल जाती हैं इन्हें?
ये हैरत भी नहीं होगी अब
बाहर का देख कौन रेट बढाएगा
इंडिया की जान रेट कम भी कैसे हो जाएगा
इत्मिनान से बातें कैसे होंगी
तेज धूप में सोना, कैसे लगेगी तेरी धूल
पैरों पर प्यार से कैसे लिपटेगी ये धूल
काश कि पैरों के भीतर घुस जाती ये धूल

अनारकली की चुलबुलाहट याद आएगी बहुत
माल रोड का शोर नहीं भूलेगा अब
साफ उदास जेल रोड भी प्यारा ही लगेगा अब
कैवलरी की पहचानी हुई गलियां भी गैर हो जाएंगी अब

बेस्ट बाई घर जैसा नहीं लगेगा अब
पेस पड़ोस में नहीं होगा अब
हर इतवार कैदी का रूटीन नाश्ता
तेलदार भटूरे नहीं पूरियां
निहारी की खुशबू
हल्का नारंगी मीठा हलवा
आहा।। कितना याद आएगा पूरी साथ हलवा खाना
छाती लस्सी की चटखार भी न भूल जाए

लिबर्टी की रंगीन दुकानें
दुपट्टा गली का शोर
चाय बनाते पेशावर के बच्चे
रंगरेजों की मटमैली उंगलियां
नायाब तरीकों से कपड़े सुखाना
रंग का नापा औला हिसाब
बंधनियों का ढेर

तीन बजे रात का उदास पान
फिर भी उसे खा लेने की खुशी
आधी रात पान वाले गाने गुनगुनाना
हैरत से देखती आंखें हर तरफ आशिकों का नजारा
महंगे दाम में कैमल खरीदना

आपके रूक कर कुछ पूछने पर
पूरी दुनिया का थम जाना
मदद करने की चाह
अच्छे खराब खयालात
हर भद्दी बात की अदा

हर एक घंटे पर गर्मी और अंधेरे से तरबतर होना
लो क्वालिटी मोमबित्तयों की शौपिंग
माचिसों का खोना
हर दूसरे दिन रंगबिरंगे लाइटर खरीदना

चीनी मिट्टी के अनोखे प्याले
हरी केतलियाँ
कांजी आंखों के चायवाले
पकी हुई चाय

156- जी का खुला माहौल
घर का रास्ता याद करना
वहाँ से न निकलने की चाह
मादाम हाशमी का प्यारा सा आलिंगन
राशिद बशीर से बस की टाइमिंग सेट करना
ओएतोवाले से कम होते रेट

अंबर रंग का गोलगप्पे का पानी
हर फूटा गोलगप्पा
गिन चुने चने के दाने
25 रुपए प्लेट
12 फूटी पूरियां

अनारकली के गेट पर आइस सेवर
सतरंगी चाशानियाँ
पान चबाते मुस्टंडे
मूंछों की ताव

अआधी रात के रिक्शे
टूटे फूटे ग़मगीन
कतार पटर की आवाज़
खरोंचते नोचते टीन के टुकडे
पती हुई सी सीट
80 की स्पीड का रोमांच
उछल उछल कर रिक्शे का चलना
सरों पर लगती चोट
सलियों पर उलझते बाल
नारंगी अमरूद का बगान
स्ट्रोबेरी के खोमचे
फालसे पर फैले गोंद के निशान
जामुनों की चमक
आड़ू के मखमली खोल
मंहगे केले
काली चेरी से जड़े पेपर के डब्बे
फालसे का ठंडा खट्टा जूस
आनार के ज्यूस में इस्मत के अफसानों की यादें

http://www.vidhaatwork.blogspot.com/

अपने ही देश में सांस्कृतिक झटके झेल रही तोषी

कल तोषी लाहौर से लौट आई- दिल्ली। दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर एक आम औपचारिकता की ठस रुई मी सने स्वागत वचन से उसका भी स्वागत हुआ। आने से पहले कुछ तकनीकी कारणों से उअसके अन्य दोस्त नहीं आ सके। इससे वह दुखी तो थी ही। सारे समय विमान में बैठकर रोंती आई। दोस्तों, जगह, वहाँ के लोगों से बिछड़ने के गम के साथ- साथ अचानक घटी यह घटना। इमाग्रेशन चेक के बाद उसके पास फोन नईं रह गया था, वहां के लोकल फोन न होने के कारण। उसने एकदम से बाल हठ की कि अपने इन दोस्तों से बात किए बिना वह विमान में बैठेगी ही नही, और हैरानी भरी खुशी यह कि उसकी यह इच्छा पीआईए यानी पाकिस्तान इन्तारानैशानल एयर लीं के अधिकारियों ने पूरी की।
दिल्ली हवाई अड्डे पर भी उसकी यही पुकार रही कि मुझे दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर नहीं, लाहौर के अलामा इकबाल हवाई अड्डे पर उतरना है। यह एक सान्स्क्रिय्तिक मांग है। मुझे पता नहीं कि भारत का कोई हवाई अड्डा देश के किसी भी साहित्यकार के नाम पर हो। मफ्गर पाकिस्तान में ऐसा है।
दिल्ली में आने के बाद यहां के लोगों की बात-चीत के टोन से उसे लगात्तार झटके डर झटके लग रहे हैं। वह यही कहती फ़िर रही है कि "कर लेते हैं भैया, इसमें इतना चीखने की क्या ज़रूरत है। ज़रा प्यार से तो बोलो।" यह प्यार बाहरी बोली अब वह मिस कर रही है। वहाँ का ऍम आदमी भी अपने लहजे में पूरादाब व कायदे बरतता है। ऑटो, तैक्सीवाले, भी 'आयें,' बैठें, देखें, करें, बिटिया से संबोधित करता है। सबसे पहले शहर में घुसते ही उसके मुंह से निकला- "उफ़, कितनी गंदगी है?' मैं हंस पडी। अभी उसका मुम्बई आना बाक़ी ही है।
यह सब अपने देश को कमतर करके आंकने की कोअशिश नहीं है। यह चंद वे बातें हैं, जिनसे हमारा -आपका जीवन रोजाना प्रभावित होता है, फ़िर ये ही बातें हमारी आम आदतों में तब्दील हो जाती हैं। तोषी को फ़िर से यहाँ के जीवन के अनुसार ढलना होगा। मगर जहाँ कहीं भी उसे वहाँ की बेहतरी नज़र आयेगी, उसके मुंह से उफ़ तो निकलेगा ही- हमारी-आपकी तरह- सहज, सामान्य।

कल तोषी सेलिब्रिटी बन गई लाहौर में

कल तोषी का दूसरी प्रदर्शनी को बहुत अच्छी प्रतिक्रिया मिली.काफी लोग आए और मीडिया से बात करते-करते थक गई.उसने बताया कि वह बहुत आह्लादित है.मैं भी खुश हूँ कि बेटी ने यह उपलब्धि हासिल की.हालांकि यह बेटियों का ब्लॉग है,लेकिन मुझे लिखते हुए खुशी हो रही है कि कल विभा रानी का रायपुर में शानदार शो हुआ.उन्होंने अपने नाटक का प्रदर्शन किया.उनकी कामयाबी भी एक बेटी की कामयाबी है.दो पीढियों की बेटियों की यह कामयाबी अच्छी लग रही है।
पेश है सुबह-सुबह तोषी की प्रदर्शनी पर छपी यह रपट:



Baji Nama tells a story on women's rights
Rabbia Arshad

LAHORE: A solo exhibition titled 'Baji Nama' by Vidha Saumya opened here by Safdar Aseff Ahmed Ali at the Niarang Art Gallery on Tuesday. Some 35 art pieces were put on display.Vidha Saumya is an Indian artist and came to Pakistan under the SAARC exchange programme. Talking to The Post, the artist said she had once been an admirer of a lady 'at my hostel. All my sketches are a tribute to her," she added.The exhibition revolves around the employment of a main theme, baji meaning elder sister. It is this character that inspires the artist wherein different postures, styles and gestures are drawn with poetic verses to add in detail to further illustrate the general idea.The medium used is pen alone on white paper to highlight the character. The work is said to be spell-bounding, to say the least.Scores of artists including Ambreen, Siama, Abid Khan, Michhoo, Shahid and Amad along with a good gathering of students all were present to view the work.Ambreen told The Post that the strokes and the lines 'are excellent, giving forth a strong effect.' "There is a story there. All packed in a serial form," she added while Abid Khan termed the work to be thought-provoking and centring on women's rights. He said the use of free hand technique paints a story of a woman entangled in typical cultural domestic troubles. The exhibition will continue till May 8.

तोषी की अगली प्रदर्शनी

बाजी नामा का निमंत्रण पत्र
अभी हमलोग सपरिवार लाहौर गए थे.वहाँ हमने तोषी उर्फ़ विधा सौम्या का रसूख देखा.हम बहुत खुश हुए .हम वहाँ थे तभी उसे पाकिस्तान की पंजाब सरकार से फ्रेश क्रीम नमक अवार्ड मिला.विधा सौम्या की पहली प्रदर्शनी 'लाहोरी बच्चे' सफल रही थी.उसकी अगली प्रदर्शनी का शीर्षक है' बाजी नामा'.मुझे पूरी उम्मीद है कि उसकी यह प्रदर्शनी पहली से ज्यादा कामयाब होगी.

लाहौर में तोषी की एकल प्रदर्शनी



ऊपर तोषी की एकल प्रदर्शनी का आमंत्रण पत्र है।

मुझे आप सभी को यह बताते हुए अत्यंत ख़ुशी हो रही है कि तोषी की एकल प्रदर्शनी लाहौर में २१ फरवरी से शुरू हो रही है.उसने लाहोरी बच्चे नाम से रेखांकन की एक सीरीज़ तैयार की है.उसने अपने नज़रिये से लाहोरी बच्चों को देखा है.उसने आमंत्रण पत्र में लिखा है ...

this series ia a conscious effort to express this place from my point of view।these children have been my muse on a daily basis,the world in which they loose themselves and the realities that they are aware of...
यह तोषी उर्फ़ विधा सौम्या के लिए बड़ी कामयाबी है और भारत-पाकिस्तान के सांस्कृतिक रिश्तों में एक बहुत ही छोटी कड़ी है।
तोषी पिछले पांच महीनों से लाहौर में है.वहाँ की उथल-पुथल से वह नहीं घबराई और जब भी हमने लौट आने की बात की तो उसका जवाब हुआ...यहाँ भी तो लोग रहते ही हैं.