अनंत तस्‍वीरें दृश्‍यावलियां ख़बर ब्‍लॉग्‍स

जल्‍दी आओ मेरी लल्‍ली


तोषी (विधा सौम्या) आजकल दिल्ली में है. दिल्ली की ठंढ उसे डरा रही थी. जाने से हिचक रही थी. खूब चाक चुबत हो कर, शॉल, जैकेट, स्वेटर के हथियारों से लैस जब वह दिल्ली पहुंची तो फूला गुब्बारा पिचक गया. मायूस हो गई वह- "अरे, यहां तो ठढ ही नहीं है. दिल्ली के लिए उसने लिखा अपने फेसबुक स्टेटस पर- "दिल्ली- इस मंगल शुरु, अगले मंगल खतम
दिल्ली- तेरी ठंढ में ठिठुरेंगे, नाक, कान, बदन और हम." 
फेसबुक पर स्टेटस है तो कमेंट्स भी आयेंगे. पर सबसे बढिया कमेंट रहा उसके बडे पापा ऋषिकेश सुलभ जी का. कमेंट नहीं, कविता हो गई. यहां है- 

दि‍ल्‍ली-दि‍ल्‍ली बेहि‍स दि‍ल्‍ली.... 
दि‍ल्‍ली हो गई बर्फ़ की सि‍ल्‍ली...
कैसे खेलें डंडा-गि‍ल्‍ली.....
मुम्‍बई है नज़र की झि‍ल्‍ली.....
पलक झपकते नोचे बि‍ल्‍ली.......
द्वार-द्वार पर लगी है कि‍ल्‍ली
पटना आओ मेरी लल्‍ली
हिंया उड़ी न तुम्‍हरी खि‍ल्‍ली
देखे तुमको बरस हुए
जल्‍दी आओ मेरी लल्‍ली
राज़ की बात बताएं तुमको
ठंडी हो रही चि‍कन-चि‍ल्‍ली
आओ-आओ मेरी लल्‍ली

एक लड़की की शादी

नासिरूद्दीन

जहन में एक बात हमेशा कौंधती है, क्‍या लड़की की जिंदगी का सारा सफर शादी पर ही खत्‍म होता है। मैं अक्‍सर सोचता हूँ कि दसवीं, बारहवीं में जो लड़कियाँ हर इम्‍तेहान में लड़कों से बाजी मारती रहती हैं, कुछ दिनों बाद ऊँची तालीम, नौकरी और जिंदगी के दूसरे क्षेत्रों में क्‍यों नहीं दिखाई देतीं? कहाँ गायब हो जाती हैं?
लड़की पैदा हुई नहीं कि शादी की चिंता। उसके लिए एफडी की फिक्र। उसके नैन-नक्‍श, दांत की बुनावट, पढ़ाई-लिखाई, काम-काज की चिंता भी शादी के लिए ही? यही नहीं शादी को लेकर जितनी कल्‍पनाएँ लड़कियों की झोली में डाल दी जाती हैं, वह उनके पूरी दिमागी बुनावट पर असर डालता है। फिर वह भी इसी में झूलती रहती हैं। पढ़ो इसलिए कि अच्‍छा वर मिले। हँसो ठीक से ताकि ससुराल में जग हँसाई न हो। चलो ऐसे कि ‘चाल चलन’ पर कोई उँगली न उठे। चेहरा-मोहरा इसलिए सँवारो ताकि देखने वाला तुरंत पसंद कर ले। यह सब भी इसलिए ताकि ‘सुंदर- सुशील- घरेलू’ के खाँचे में फिट हो सके।
क्‍या माँ-बाप कभी किसी लड़के को ताउम्र शादी की ऐसी तैयारी कराते हैं। क्‍या कभी किसी लड़के से शादी की ऐसी तैयारी की उम्‍मीद की जाती है। क्‍या किसी लड़के की जिंदगी की सारी तैयारी का गोल सिर्फ और सिर्फ शादी होता है। शायद नहीं। तो क्‍यों नहीं?
क्‍यों सिर्फ लड़कियाँ?

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तिन्नी और अख़बार

तिन्नी अपनी ड्राइंग अख़बार में छपा देखना चाहती है। उसका कहना है कि दुनिया जान जाएगी। धरती को पता हो जाएगा। कल उसने कहा कि पापा फोटो भी होना चाहिए। तिन्नी को यह नया शौक चढ़ गया है। घर के सारे बेकार पन्नों के पीछे तिन्नी ने रंग दिया है। दिन भर रंगती रहती है। अब मैं जानना चाहता हूं कि छह साल की बेटी की ड्राइंग को छापने के लिए कौन सा अखबार है। हर घर में तमाम बच्चे दिन भर में न जाने कितनी ड्राइंग बना रहे हैं। उनका विश्लेषण करने के लिए कोई कला विशेषज्ञ क्यों नहीं है। मकबूल फिदा की कला के मर्म को समझने वाले चाहिए तो इन बच्चों की कला के मर्म में भी झांका जाना चाहिए।

ये सिर्फ स्कूल के बोर्ड पर टांगने के लिए नहीं हैं। यह बात इसलिए नहीं कह रहा कि मेरी बेटी अखबार में छपना चाहती है। इसलिए भी कह रहा हूं कि कई स्कूलों में टंगे ड्राइंग पर मेरी नज़र पड़ती है। हर बच्चा सूरज,बाघ और आसमान को अलग अलग रंगों,आकारों और नज़रों से देखता है। किसी को यह काम करना चाहिए। पता करना चाहिए कि बच्चे बादलों को किन किन रंगों से रंगना पसंद करते हैं, देखना चाहिए कि बच्चों की कल्पना में मिसाइल का रंग लाल क्यों हैं। तिन्नी की एक ड्राइंग परेशान कर रही है। गहरे लाल रंग का राकेट। उसका किनारे का रंग काला है और पन्ने के चारों तरफ नीले रंग का बार्डर।
उसने एक शिवलिंग बनाई है। काले शिवलिंग पर लाल रंग का टीका लगा दिया है। लाल रंग से सना एक हाथ है जो पूजा करता है। नारंगी और पीले रंग में वो परिवार का पूरा चित्र देखती है। न जाने कितने बच्चों की कमाल की कृतियां मां बाप सहेज कर रख रहे हैं जो बाद में पुराने होते होते, मकान बदलते बदलते कहीं खो जाएंगे। एकाध बचे रह जाएंगे। कभी किसी को दिखाने के लिए।