अनंत तस्‍वीरें दृश्‍यावलियां ख़बर ब्‍लॉग्‍स

सात बेटियों का काफिला शाम चार से सात

मैं रोज सोचती हूं कि कुछ लिखुं अपनी बेटियों के विषय में कैसे वह दोनो बड़ी हो रही है। एक दूसरे को तंग करते हुए। मेरी श्रुति उसे प्यार से मेरी बेटी पुचाकरती है और मिठी उसका स्केच पेन उसके बैग से निकाल कर भागती है कि कहीं उसे श्रुति देख कर उस से छीन ना ले। मिठी अभी सिर्फ एक साल और तीन महिने की हुई है और खूब शैतानी करती है। उसकी शैतानी देख देख कर हमलोग काफी खुश होते हैं और भविष्य के लिए तैयार होते हैं कि आगे और किस तरह का बदमाशी कर सकती है वह। मेरी मिठी, श्रुति से ज्यादा समझदार दिखती है। और मेरी श्रुति काफी दिमागी रुप से तेज है। वह कोई भी कविता चुटकियों में याद कर लेती है। अभी कल ही सुबह उसे 16-17 की टेबलस याद करनी थी। रविवार को मजे कर उसे याद आया कि सोमवार का होमवर्क था। तो सुबह उठ गई। मुझसे कहा टेबल्स लिख दो। मैं सुबह सो रही थी। मैने कहा मैं नहीं लिखुंगी अभी तुम्हे याद आई है जाओ मैं नहीं लिखती। तो उसने पापा को जगागर टेबल्स लिखवाया और मेरे नास्ता बनाने तक मुझे याद कर के सुना भी दिया और स्कूल फिर इतमिनान से चली गई। नहीं तो वह होमवर्क बिना पूरा किए स्कूल नहीं जाती।
मुझे याद नहीं आता कि मैं टेबल्स इतनी जल्दी याद कर पायी थी कि नहीं। उसके पास खूब तेज दिमाग है। वह मैथलीशरण गुप्त की कविता - मां कह एक कहानी - बहुत बेहतर ढंग से सुनाती है।

इन दो बेटियों के अलावे मेरी और भी पांच बेटियां है। यह मेरी ट्युशन की बेटियां हैं। मैं जब इन छह बच्चों को ट्युशन पढाती हूं तो सच मानिये मुझे ऐसा लगता हैं कि मैं भगवान के पूजा पाठ से ज्यादा कोई पाक काम कर रहीं हूं। चूकि मुझे बचपन से पैसे की लालच नहीं रही हैं और मैं आर्थिक रुप से शुरु से अच्छे हालात में रही हूं तो सारे मैटलिस्टक चिजों से ऊपर उठ चुकी हूं। मुझे यह भी पता नहीं है कि कैसे मेरे पास पढ़ने के लिए आए बच्चे सिर्फ लडकियां ही है। मैं कई बार सोचती हूं कि मैं लड़कों को भी उतने सिद्दत से पढ़ा पाऊंगी कि नहीं। कह नहीं सकती।
मेरे ट्रयुशन के बच्चों पर अगर उनके स्कूल की टीचर हाथ उठाती है तो मुझे वैसा ही दर्द होता है जैसा मुझे श्रुति को किसी टीचर के मारने पर होता है। मैं उसके रिजल्ट देखकर उतनी ही खुश और दुखी होती हूं जितना मैं श्रुति के रिजल्ट पर होती हूं।

मैं अपने आप को थोड़ा अब कम अटैच करती हूं बच्चों से क्योंकि मैं खुद बहुत परेशान हो जाती थी। बच्चों को पढाना बहुत बड़ी जिम्मेदारी भरा काम है। आप जब तक उसे दिल से नहीं पढायेगा वह तबतक आप से जुड़ नहीं सकता। मैं उनके साथ उनकी कवितायें याद करती हूं तभी वह भी जल्दी याद कर पाते हैं। मैने रिजल्ट के बाद उन सब की एक छोटी सी पार्टी रखी थी उनके मम्मी के साथ। पार्टी तो सफल नहीं हुई क्योंकि दो बच्चों की मम्मी नहीं आई। बच्चों ने बहुत अच्छा प्रेजंटेशन भी उस पार्टी में दिया। मैने सबको बढ़िया सा गिफ्ट भी दिया।
मेरे साल भर के मेहनत पर किसी एक मां के मुंह से यह- धन्यवाद- शब्द का बोल भी नहीं निकला। जिस कारण मैं काफी व्यथित भी हुई। आफिसों में ऐसा होता होगा कि आप मन लगाकर काम करे और बॉस आपके काम की तारीफ भी ना करे। पर यह बिल्कुल व्यकि्तगत संबध है। जब टीचर आपको पढ़ाता है वह पूरी सिद्धत से आप तक अपनी बात पहुंचाने की कोशिश करता है। ना समय देखता है ना परिवार। सिर्फ और सिर्फ बेहतर रिजल्ट की उम्मीद रखता है। चूकि में पैसे तो लेती ही हूं इसलिए व्यवसायिक होने का दंड़ मुझे मिलेगा। तारीफ ना सही आप धन्यवाद जैसे शब्दों का इस्तमाल कर अपने को बेहतर और सामने वाले को प्रोत्साहित तो कर सकते हैं।

मजेदार घटना थी। स्कूल के रिजल्ट के दिन मैं और मेरे पति रिजल्ट लेकर निकल ही रहे थे कि प्रिंसपल पर नजर पड़ी, जो कामों मे उलझे हुए फीस की खीचातानी कर रहे थे। चूकि स्कूल में साइंस एग्जिविशन भी लगा हुआ था और सारे बच्चे अपने प्रयोग को रट कर माहिर हो चुके थे। बढिया लगा था वह आयोजन। मैने अपने पति से कहा कि प्रिंसपल को थोड़ा धन्यवाद दे दूं। हमलोग पंद्रह मिनट खड़े रहे और हमारी बारी आ ही नहीं रही थी। और आफिस जाने के चक्कर में देर हो रही थी इसलिए निकल आए। बाहर खड़े हो कर सोचने लगे कि अब क्या करें। फिर मन में आया नहीं ये बुजुर्ग इंसान जो इतनी मेहनत कर रहें हैं हमारे बच्चों के ही खातिर उनंहे धन्यवाद देना बहुत जरुरी है। हमदोनो फिर घुसे और उनके काम को बीच में बाधित कर सारे लोगों के सामने उन्हें धन्यवाद दिया। मैं भी अपने शब्दों में कुछ बोली। कुल मिलाकर माहोल बड़ा आंदित हो गया। सर ने खड़े हो कर हमारा सम्मान लिया। और हमदोनों को बल्कि सारे लोगों को यह बहुत अच्छा लगा।

मैं इतनी मेहनत अपने बच्चों के प्रति सिर्फ और सिर्फ इसलिए करती हूं कि मुझे अपने बचपन की पढ़ाई मे जिन दिक्कतों का सामना उम्र भर करना पड़ा वह मैं उन्हे नहीं होने देना चाहती।

बेटियों के ब्लॉग से अपने मन की भड़ास कह पाने का जरिया बहुत बढिया है।

पुनीता

4 comments:

अनिल कान्त : said...

aapka ye lekh dil ke bahut kareeb laga ...khud ko juda hua mahsoos karne laga

Vibha Rani said...

kuchh log dhanyvad yaa abhr ko aupacharik samajhate hain. magr ve yah nahi janate ki isase kisi ko kitani khushi milati hai. paisa bahut badi chiz hai, magar paisa hi sabkuchh nahii hai, yah main pahale bhi kai baar kah chuki haoon. mera to khandan hi teacher khndan raha hai, jaha, ma, babooji, didi, jija ji, bhabhi sabhi teacher ya professor hain. main apani ma ko dekhati thi avhelit hote aur mujhe badi taklif hoti thi ki un jaise imandar aur mehanti ki koi kadr nahi hai. punita ji, ye sab bhav ki baaten hain aur bhavuk log hi ise samajh sakate hain.

Kavi Kulwant said...

तांत्रिकों का चक्कर

हंसमुख राठौर की कहानी पढ़कर दुख हुआ, दर्द हुआ किंतु अचंभा नही हुआ. अपनी ही बेटी को बंधक बना कर उसके साथ सालों कुकर्म करना; हैवानियत की एक मिसाल है. धन की हवस और तांत्रिकों का सहयोग आदमी को हैवान बनाने के लिए काफी होते हैं. आदमी के अपने अंदर की हवस, धन के लिए अतृप्त पिपासा अससे क्या नही करवा देते. वह मारा मारा फिरता है और ऐसे तांत्रिक मिल जाएं जो अपनी हवसा और धन की पिपासा के लिए उन्हें उकसाएं और उनको हैवानियत की राह दिखाएं तो आदमी को हैवान बनते भला कितनी देर लगती है ?

मैं भी एक ऐसे परिवार को जानता हूँ, जिन्होंने अपनी धन की इसी अतृप्त पिपासा के चलते खुद एक बाप और एक भाई ने अपनी ही (?) बहन / बेटी (विवाहिता) और उसके पति और बच्चों का जीवन बरबाद कर डाला. हालांकि उस लड़की को अपने उन तथाकथित बाप और भाई की करतूतों की अच्छी प्रकार से जानकारी थी; इसीलिए उसने अपने पति एवं बच्चों को को सालों अपने उन तथाकथित बाप और भाई से दूर रखने की कोशिश की और अपने पति को भी हजारों बार समझाया कि उअसके इन तथाकथित बाप और भाई से दूर रहे. लेकिन अपनी सादगी के चलते उसके पति को कभी भी यह बात समझ नही आई; और वह उनको अपने बाप और भाई की तरह ही चाहता रहा.

अपनी धन के प्रति इसी अतृप्त पिपासा के चलते एवं तांत्रिकों के चक्कर में आकर आज तक अपनी उसी बहन / बेटी और उसके पति तथा बच्चों को आठ नौ बार Slow Poison / Toxins छुप छुपा कर खिला खिला कर उन्हें अधमरा कर दिया है. लड़की विक्षिप्त अवस्था में है और समाज में अपने उन तथाकथित बाप / भाई के बारे में वह भला क्या बोले और कैसे बोले ? लड़की का पति इस घटना से इतना हतप्रभ है और टूट चुका है. उसे समझ ही नही आ रहा है कि क्या बाप और बाई इतने हरामी भी हो सकते हैं ?? !! वह अपनी उसी सादगी के चलते एक एक कदम चल कर दुनिया वालों को सच दिखाने की, सच बताने की कोशिश कर रहा है. और इसी आशा में जी रहा है कि भगवान उसको न्याय देगा ! इस कलयुग में भी सत्य की जीत होगी ! सत्यमेव जयते ! वाह रे बेवकूफ इंसान !

समाज में तांत्रिक कुकुरमुत्तों की तरह फैले हुए हैं जो भटकों को हैवानियत की राह पर डाल देते हैं. सरकार को इन तांत्रिकों की दुकानों को बंद कराना चाहिए. हर न्यूजपेपर में तांत्रिकों के विज्ञापनों की भरमार होती है. अखबार वालों को स्वनियंत्रण के तहत तांत्रिकों के विज्ञापन बंद कर देने चाहिएं. साथ ही टी वी पर आने वाले इनके विज्ञापनों पर रोक के साथ साथ, कितने ही सीरियलों में आने वाले तांत्रिक क्रियाकलापों पर भी प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए.

मै ऐसा नही कहता कि तंत्र मंत्र नही होता यां इसका असर नही होता. तंत्र मंत्र भी निर्वाण प्राप्ति का ही एक साधन होना चाहिए न कि समाज में कुकर्म करने के लिए यां अपनी अतृप्त पिपासाओं के लिए हैवानियत करने के लिए और वह भी अपनों के साथ ही !

कुलवंत सिंह

दीपक said...

बहुत सुंदर आलेख