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श्रावणी को सुर कहें या सुरु

श्रावणी का अभी घर का कोई नाम नहीं रखा है। “बउआ-बउआ” से काम चल रहा है। मुक्‍ता अड़ी है कि “सुर” रखेंगे। कभी-कभी पुकारती भी है। लेकिन इसमें लिंग की दिक्‍कत है। सुर पुल्लिंग है। ग़ुलाम अली जब एक कंसर्ट में दिल में एक लहर सी उठी है अभी गा रहे थे, तो थोड़ा गड़बड़ा गये। उन्‍होंने गाने के बीच में बोला, सारा सुर ग़लत हो गया। बाबूजी भी मुक्‍ता को सुधारते रहते रहते हैं। मुक्‍ता उछल कर श्रावणी की कोई बात बताने बाबूजी के पास जाती है। बाबूजी, बाबूजी... कंबल तो पांव से फेंक ही देती है, मोटा-सा रजाई भी फेंक देती है। बाबूजी मंद मंद मुस्‍कराते हुए बोलते हैं, मोटा रजाई नहीं फेंकती होगी, मोटी रजाई फेंकती होगी। मैं भी मुक्‍ता से कहता हूं, हिंदी का चक्‍कर छोड़ो, बेटी से भोजपुरी में बतियाया करो। वो कहती है- बतियाएंगे। लेकिन उसकी ऐसी हिंदी घर में अनवरत चलती रहती है। मैं बेटी को बहलाने के लिए फिल्‍मी गाने से काम चला लेता हूं। रोती है तो सहगल चुप करा देते हैं - सो जा राजकुमारी सो जा।



बाकी मेरी मैथिली जिंदाबाद। स्‍त्रीलिंग-पुल्लिंग का कोई लफड़ा नहीं। गोद में लेकर “छुनुआ बेटी गइ, सोनुआ बेटी गइ” बोलते रहते हैं।

अभी जाड़ा है। श्रावणी कपड़ों से पैक रहती है। गर्मी होती तो अब तक पलटी मार देती। अभी आंधी की तरह पांव फेंक कर काम चलाती है। अंगूठा चूसने की कोशिश कर रही है। मुक्‍ता रोमांचित होकर उसका अंगूठा मुंह के भीतर डालने लगती है। पर बाबूजी गुरु गंभीर होकर बोलते हैं - जीवन को उसके सहज प्रवाह में रहने दो। अपनी तरफ से उसे मोड़ने की कोशिश मत करो।

6 comments:

ajay brahmatmaj said...

सुर सही है.बिटिया आप दोनों की सुर है.मुक्ता की इच्छा का सम्मान हो.सुर के साथा हो आप दोनों का जीवन दूना.

आशीष महर्षि said...

श्रावणी भी बुरा नाम है अविनाश जी,

Priyankar said...

सुर कहिए . सुरु तो अपने आप हो जाना है,लाड़ में.

अजित वडनेरकर said...

घरू नामों में अन्याक्षर में अगर मात्रा न हो तो बेवजह एक मात्रा बढ़ाने की प्रवृत्ति मनुश्य में होती है। आप कोशिश करके सुर बोल लेंगे मगर जब चिल्लाकर उसे पुकारा जाएगा तो आखिरी र लोप हो जाएगा। मजबूरी में सुरू ही बुलाना पड़ेगा। ऊ स्वर र को मजबूती देगा। यह तो महज़ विश्लेषण था।
मेरी राय इन दोनों से हटकर श्रावणी में समाए एक तीसरे ही प्यारे नाम को अपनाने की है जिसे मैं बतौर ऐ चाचा श्रावणी को दे भी चुका हूं। वह नाम है - बानी। श्रावणी की सारी मधुरता बानी में सुरक्षित है और इसकी अलग अर्थवत्ता भी है। बांग्ला में यूं भी श्रावणी सरबानी हो जाता है। तो चुपचाप पीछे के दो अक्षर उठाकर हम खिसकते हैं। आप आगे के दो अक्षरों पर और चिंतन करिये।

अजित वडनेरकर said...

कृपया अन्त्याक्षर पढ़ें।

रीतेश said...

मेरा वोट सुर के पक्ष में है.
जब भाभी जी ने कह दिया है तो आप हथियार डाल ही दीजिए.