मुझे याद है वो दिन जब पहली बार
पंचमी को हमने अपने से अलग किया था, जब उसका नाम स्कूल में दर्ज़ किया गया था...और पंचमी अपने नये यूनीफ़ार्म,नये स्कूल बैग,नये पानी की बोतल,और नये टिफ़िन बॉक्स के साथ स्कूल गई थी हम भी थे उसका हौसला बढ़ाने वालों में ...पहले दिन सारे मम्मी पापा अपने बच्चों के साथ स्कूल पहँचे थे..स्कूल की टीचरें उन बच्चों के साथ कुछ गाने वाने गा रहीं थी और खेलते कूदते मन बहलाते हुए हमारी बिटिया को हमसे दूर ले जा रही थी......
तनुजा(मेरी पत्नी) की तो आँख भर आई थी...उसका मन रो रहा था,चेहरा देखकर लग रहा था कि अपनी भावनाओं को दबाने की कोशिश कर रही है...यही हाल कमोबेश वहाँ सभी माँ बाप का था, खासकर जितनी मम्मियाँ थीं सबके सब रोये जा रही थी .... साड़ी के पल्लू या रूमाल से अपने चेहरे को छुपाने की कोशिश भी कर रहीं थी..मैं भी कुछ पल के लिये भावुक हो गया था और ऐसे मौके पर हमारी बिटिया पंचमी हमें छोड़ते हुए एक्दम रो नहीं रही थी उलटा वो खुश थी,उसे नये दोस्त,नई टीचरों के बीच अच्छा लग रहा था, बहुत खुश थी पंचमी....और हम सोचे जा रहे थे कि नये महौल में पंचमी रह तो लेगी? हमें कुछ देर छोड़ने पर उदास तो नहीं हो जाएगी...रोने तो नहीं लगेगी....हम तो अभी यही सोच रहे थे........ये सब देखकर मैं अपनी स्कूली यादों में खो गया,अपने स्कूल की खुशबू आज भी मेरी सांसों मे रची बसी है... .....जब मैं छोटा था तो अपने बड़े भाई की क्लास से अक्सर ढूंढ्कर मुझे मेरे क्लास में पहुँचाया जाता था........थोड़ा और बड़ा हुआ तो अक्सर मेरा बड़ा भाई मेरी क्लास में मुझे देखने चला आता था....मैं पूछता
"क्यौ आये हो" तो बताता कि
"मैं देखने आया था कि कोई तुम्हें परेशान तो नहीं कर रहा?" ......पर यहाँ तो पंचमी का कोई बड़ा भाई या बहन भी तो नही है..... हमने तो अपने दिन हँसते खेलते गुज़ार दिये...पर अपनी बेटी पंचमी को अपनी क्लास में जाते हम पहली बार देख रहे थे, .... अब अपने स्कूल की वजह से पंचमी हमसे अलग होने वाली थी...अरे कुछ समय के लिये लिये ही सही...स्कूल के बाद तो हम उसे घर तो ले ही आएंगे...फिर भी उसका स्कूल में एडमिशन हमारी ज़िन्दगी में एक महत्वपूर्ण घटना तो थी ही...पढ़ते बढ़ते क्लास दर क्लास अब वो छ्ठी में पहुँच गई...और अभी उसकी छ्ठी की परीक्षा समाप्त हुई है,और उसकी छुट्टियाँ चल रही हैं,मैं तो अपनी ऑफ़िस के कार्यकलापों की वजह से पंचमी को ज़्यादा समय दे ही नहीं पाता.....सारा बोझ पत्नी को झेलना पड़ा... पंचमी की परीक्षा हो और तनाव तनुजा को हो, पंचमी को पढ़ते देख और रटते देख मुझे उस दया आती है......सोचता... मैने ही पढ़ के क्या कर लिया?...पंचमी को देखकर ये साफ़ लग जाता है कि पढ़ाई में उसे मज़ा बिल्कुल नहीं मिल रहा .. पर इधर मैने एक नई बात नोट की पंचमी के बारे में "मैं बोर हो रही हूँ"...उसका तकिया कलाम होता जा रहा है।

पंचमी गोआ के रास्ते में कहीं
बोर हो रही हूँ...पता नहीं ये शब्द मेरी बेटी पंचमी के हैं या इस उम्र के सारे बच्चों का?....आजकल के बच्चे कार्टून नेटवर्क,पोगो या किसी चैनल पर चल रहे रीयलिटी शो,या घर में चल रही कोई भी फ़िल्म में तो बोर नहीं होते, ..पर इससे लग किसी भी जगह वो बोर होते हैं......इतवार को पंचमी की साईकिल, जिसकी हवा काफ़ी दिनों से निकली हुई थी...ठीक करवाया..थोड़ी देर चलाने के बाद फिर वही "बोर हो रही हूँ"........आखिर पूरे घर में एक ही तो बेटी है ...पर उसकी बोरियत को मैं कम से कम दूर नहीं कर पा रहा...असहाय महसूस कर रहा हूँ...

पंचमी
मेरे एक मित्र हैं परमानन्द मिश्र... वो हमेशा कहते हैं ....
"बिमल बाबू एक और कै लेते तो का हुई जात?
पंचमी पर कितना अन्याय कर रहे हैं आप लोग,अगर घर में अकेली रहेगी तो बोर तो होवे करेगी?.....
आप कुछ नहीं कर सकते।
अरे उसके साथ भी कोई खेलने वाला/वाली चाहिये?अब मिश्रा जी को क्या बताएं कि पंचमी का खिलौना तो अब हम ला भी नहीं सकते....ये हमारा फ़ैसला है..
तो मिश्राजी कहते हैं कि
"कल को आपको कुछ हो हवा गया तो वो काम लड़की थोड़े ही करेगी"....मैने कहा तब की तब देखेंगे, पर अभी क्या किया जाय.....पंचमी की परीक्षा खत्म होते ही हम घूमने गोआ गए थे....कुछ समय मस्ती में काट कर हम वापस मुम्बई आ गए और फिर से पंचमी का...स्थाई स्वर "मैं बोर हो रही हूँ" सुन कर बड़ा अजीब सा लगता है..

पंचमी की कटहल के साथ एक तस्वीर
पंचमी भी तेज़ी से बढ़ रही हैं,खेलना,डांस करना ज़्यादा पसन्द है उसे.....पर अब एक मई को रिज़ल्ट आने वाला है....उसे तो धुकधुकी भी नहीं हो रही कि रिज़ल्ट आने वाला है..और हम माँ बाप उसके रिज़ल्ट को लेकर परेशान हैं....कैसे नम्बर आएंगे? रिज़ल्ट देने वाले दिन ,स्कूल में अभिभावकों को बुलाकर हाथ में रिज़ल्ट दिया जाता है,वहाँ ये बताया जाता है कि बच्चा कहां कहां कमज़ोर है....किन बातों का ध्यान रखें....पता नहीं बड़ी होकर क्या करेगी पंचमी....पर हम जो बड़े हो गये हैं उनका तो जीना दूभर हो गया है.... हमने तो कभी सोचा नहीं कि बड़े होकर क्या करेंगे?
तो पंचमी के बारे में इतनी चिन्ता करने की क्या ज़रूरत है?