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छादी नहीं शादी


दो-तीन रोज़ पहले अशोकनगर गया था. बात हुई थी गुडिया से. उसके साथ बाज़ार जाना था. वहां आजकल एक साथ कई काम हो रहे हैं जैसे कि अन्य शादी-ब्याह वाले घरों में. चुने-पोचारे से लेकर दीवार की पाइटिंग-प्लास्टर तक, काम जारी है. कुछ चीज़ें बिल्कुल नयी लगायी/सजायी जा रही हैं. मेहमानों को जो आना है! गुडिया तैयार थी. हम निकलने ही वाले थे कि नज़र बिस्तर पर पड़े गुलाबी लिफ़ाफ़े पर पड़ी. गुडि़या ने बताया 'गीता जीजी की शादी का कार्ड है, कल ही शाम को आया है.' खोल कर देखा. पहली पंक्ति के बाद ज्यों-ज्यों नीचे बढती गयी, मन कसैला होता गया. अंत तो करैले के रस समान ही लगा.

'मेरी मौछी की छादी में जुलुल-जुलुल आना'


ये गुजारीश किलकारी की तरफ़ से थी.

चलते हुए चन्द्रा से फ़ोन पर तय हो गया था विश्वविद्यालय मेट्रो स्टेशन पर मिलना. कमलानगर से खरीदारी निबटा कर हम तिमारपुर आ गए. मैं थोड़ी देर में किलकारी को क्रेश से ले आया. आते वक्त रास्ते में उससे बातचीत होती रही. उसे भी मालूम है कि उसके गीता मौसी की शादी है. मैंने जब दोहरा-तिहरा कर कहा छादी है न आपकी मौसी की तो उसने कहा, 'छादी नहीं शादी'. हां, जरूर स्पष्ट नहीं बोल पा रही थी वो. पर तय है वो जो भी बोल रही थी वो जुलुल या जुलूल नहीं था.
अबोध बच्चों की तरफ़ से ऐसे संदेश हमेशा से अटपटा लगता रहा है. आपको नहीं लगता कि नादानियों की शोकेसिंग करने चला ये समाज दरअसल किसी और दिशा में निकल पड़ा है?
बहरहाल, किलकारी इस शादी को लेकर बहुत ख़ुश है और बेताब भी. जितनी बार उसके ननिहाल से फ़ोन आता है और वो तैयारियों के बारे में सुनती है, उसकी बेताबी उतने गुना बढ जाती है. पांच-छह दिन पहले कोर्ट से आते ही चन्द्रा ने बताया कि गीता और मेरी सासु मां के साथ वो भी गयी थी चांदनी चौक गीता के लिए साडियों की ख़रीदारी करने. सुनते ही किलकारी ने कहा, 'मेरे को भी ड्रेस दिला दो. अच्छा वाला दिलाना.' अदा के साथ गर्दन झटकते हुए और मुंह से एक अजीब से चूं की आवाज़ निकालते हुए कहती है, 'कारी तो डांस करेगी गीता मौसी की शादी में बापु के साथ, मम्मी आप करोगे न?'

2 comments:

सुभाष said...

बहुत अच्छा लगता है बच्चों की वो तोतली बोली में बच्चों के साथ बात करना, हमको हमेशा उनका उत्त्साहवर्धन करना चाहिए.

Harsha Prasad said...

meri bhi ek beti hai aur ek beta bhi hai jo in pratikriyaayon par hanste hain. Koi dushkarm agar duniyaa mein kisi beti ke saath hota hai, wo utna hi ghinauna hai jitna agar kisi bete ke saath ho, jo ki aaye din hum padhte hain. Aaj ke samay mein please is tarah ke blogs ko support karke aur discrimination mat paida kijiye. IFPA jisne award vaghairah diye hain unka agenda main khoob jaanta hoon. Unki working maine bahut qareeb se dekhi hai, isliye unke award ki duhaayee mat deejiye. Hum sabhee acchi tarah se jaante hain ke duniyaa hamaari betiyon aur beton ke liye samaan ho chuki hai. Jo aaj bhi betiyon pe huye atyachaar par rote hain, unhone khud apni betiyon ki parvarish mein kotaahi baratee hai aur uska muaafzaa bhar rahe hain.