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कोशी और VOGUE
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तोषी और VOGUE पत्रिका का क्रिएटिव कोलैबोरेशन
तोषी (विधा सौम्या) बडी हो गई है, मगर हमारे लिए अभी भी वही छोटी सी, गोल चेहरे वाली लडकी है. दिन दिन करते करते वह इतनी बडी हो गई है, उम्र से ही नहीं, काम और अनुभव से भी. मुझे खुशी है कि वह 'सेल्फ मेड' है. अपने और अपने कैरियर को उसने बखूबी संभाला है और संभाल रही है. उसके काम में गजब किस्म की सम्वेदनशीलता है. आम तौर पर जिसपर किसी का ध्यान नहीं जाता, उसका जाता है और उसे वह अपने काम का विषय बनाती है. लाहौर में उसने अपनी महरी और लाहौरी बच्चों पर काम किया और वहां भी अपने बोल्ड और स्पष्ट विचार अपने चित्रों के माध्यम से रखे. बाहर की प्रेस और मीडिया में अपना स्थान बना चुकी तोषी भारत में टाइम्स ऑफ इंडिया से लेकर अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में आ चुकी है. उस पर उसके दादा श्री सुखदेव नारायण ने एक किताब ही लिख डाली- "दादा के पत्र:पोती के नाम".तोषी अत्यंत सम्वेदनशील है. और अपने काम के प्रति उतनी ही गम्भीर और ईमानदार. उसके काम की गम्भीरता उसके "स्थूल स्त्री" सीरीज में लक्षित है. आमतौर पर स्थूल कायावाले लोग उपहास या मजाक के पात्र मान लिए जाते हैं. हमारी फिल्में, टीवी आदि भी किसी स्थूलकाय व्यक्ति को कॉमेडियन ही मानते हैं. कोई नहीं सोचना चाहता कि उसके मन में भी उसकी एक दुनिया विचरती होगी, जहां तरह तरह के भावों, कामनाओं, इच्छाओं के आलोडन होते होंगे, किसी भी एक दुबले पतले (तथाकथित स्मार्ट) लोगों की तरह वह भी भावनाओं के झूले पर झूलना चाहते होंगे. स्थूलकाय लोगों के मन को पकडा है तोषी ने और अपने स्केच से उसे साकार किया है. उसके स्केच से प्रेरित हो कर वोग ने एक सीरीज निकाला और एक कलाकार के भाव और उसकी कला को ज्वेलरी के साथ समंवित करने की सम्भावना पर काम किया. तोषी के स्थूल महिला सीरीज के स्केच को थिएटर कलाकार फातिमा मेहता को वास्तविक मॉडल का जामा पहनाया गया है और उसके साथ क्वीनी सिन्ह की ज्वेलरी का कोलैबोरेशन किया गया है. आप भी देखें. यहां पर. विस्तार से देखने के लिए देखें Vogue का जुलाई 2011 का अंक.
एक कमज़ोर क्रिकेट प्रेमी की आत्मकथा
मुझे अपनी इस कमज़ोरी पर नाज़ है। मगर तनाव के क्षणों में धीर-गंभीर होने या होने का अभिनय करने वाले तमाम वीरों और वीरांगनाओं से ईर्ष्या ज़रूर होती है। ऐसा लगता है कि जीवन की उपलब्धियां उन्हीं की धरोहर हैं। उनका कितना स्वतंत्र व्यक्तित्व है। मैं धारा में बहता हूं और वो धारा को बनाते या मोड़ते हैं। मानता हूं कि जीवन मे कुछ करने के लिए इस टाइप की बाज़ारू ख़ूबियां होनी ही चाहिएं लेकिन क्या मेरे जैसे कमज़ोर आदमी के लिए कोई सोशल सिक्योरिटी स्कीम नहीं होनी चाहिए। इसीलिए हैरानी होती है कि यहां तक जीवन कैसे जी गया। जो कर रहा हूं वो कैसे हो रहा है।
ऐसे कमज़ोर और पूर्वकालिक क्रिकेट प्रेमी को जनसत्ता के संपादक ओम थाणवी जी ने घर बुला लिया मैच देखने। सपत्निक अविनाश,सुर,सपत्निक समरेंद्र,बिपत्निक मिहिर और विनीत कुमार के बीच मैं अपनी पत्नी के न आने पर अकेला मौजूद रहा। विशालकाय होम थियेटर पर फाइनल। शानदार माहौल में मैच देखते हुए एक बार हिन्दी ग्रंथी कुलमुला उठी और महसूस करने लगी कि कुलीनता हिन्दी का स्वाभाविक लक्षण है। हम हमेशा संघर्ष मोड में नहीं रहते। मनोरंजन और शौक को भी महत्व देते हैं। तभी इतने इंतज़ाम और ठाठ से मैच देखने जमा हुए। इसके बाद भी कई बार ऐसा लगा कि आज इंडिया और मेरा दोनों का फाइनल हो जाएगा। श्रीलंका की टीम बल्लेबाज़ी कर रही थी। भारत के गेंदबाज़ विकेट ले रहे थे मगर रन नहीं रोक पा रहे थे। क्षेत्ररक्षण में हम अच्छा कर रहे थे। मगर श्रीलंका के स्कोर ने मुझे विकट परिस्थिति में डाल दिया। मुझे क्रिकेट और अपनी कमज़ोरी दोनों में से एक को चुनना था। साफ था कि मैं बार-बार अपनी कोमज़ोरी के पक्ष में झुकने लगा।
सहवाग का विकेट मेरे सामने नहीं गिरा। सचिन का गिर गया। धड़कनें ऐसी उखड़ीं कि जान निकलने लगी। थाणवी जी के घर जमा सभी साथी धीर-गंभीर वीर लग रहे थे। अब वक्त आ गया था कि अपनी कमज़ोरी का एलान कर दूं। ताकि कुछ हो गया तो इन्हें सनद रहे कि ज़िला अस्पताल जाना है या एस्कार्ट्स हार्ट इंस्टिट्यूट। मैं भागने का एलान करता और सब चुप करा देते। बैठिये महाराज,कहां जाइयेगा। अच्छा नहीं लग रहा था। टीम इंडिया दबाव में आ रही थी और मैं तनाव में। लगा कि इस महफिल में अकेला कमज़ोर मैं ही हूं।
तभी कैमरा घूमा और मूर्छितावस्था में पड़ी नीता अंबानी और होश उड़ाये आमिर ख़ान की तरफ गया। इन्हें देखकर हौसला बढ़ा। हम तीनों में एक उभयनिष्ठ लक्षण का पता चल चुका था। तीनों दबाव और तनाव के क्षणों में एक साधारण और कमज़ोर दर्शक इंसान की तरह बर्ताव कर रहे थे। लगा कि पांच लाख करोड़ वाली नीता अंबानी को किसी चीज़ की कमी नहीं है। वो भी मेरी तरह मूर्छित हैं। साधारण टेलरिंग वाली कमीज़ पहने मुकेश अंबानी को देख कर लगा कि लाख करोड़ कमाने के बाद भी मोहम्मद टेलर की सिली हुई कमीज़ में मुकेश अपने गांव के चाचा की तरह लग रहे थे। कॉलर बटन वाली नीली कमीज़ में मुकेश बाकी मित्रों जैसे थे। गंभीर और जीत के लिए प्रतिक्षारत। मैं कमज़ोर और तनाव से भागरत। मुकेश अंबानी साधारण कमीज़ में असाधारण लग रहे थे। मगर उनकी पत्नी नीता असाधारण कपड़ों में साधारण लग रही थीं। वो भी तनाव नहीं झेल पा रही थीं और मैं भी नहीं झेल पा रहा था। जब नीता अंबानी,आमिर और उनकी पत्नी किरण राव खुश होतीं तो मैं भी खुश होने लगा। ये सभी मेरे जैसे थे। मैं बॉल दर बॉल मैच देखने के लिए विवश था। जैसे वे लोग अपने लाखों रुपये के स्टैंड छोड़ कर नहीं जा सकते थे वैसे ही मैं मित्रों के दबाव में उठकर नहीं जा सका। वैसे एक बार कमरे से निकल टहलने ज़रूर चला गया।
मैं हिंसक हो उठा। दसों उंगलियों के पोर पर पनपे नाखूनों को कतरने लगा। हर गेंद,हर विकेट के बाद कोई न कोई नाखून बिना आवाज़ किये दातों तले छिल जाता था। बेचैनियां बढ़तीं जा रही थीं। दोस्तों को एसएमएस करने लगा ताकि महफिल में बैठे खेलप्रेमी वीरपुरुषों और वीरांगनाओं से दूर जा सकूं। कपार के दोनों साइड बटन यानी टेम्पल पर कुछ महसूस हो रहा था। बेचैनी और नोचनी में फर्क मिट गया। धक-धक-धक। गो की बजाय स्टॉप हो जाता तो ग़ज़ब हो जाता। यही कहने लगा कि अब जो इस मैच को देख रहा है वह सही में खेल प्रेमी है। उसमें धीरज है कि वो हार या चुनौतीपूर्ण क्षणों में भी मैच देखे। मैं सिर्फ विजयी होने पर ताली बजाने वाला दर्शक हूं। ख़ैर मैच देखता गया। गंभीर और धोनी ने कमाल करना शुरू कर दिया। हर चौके पर तनाव काफूर होने लगा। रूह आफज़ा सी तरावट महसूस होने लगी।
जीत का क्षण नज़दीक आ गया। इतिहास बनने वाला था और मैं बिना विश्वविद्यालय के मान्यताप्राप्त इतिहासकार बनने जा रहा था। इस मैच को मैंने भी देखा है। बॉल दर बॉल। तनाव के बाद भी टिका रहा जैसी टिकी रही टीम इंडिया। पहली बार ख़ुद को असाधारण होने का अहसास हो रहा था। लगा कि तनाव झेल सकता हूं। बस एक बार टीम इंडिया की कप्तानी मिल जाए। कमज़ोर लोग ऐसे ही जीते हैं। एक-एक सीढ़ी चढ़ते हैं। घुलटते हैं फिर चढ़ जाते हैं। भारत के विश्वविजयी होते ही मैं धन्य हो गया। अपने डर,घबराहट और आशंकाओं में इतना डूब गया था कि जीतने के वक्त आंसू निकले ही नहीं। काश मैं सचिन की तरह रो पाता।
शाम की समाप्ति बेहद स्वादिष्ठ राजस्थानी व्यंजनों से हुई। सांगरी सब्ज़ी की ख़ूबियों पर थाणवी जी के अल्प-प्रवचन के साथ। हम सब अपने-अपने घर लौट आए। रास्ते में लोगों ने घेर लिया। एक ने कहा कार का शीशा नीचे कीजिए। बोला कि भाभी का ख्याल रखना और भर पेट खाना। टीम इंडिया जीती है। मीडिया वालों तुमको भी बधाई। तभी भीड़ में एक मीडिया वाला भाई आया। सर मैं फलाने टीवी में काम करता हूं। आपसे मिलूंगा। प्लीज़ सर। याद रखियेगा। मेरा नाम...। कोई बात नहीं हम भी यही करते थे। सोचा काश इंडिया के जीतते ही सबको पसंद की नौकरी मिल जाती,सैलरी मिल जाती। मुझे रवीश की रिपोर्ट का कोई नया आइडिया मिल जाता।
शनिवार की पूरी शाम मैंने समर्पित कर दी है। थाणवी जी की पत्नी के नाम। जिनकी मेहमाननवाज़ी की वजह से मेरे जैसा कमज़ोर इंसान मैच देख सका। वो तमाम क्षणों में सामान्य रहीं। थाणवी जी की चाय याद रहेगी। लिकर टी की वजह से रक्त पतला होता रहा और थक्के न जमने के कारण ह्रदयाघात की आशंका मिट गई। काश मैं भी मज़बूत और महान होता। ख़ैर। टीम इंडिया की जीत पर सबको बधाई। कस्बा की तरफ से।
जल्दी आओ मेरी लल्ली
पटना आओ मेरी लल्ली
हिंया उड़ी न तुम्हरी खिल्ली
देखे तुमको बरस हुए
जल्दी आओ मेरी लल्ली
राज़ की बात बताएं तुमको
ठंडी हो रही चिकन-चिल्ली
आओ-आओ मेरी लल्ली
एक लड़की की शादी
नासिरूद्दीन
जहन में एक बात हमेशा कौंधती है, क्या लड़की की जिंदगी का सारा सफर शादी पर ही खत्म होता है। मैं अक्सर सोचता हूँ कि दसवीं, बारहवीं में जो लड़कियाँ हर इम्तेहान में लड़कों से बाजी मारती रहती हैं, कुछ दिनों बाद ऊँची तालीम, नौकरी और जिंदगी के दूसरे क्षेत्रों में क्यों नहीं दिखाई देतीं? कहाँ गायब हो जाती हैं?
लड़की पैदा हुई नहीं कि शादी की चिंता। उसके लिए एफडी की फिक्र। उसके नैन-नक्श, दांत की बुनावट, पढ़ाई-लिखाई, काम-काज की चिंता भी शादी के लिए ही? यही नहीं शादी को लेकर जितनी कल्पनाएँ लड़कियों की झोली में डाल दी जाती हैं, वह उनके पूरी दिमागी बुनावट पर असर डालता है। फिर वह भी इसी में झूलती रहती हैं। पढ़ो इसलिए कि अच्छा वर मिले। हँसो ठीक से ताकि ससुराल में जग हँसाई न हो। चलो ऐसे कि ‘चाल चलन’ पर कोई उँगली न उठे। चेहरा-मोहरा इसलिए सँवारो ताकि देखने वाला तुरंत पसंद कर ले। यह सब भी इसलिए ताकि ‘सुंदर- सुशील- घरेलू’ के खाँचे में फिट हो सके।
क्या माँ-बाप कभी किसी लड़के को ताउम्र शादी की ऐसी तैयारी कराते हैं। क्या कभी किसी लड़के से शादी की ऐसी तैयारी की उम्मीद की जाती है। क्या किसी लड़के की जिंदगी की सारी तैयारी का गोल सिर्फ और सिर्फ शादी होता है। शायद नहीं। तो क्यों नहीं?
क्यों सिर्फ लड़कियाँ?
तिन्नी और अख़बार
ये सिर्फ स्कूल के बोर्ड पर टांगने के लिए नहीं हैं। यह बात इसलिए नहीं कह रहा कि मेरी बेटी अखबार में छपना चाहती है। इसलिए भी कह रहा हूं कि कई स्कूलों में टंगे ड्राइंग पर मेरी नज़र पड़ती है। हर बच्चा सूरज,बाघ और आसमान को अलग अलग रंगों,आकारों और नज़रों से देखता है। किसी को यह काम करना चाहिए। पता करना चाहिए कि बच्चे बादलों को किन किन रंगों से रंगना पसंद करते हैं, देखना चाहिए कि बच्चों की कल्पना में मिसाइल का रंग लाल क्यों हैं। तिन्नी की एक ड्राइंग परेशान कर रही है। गहरे लाल रंग का राकेट। उसका किनारे का रंग काला है और पन्ने के चारों तरफ नीले रंग का बार्डर।
उसने एक शिवलिंग बनाई है। काले शिवलिंग पर लाल रंग का टीका लगा दिया है। लाल रंग से सना एक हाथ है जो पूजा करता है। नारंगी और पीले रंग में वो परिवार का पूरा चित्र देखती है। न जाने कितने बच्चों की कमाल की कृतियां मां बाप सहेज कर रख रहे हैं जो बाद में पुराने होते होते, मकान बदलते बदलते कहीं खो जाएंगे। एकाध बचे रह जाएंगे। कभी किसी को दिखाने के लिए।
तोषी के ड्राइंग्स की एकल प्रदर्शनी है- लाहौर केGREYNOISEमें
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आज तोषी यानी विधा सौम्या के ड्राइंग्स की एकल प्रदर्शनी है- लाहौर में- "Song of the Sirens" शीर्षक से, शाम 7 बजे से गैलरी GREYNOISE, लाहौर में. वह अपने एग्जिबिशन के लिए वहीं है और रात-दिन काम कर रही है.
कोशी, कचरा, भगवान व फोटो
कोशी का ब्लॉग है- Koshy's
इस पर वह अपनी बातें लिखती है. अपने काम, अपने फैशन व पहनावे आदि से सम्बन्धित. वह फोटो भी खीचती है. मगर इसके साथ साथ वह सामाजिक मुद्दों से भी जुडी रहती है और उसके भीतर उसका अपना ह्यूमर भी है. वह कचरा कभी भी न तो सडक पर खुद फेंकती है, न अपनी पहचान में किसी को फेंकने देती है. एक दिन जब वह मुंबई के लोखंडवाला परिसर से गुजर रही थी तो उसने यह दृश्य देखा और उसे अपने कैमरे में कैद कर लिया और अपने ब्लॉग पर डाला. आप भी देखें, आनन्द लें और मन करे तो अपने विचार भी व्यक्त करें.
YAHAN KACHRA PHEKNA MANA HAI
i am too bored to write what i am wearing!
दो- दो कुलों की लाज को ढोती हैं बेटियाँ
ओस की एक बूँद-सी होती हैं बेटियाँ
स्पर्श खुरदुरा हो तो रोती हैं बेटियाँ
रौशन करेगा बेटा तो बस एक ही कुल को
दो- दो कुलों की लाज को ढोती हैं बेटियाँ
कोई नहीं है दोस्तो! एक-दूसरे से कम
हीरा अगर है बेटा, तो मोती हैं बेटियाँ
काँटों की राह पे ये खुद ही चलती रहेंगी
औरों के लिए फूल ही बोती हैं बेटियाँ
विधि का विधान है, यही दुनिया की रस्म है
मुट्ठी में भरे नीर-सी होती है बेटियाँ.
और यह कोशी का ब्लॉग
बहुत इसरार करने पर आखिर कोशी ने अपना ब्लॉग बना ही लिया. वह नई नई बातें सोचने में जितनी तेज़ है, उसे कार्यांवित करने में उतनी ही आलसी. यह ब्लॉग भी लगातार कोंचते रहने का नतीज़ा है. हालांकि कम्प्यूटर पर सारे कामों में वह मेरी मदद करती है, मुझे सिखाती है, मगर अपनी ही बातों के प्रति उदासीन है. हो सकता है, यह किशोर उम्र का तकाज़ा हो. आखिर हम जब इस उम्र में थे तो क्या कर लेते थे? कुछ भी नहीं. उस लिहाज़ से आज के बच्चे बडे तेज़, समय के साथ बल्कि समय से तनिक आगे ही हैं. "एक्सप्लोसिव्स" में तोषी ने उकेरा ड्राइंग का एक नया पन्ना

आज जब हिन्दुस्तान और पाकिस्तान दोनों ही देश एक दूसरे के खिलाफ आग उगल रहे हैं, वैसे में तोषी यानी विधा सौम्या अपनी कला के माध्यम से दोनों देशों के बीच एक नया पुल रचने की प्रक्रिया में है. ज़ाहिर है कि पुल निर्माण की इस प्रक्रिया में वह अकेली नहीं है. उसके पाकिस्तान के दोस्त और शुभचिंतक भी हैं, जिनके लिए कला और अभिव्यक्ति एक दूसरे को समझने के बेहतरीन माध्यमों में से एक है.
आज तोषी के आर्ट एक्जीबिशन की ओपनिंग है- लाहौर के "ग्रेनॉयज" आर्ट गैलरी में. अपने लाहौर प्रवास में उसके चित्रों की कई एकल व ग्रुप प्रदर्शनियां हो चुकी थी. हिन्दुस्तान आने के बाद लाहौर के लिए यह उसकी पहली प्रदर्शनी है. मुंबई में उसका एक ग्रुप शो हो चुका है.
"एक्सप्लोसिव्स" नाम से 15 ड्राइंग के सेट की एक पूरी की पूरी किताब इस प्रदर्शनी में है. इस ड्राइंग के सेट में आज शहर में एक शहरी तरीके से जी रहे जीवन के अन्दाज़ को अपनाए हुए उन लोगों के बारे में कहा गया है जो शहर में रहते हुए और शहर की नज़ाकत के साथ पलते हुए मीडिया और पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से सेक्स और सेक्स की दुनिया को समझने की कोशिश करते हैं और तदनुसार उसे अपने जीवन में ढालने का प्रयास करते हैं. और इस तरह से सेक्स उनके जीवन में एक योजनाबद्ध रूप में प्रस्तुत होता है.
इस ड्राइंग के सेट में साहित्य में व्यंग्य की तरह इन रेखा चित्रों में व्यंग्य कुछ कुछ कार्टून की शक्ल में आते हैं, जो लोगों को तनिक हंसाते, तनिक गुदगुदाते हैं. किंतु, व्यंग्य रचना की तरह ही यह जीवन के उन गहरे पन्नों को भी खंगालने की कोशिश करते है.
प्रदर्शनी में गई पुस्तक मूल पुस्तक का प्रिट फॉर्म है. यह हाथ से बनाई एक किताब के रूप में है और इसी रूप में इसे प्रदर्शनी में रखा जा रहा है. इसे डिजिटली पुन:प्रस्तुत किया गया है, मगर इतनी सफाई से कि यह मूल कार्य का सुख देता है. बन्द रूप में यह किताब 10x8.5" इंच व खुले रूप में 10x17" इंच की है. यह प्रदर्शनी 25 -30 अक्तूबर, 2009 तक चलेगी.
और कोशी ने जीत लिया मैदान

कोशी ने अपने कॉलेज का नाम रोशन कर दिया. वह क्रिएटिव है, अपनी दीदी तोषी की तरह. यूं उसके कैरियर -विचार की यात्रा मिस यूनिवर्स से शुरु हुई थी. तब देश की दो सुन्दरियों- ऐश्वर्या राय और सुष्मिता सेन मिस यूनिवर्स और मिस वर्ल्ड का खिताब जीत कर दुनिया भर में तहलका मचा रही थीं. कोशी उस समय दो- तीन साल की थी. मगर पूछने पर कि तुम बडी हो कर क्या बनोगी, उसने कहना शुरु कर दिया था- "मिस वर्ल्ड" शायद तब उसे मिस यूनिवर्स कहना नहीं आता होगा. उसके बाद जब उसने स्कूल जाना शुरु किया तो कहने लगे कि बडी हो कर वह टीचर बनेगी. अब वह काफी दिनों से फैशन डिज़ाइनर के कैरियर पर सवार है.
पिछले साल आईआईटी के सालाना महोत्सव "मूड इंडिगो" में उसने अपनी ड्रेस डिज़ाइन करके भेजी थी, जो चुनी गई थी. इस साल सेंट ज़ेवियर्स कॉलेज के सालाना महोत्सव "मल्हार" में उसने "प्रोजेक्ट ब्रॉडवे" में हिस्सा लिया, जिसमेँ ड्रेस डिजाइन करके, उसे मॉडल को पहना कर फोटो लेनी थी और 5 फोटो जमा करने थे. यह फैशन स्टाइलिंग् और फैशन फोटोग्राफी थी. 3 प्रतिभागियों का ग्रुप था, जिसमें एक को ड्रेस डिज़ाइन करना था, एक को मॉडल बनना था और एक को फोटो खींचनी थी. इसके लिए 5 घंटे का समय निर्धारित था, जिसमें एक घंटा वर्कशॉप के लिए तय था.
मार्क्स अंकल मर गए हैं मम्मी?
तोषी का एक्जीबिशन
आज तोषी का ग्रुप एक्जीबिशन आरम्भ हो रहा है.आप मुंबई में रहते हैं तो ज़रूर पधारें. अरे हाँ तोषी का ही नाम विधा सौम्या है.
पति ने जिंदा जला दिया और उसके सामने शराब पी कर जलते हुए का मुजरा देखे।
डर है तो समाज से, ना जाने कब वह बलात्कार की शिकार हो जाए या ना जाने कब उसे जला दिया जाए। छह महिने की लड़की के साथ भी बलात्कार हुआ है औऱ ना जाने कितने बुढी हो जाने तक उम्मीद बनी होती है। हमारा सभ्य समाज दानव बन चुका है।
मेरी एक परिचित को उसके पति ने जिंदा जला दिया और उसके सामने शराब पी कर जलते हुए का मुजरा देखे। सोच ही कितनी दर्दनाक है मन कांप उठता है और साथ ही साथ रो भी उठता है। सोचती हूं अगर मेरे साथ होता तो क्या होता मेरी बेटी के साथ होता तो क्या होता। वह भी किसी की बेटी थी, वह भी किसी की मां थी। पांच दिन से पटना में हॉस्पिटल में पड़ी है औऱ अभी भी नंगा नाच हो रहा है। पति खुलेआम हमदर्दी बटोर रहा है और अपने को बचाय हुए है पर आज सभी ज्वाला फट चुकी और उसने अपना बयान लिखवा दिया है। उस हॉस्पिटल में कुलर तक नहीं है। पता नहीं किस जन्म का भोग, भोग रही वह लड़की अभी तक जिंदा है और बयान अपने पति के खिलाफ नहीं देने का जैसे उसने प्रण कर लिया था। अभी भी भय ग्रस्त है या फिर किसी ने यूं डरा रखा था।
मां बाप कुछ नहीं कर पा रहे हैं। समझदारी की बात है कि नासमझी की मैं नहीं सोच पा रही हूं। शायद उस उम्र तक जाने के बाद मैं भी उनकी तरह सोचूं। उम्र के साथ ही समाज को समझने का नजरिया बदलता रहता है।
लड़कियां ही क्यों आग में झुलसाई जाती है लड़के क्यों नहीं। मेरी इच्छा होती है कि मैं भी उसके पति को यूं ही जला दूं सबके सामने औऱ देखुं कि कैसी तकलीफ होती है। यह तो मेरी परिचित है तो मैं परेशान हूं पर ना जाने कितनी लडकियां यूं ही जला दी गई है औऱ ना जाने औऱ कितनी जला दी जाएगी।
लड़कियां तभी जलाई जाती है जब वह पुरुष को चुनौती देती है। पुरुष का अहं ही सारे झगडों का जड़ होता है।
वोट का अधिकार और उसका उपयोग
साम्प्रदायिकता के सवाल पर तो वह बेहद मुखर है। उसका कहना है की जिस तरह से साम्प्रदायवाद को एक अत्यन्त संकीर्ण नज़रिए से बाँध दिया गया है, वह हमें अपने पर से अपने विशवास को दुला देता है। हमें एक सम्प्रदाय खतरनाक नज़र आता है मगर दूसरा सम्प्रदाय किस तरह से कट्टर बन हुआ है, उसे देखा कर तो ख़ुद को इस सम्प्रदाय का मानने को जी नजीन करता। देश में हिन्दू कट्टरता जिस तरह से बढी है, और मुसलमान जिस तरह से पीडित हो रहे हैं, उससे कौन सच्चा हिन्दू अपने आप को हिन्दू होने के गौरव बोधग से भरेगा?
नेता अपनी दूकान चलाते हैं। वे जनता और आम आदमी के दुःख दर्द से मुखातिब नही होते। मुम्बई का आतंकवाद तो पूरे विश्व के फलक पर उभरा ही है, मगर जो रोजमर्रा की परेशानी है, उससे कैसे निजात मिले? मई शुरू होने को आई है, जून में यहाँ बारिश शुरू हो जाती है। मगर मुम्बई की सालाना साफ़-सफाई नदारद है। मेट्रो परियोजना के कारण सड़को का बुरा हाल है। अभी ही ट्रैफिक भगवान भरोसे है, बारिश में क्या होगा? २००५ के बाद से सभी मुम्बईकर हिले रहते हैं बारिश के मौसम में।,
चुनाव के इस मौसम में कौन क्या करे, वह सोच नहीं पा रही है। केवल वोट के लिए वोट या कुछ और भी। तोषी की यह परेशानी एक आम मतदाता की परेशानी है।
सात बेटियों का काफिला शाम चार से सात
मुझे याद नहीं आता कि मैं टेबल्स इतनी जल्दी याद कर पायी थी कि नहीं। उसके पास खूब तेज दिमाग है। वह मैथलीशरण गुप्त की कविता - मां कह एक कहानी - बहुत बेहतर ढंग से सुनाती है।
इन दो बेटियों के अलावे मेरी और भी पांच बेटियां है। यह मेरी ट्युशन की बेटियां हैं। मैं जब इन छह बच्चों को ट्युशन पढाती हूं तो सच मानिये मुझे ऐसा लगता हैं कि मैं भगवान के पूजा पाठ से ज्यादा कोई पाक काम कर रहीं हूं। चूकि मुझे बचपन से पैसे की लालच नहीं रही हैं और मैं आर्थिक रुप से शुरु से अच्छे हालात में रही हूं तो सारे मैटलिस्टक चिजों से ऊपर उठ चुकी हूं। मुझे यह भी पता नहीं है कि कैसे मेरे पास पढ़ने के लिए आए बच्चे सिर्फ लडकियां ही है। मैं कई बार सोचती हूं कि मैं लड़कों को भी उतने सिद्दत से पढ़ा पाऊंगी कि नहीं। कह नहीं सकती।
मेरे ट्रयुशन के बच्चों पर अगर उनके स्कूल की टीचर हाथ उठाती है तो मुझे वैसा ही दर्द होता है जैसा मुझे श्रुति को किसी टीचर के मारने पर होता है। मैं उसके रिजल्ट देखकर उतनी ही खुश और दुखी होती हूं जितना मैं श्रुति के रिजल्ट पर होती हूं।
मैं अपने आप को थोड़ा अब कम अटैच करती हूं बच्चों से क्योंकि मैं खुद बहुत परेशान हो जाती थी। बच्चों को पढाना बहुत बड़ी जिम्मेदारी भरा काम है। आप जब तक उसे दिल से नहीं पढायेगा वह तबतक आप से जुड़ नहीं सकता। मैं उनके साथ उनकी कवितायें याद करती हूं तभी वह भी जल्दी याद कर पाते हैं। मैने रिजल्ट के बाद उन सब की एक छोटी सी पार्टी रखी थी उनके मम्मी के साथ। पार्टी तो सफल नहीं हुई क्योंकि दो बच्चों की मम्मी नहीं आई। बच्चों ने बहुत अच्छा प्रेजंटेशन भी उस पार्टी में दिया। मैने सबको बढ़िया सा गिफ्ट भी दिया।
मेरे साल भर के मेहनत पर किसी एक मां के मुंह से यह- धन्यवाद- शब्द का बोल भी नहीं निकला। जिस कारण मैं काफी व्यथित भी हुई। आफिसों में ऐसा होता होगा कि आप मन लगाकर काम करे और बॉस आपके काम की तारीफ भी ना करे। पर यह बिल्कुल व्यकि्तगत संबध है। जब टीचर आपको पढ़ाता है वह पूरी सिद्धत से आप तक अपनी बात पहुंचाने की कोशिश करता है। ना समय देखता है ना परिवार। सिर्फ और सिर्फ बेहतर रिजल्ट की उम्मीद रखता है। चूकि में पैसे तो लेती ही हूं इसलिए व्यवसायिक होने का दंड़ मुझे मिलेगा। तारीफ ना सही आप धन्यवाद जैसे शब्दों का इस्तमाल कर अपने को बेहतर और सामने वाले को प्रोत्साहित तो कर सकते हैं।
मजेदार घटना थी। स्कूल के रिजल्ट के दिन मैं और मेरे पति रिजल्ट लेकर निकल ही रहे थे कि प्रिंसपल पर नजर पड़ी, जो कामों मे उलझे हुए फीस की खीचातानी कर रहे थे। चूकि स्कूल में साइंस एग्जिविशन भी लगा हुआ था और सारे बच्चे अपने प्रयोग को रट कर माहिर हो चुके थे। बढिया लगा था वह आयोजन। मैने अपने पति से कहा कि प्रिंसपल को थोड़ा धन्यवाद दे दूं। हमलोग पंद्रह मिनट खड़े रहे और हमारी बारी आ ही नहीं रही थी। और आफिस जाने के चक्कर में देर हो रही थी इसलिए निकल आए। बाहर खड़े हो कर सोचने लगे कि अब क्या करें। फिर मन में आया नहीं ये बुजुर्ग इंसान जो इतनी मेहनत कर रहें हैं हमारे बच्चों के ही खातिर उनंहे धन्यवाद देना बहुत जरुरी है। हमदोनो फिर घुसे और उनके काम को बीच में बाधित कर सारे लोगों के सामने उन्हें धन्यवाद दिया। मैं भी अपने शब्दों में कुछ बोली। कुल मिलाकर माहोल बड़ा आंदित हो गया। सर ने खड़े हो कर हमारा सम्मान लिया। और हमदोनों को बल्कि सारे लोगों को यह बहुत अच्छा लगा।
मैं इतनी मेहनत अपने बच्चों के प्रति सिर्फ और सिर्फ इसलिए करती हूं कि मुझे अपने बचपन की पढ़ाई मे जिन दिक्कतों का सामना उम्र भर करना पड़ा वह मैं उन्हे नहीं होने देना चाहती।
बेटियों के ब्लॉग से अपने मन की भड़ास कह पाने का जरिया बहुत बढिया है।
पुनीता
अर्थ दे (धरती दिवस) और कोशी
शनिवार की शाम उसने घर की मोमबत्तियां खोजीं, निकालीं, साफ़ की और एक घंटा बिजली न जलाने के लिए तय्यार हो गई। हम सब भी इसके लिए तैयार हो गए। शायद ध्यान न भी देते, मगर चूंकि कोशी ने कह रखा था, इसलिए उसकी बात न मानना बच्चे का दिल दुखाना होता। इसलिए भी हम सभी तैयार हो गए। मुझे इस बात की तसल्ली रही की उसके भीतर पर्यावरण को लेकर एक चिंता है। उसकी यह चिंता दीवाली के समय भी दिखी थी, जब उसने पटाखे आदि छुडाने से साफ़ मना कर दिया यह कहते हुए की यह ग्लोबल वार्मिंग को और भी बढाता है।
वह रात को आठ बजे अपने दोस्तों से मिलाने जाती है। जब वह लौटी, तब हमने उसे छेदा की तुम तो नीचे लाईट में खेल रही होगी, जब की हम सब अंधेरे में बेठे रहे॥ उसने तुंरत जवाब दिया की वह एक घंटे अपनी दोस्त झिमली के घर अँधेरा करके खेल रहे थे। मुझे इस बात का संतोष हुआ की उसने केवल कहने के लिए सभी को नहीं कहा, बल्कि ख़ुद भी उस पर अमल किया। हम सभी के लिए यह बड़ा ही दुखद रहा की हमारे सभी घरों में बत्तियां जलती रहीं। हम सोचने लगे की हम केवल मांग करते रहते हैं। समाज, सरकार, व्यवस्था पर सवाल खरे करते रहते हैं। उन्हें भला-बुरा कहते हैं। मगर जब ख़ुद से कुछ कराने की बारी आती है, तब स्वेच्छा से कुछ भी नही करना पसंद करते। किसी ने कहा की बिलालों को चाहिए था था की वे पूरी बिल्डिंग की ही लाईट काट देते एक घंटे के लिए। यह करना मुश्किल नहीं था। बिल्डिंग की सोसाइटी चाहती तो यह काम कर सकती थी। मगर यह तो एक निजी अपील थी सभी से एक स्वेच्छया सहयोग देने की बात थी। क्यों हम अपने मन से कुछ भी सहयोग देने से पीछे रह जाते है? मुझे याद है, १९६५ में पाकिस्तान से युद्ध के बाद जब देश पर खाद्यान का संकट आया था और अमेरिका ने गेहूं के निर्यात पर शर्तें रखी थीं, तब हमारे उस समय के प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने अपील की थी की सभी देश वासी सोमावार्र को एक शाम भोजन स्वेच्छा से त्याग दें.इससे जितनी बचत होगी, उतने में हमारे देश से अनाज का संकट ताल जायेगा। हम तब बहुत छोटे थे, मगर स्कूलों तक में यह बात प्रचारित की गई थी। सभी ने एक शाम का भोजन त्यागा था।
आज वह सेवा भाव, वह स्वेच्छा से त्याग कहाँ गम हो गया है? मुझे खुशी है की कोशी, जो अब नई पीढी का प्रतिनिधित्व कर रही है, सामाजिक, वैश्विक, पर्यावारानीय चिंता से जुडी है और अपना योगदान यथा शक्ति कर रही है। आइये, ऐसे बच्चों का साथ दें, उनकी चिन्ताओं से ही कम से कम जुडें, अगर अपनी चिंता में हम सामाजिक सरोकार को शामिल नहीं कर पाते हैः.
आज मेरी तोषी का जन्म दिन है। यकीन नहीं होता की वह इतनी बड़ी हो गई है। केवल बड़ी ही नहीं, बेहद समझदार भी। उतनी ही संवेदनशील, उतनी ही सबके प्रति फिक्रमंद। अभी उसने अपने अनुभव के वितान को बड़ा करना चाहा है। इसके लिए उसने मुम्बई की एक आर्ट गैलरी ज्वायन की है। उसके अनुभव में इजाफा हो रहा है। अब वह स्वतन्त्र रूप से दुनिया को देखनेसमझाने, पहचानने की कोशिश में है। मुझे पूरा यकीन है की वह अपनी ख़ास जगह बना लेगी और ज़ल्दी ही। उसके जन्म दिन पर उसके लिए एक तोहफा-
जिस दिन तुमको ना देखूं मैं
मन जोर कहीं से कसकता है,
तेरी मुस्काती सूरत से
मन बहुत-बहुत ही हरासता है।
तुम अपनी बातों के गुच्छे से
खुशबू खूब बिखेरती हो
हो गई हो अब तुम बहुत बड़ी
पर फ़िर भी लगता नन्ही हो,
जैसे बरखा की धारा में
बून्दीन कोई मेंही हो
मेरे जीवन की रचना प्रथम
मेरी साँसों का तुम आधार
तुमसे पाई खुशियाँ सब
तुम ही अब जीवन अब संसार
छूटा है बहुत कुछ पाने में
छूटेगा बहुत कुछ पाने में
तुम साथ रहोगी, बनोगी बल
अफसोस न होगा जाने में
उनकी प्रतिमा, मेरी परछाईं
तेरा तो जीवन आगे है
थाम लो सूरज-चन्दा, तारे
बस तेरे लिए सब जागे हैं।






