अनंत तस्‍वीरें दृश्‍यावलियां ख़बर ब्‍लॉग्‍स

उग आती हैं बेटियाँ

बोए जाते हैं बेटे
उग आती हैं बेटियाँ

खाद-पानी बेटों में
पर लहलहाती हैं बेटियाँ

एवरेस्ट पर ठेले जाते हैं बेटे
पर चढ़ जाती हैं बेटियाँ

रुलाते हैं बेटे
और रोती हैं बेटियाँ

कई तरह से गिराते हैं बेटे
पर सम्भाल लेती हैं बेटियाँ


बेटियों पर बात करने से पहले मेरी तरफ से यह कविता पेश है। यह मशहूर कविता नन्द किशोर हटवाल की है। हालाँकि कई जगह पोस्टर के रूप में यह कविता मिलती है लेकिन उसमें कवि का नाम नदारद रहता है। नन्द किशोर हटवाल चमोली जिले में राजकीय इंटर कॉलेज में शिक्षक हैं। सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय रहते हैं। वे उत्तराखण्ड साहित्य कला परिषद से भी जुड़े रहे हैं।

(इस पोस्‍ट में इस्‍तेमाल की गयी तस्‍वीर सना ख़ान की है। सना, नासिरुद्दीन हैदर खान (जिन्‍हें हम कब्‍बूभाई के नाम से संबोधित करते हैं) और कहकशाँ की बेटी हैं और ये तस्‍वीर उसके पैदा होने के थोड़े दिनों बाद की है: अविनाश)

8 comments:

आशीष महर्षि said...

इस शानदार शुरुआत के लिए आप सभी लोगों को बोल हल्‍ला समूह की ओर हार्दिक बधाईयां

sunita (shanoo) said...

बहुत अच्छी शुरूआत है...कविता भी अच्छी है मगर इस बात का मलाल हमेशा से रहता है जिस कवि द्वारा कविता लिखी जाती है कई बार उसका नाम तक नही होता...

Mired Mirage said...

हमारे मन की बातों को आवाज देने के लिए धन्यवाद । हमारी बच्चियों की ओर से भी हमारा धन्यवाद । आशा है यह ब्लॉग वहुत से लोगों को जागृत करे ।
शुभकामनाओं सहित
घुघूती बासूती

Sanjeet Tripathi said...

बहुत ही बढ़िया कविता और इस ब्लॉग के लिए तो साधुवाद !!!
एक बेटा हूं मै लेकिन फिर भी मुझे लगता है कि बेटियां मां-बाप के लिए ज्यादा बेहतर साबित होती हैं

harsh said...

Dil ko chhu lene wali hai ye kawita aur blog dono. Bilkul sach, abhi meri shadi nahi hui, magar hone par bhagwan se ek beti hone ki bhi dua karungan.
Dhanyawad, betiyon ke blog ki team ko.

सांस्कृतिक प्रतिरोध said...

बहुत खूब!!! बेटियों का ब्लॉग बनाने के लिए आप सब को हार्दिक बधाई।
बस अब देखना यह है कि बार-बार हाशिये पर भेज दी जाने वाली बेटियों का यह ब्लॉग भी किनारे न कर दिया जाय।
ढ़ेरों शुभकामनाऐं !!!!!!!!
www.sanskritikpratirodh.blogspot.com/

Parul said...

sukhad shuruaat...yahan aanaa hameshaa accha lagegaa....shubhkaamnaaye

Saudamini said...

Seedhe dhang se baat kehna accha hota hai...lekin itna seedha?! Na betiyon ko na hi beton ko itna generalize kiya jaana chahiye...
na bete giratein hai...na betiyan! Kuch insaan giraate hain...

gender pe kavitaon ke baajay agar insaano pe kavitaein likhi jaaye to behtar hoga.