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तिन्नी का तमाचा

बच्चे अपने बचपन में मां बाप की खूब पिटाई करते हैं। मरता क्या न करता इस पिटाई पर अपमानित होने के बजाए भावुक हो जाता है। सुबह सुबह तिन्नी बाज़ार जाने के लिए ज़िद करने लगी। मुझे भी कुछ ख़रीदना है। अंडा ब्रेड के साथ उसने सेंटर फ्रेश और मेन्टोस भी खरीदे। घर आकर सोचता रहा कि सेंटर फ्रेश खाने की आदत कहां से पड़ गई। तभी तिन्नी आई और कस कर एक तमाचा रसीद कर दिया। इससे पहले कि झुंझलाहट पितृतुल्य वात्सल्य में बदलती तिन्नी ने ही ज़ाहिर कर दिया। देखा बाबा मेन्टोस खाते ही मैं किसी को भी तमाचा मार सकती हूं। मेन्टोस में शक्ति है। ज़रूर ये विज्ञापन का असर होगा। विज्ञापन में शक्ति प्राप्त करने की ऐसी महत्वकांक्षा तिन्नी में भर दी कि ख़मियाज़ा मुझे उठाना पड़ा।

2 comments:

सतीश पंचम said...

सचमुच विज्ञापनों ने बच्चों पर बहुत खराब असर डाला है,साथ ही सिरियल्स जैसे पावर रेंजर वगैरह ने तो बच्चों में हिंसा ही भरी है।

अमित पुरोहित said...

शुक्र मानिए रविश भाई कि तमाचा रसीद कर वह कृष की तरह दीवारें फांदती उड़ नही गई, वरना बिटिया को पकड़ने के लिए बाबा इस उम्र में क्या खाते कि हाथ पचासों फिट लंबा हो पाता. मेरी अभी शादी नही हुई इसलिए बिटिया तो नही हैं लेकिन १३ बरस की एक प्यारी सी बहन हैं जिसका पसंदीदा जुमला हैं 'टेंशन नही लेने का भाई!', और यह भाई हैं कि इस पंचमार्क पर भी टेंशन ले बैठा हैं.....जाने भी दो पंचम भाई !