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एक बेटी की डायरी

अविनाश जी
एक बेटी हूं और एक बेटी की मां भी। कल रात मैंने बेटियों के ब्‍लॉग में थोड़ी सी जगह मांगी थी। आशा थी कि जगह मिल जाएगी। ब्लाग देखा, तो मेरी पोस्ट नहीं थी। थोड़ी निराशा हुई है। लगता है, शायद आपको मेरा मेल नहीं मिला है। इसलिए मेल फिर से भेज रही हूं।
पुनीता कुमारी


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क्या बेटियां परायी होती हैं?

मेरी शादी के आठ साल के दौरान दूसरी बार आज मेरे पापा मुझसे मिलने आये थे। पापा से मिली, तो मन हुआ, उनके हाथों को छू लूं। मगर... यह फासला 12 घंटे में भी तय नहीं हो पाया। अभी-अभी वे हरिद्वार के लिए रवाना हो चुके हैं और मेरा मन भरा हुआ है। लगता है अंदर से कुछ बह रहा। क्या बह रहा है? नहीं जानती हूं मैं। मन को खुश करने के लिए यादों को संजो रही हूं।

मेरे पापा टाटा स्टील में इंजीनियर हैं। उनके आंगन में पहले मेरी दीदी उगी। फिर मेरा नंबर आया। मेरे जन्म के ठीक सात साल बाद घर के आंगन में फिर से एक बेटी उग आयी। मेरी छोटी बहन के जन्म पर मेरे पापा ने पूरे मुहल्ले और रिश्तेदारों के घर यह कह कर मिठाइंयां बांटी कि उन्हें बेटा हुआ। जब रिश्तेदार व पड़ोसी मां के अस्पताल से लौटने पर कथित बेटे को देखने पहुंचे तो वहां बेटी को देखकर खूब हैरान-परेशान हुए। पर, पड़ोसियों व रिश्तेदारों को उल्लू बनाकर मेरे पापा बिंदास खुश थे।

मुझे याद है, जब मेरे पापा ने मुझे बिजनेस करने के लिए पांच लाख रुपये दे दिये। बिजनेस नहीं चला। पर, मेरे पापा ने इसके लिए मुझे कोई ताना नहीं दिया। मैंने जब अपने पसंद के लड़के से शादी की बात बतायी, तो भी उनकी हां मेरे हिस्से में आया।

याद करतीं हूं कि हरेक रविवार को कैसे मेरे पापा नाखून काट दिया करते थे। दूऱ घुमाने ले जाते और आते वक्त मैं उनकी पीठ पर सो जाती थी। मगर, आज मैं इतनी बड़ी हो गयी हूं कि उनका हाथ बढ़ कर छू नहीं पायी। पापा भी मेरी भावनाएं समझ नहीं पाये। पैर छूने के लिए झुकी, तो दूर हटकर आशीर्वाद दे दिया। लेकिन मुझे गले से नहीं लगाया। क्या बेटियां सचमुच परायी होती है?

14 comments:

अजित वडनेरकर said...

पुनीता , बेटिया पराई नहीं होती । पराया तो दुनिया में कुछ नहीं है। किसी नतीजे पर पहुंचिये, आपके पापा किसी विशिष्ट मनःस्थिति में रहे होंगे। खुलकर उनसे ही पूछिये जो आपके मन में है। वो यकीनन यही कहेंगे कि अरे, ऐसा कुछ नहीं था।

अजित वडनेरकर said...

नतीजे पर न पहुंचिये पढ़ें।

Mired Mirage said...

यह बच्चों के मामले में अपना पराया कुछ नहीं होता । मेरे खयाल से माता पिता कि परिभाषा ही यह होती है कि जो बच्चों की खुशी में खुश वे होते हैं माता पिता ।
घुघूती बासूती

दिनेशराय द्विवेदी said...

आप सोचिए, कभी पापा पराए हुए? नहीं। तो बेटी कैसे?

mamta said...

पुनीता जी आपको यकीनन इस बात से दुःख हुआ होगा पर इस बात को दिल से नही लगाना चाहिऐ।

रचना said...

कुछ प्रश्न
माँ अगर पुत्र को गले लगा कर भाव विह्वल हो सकती है तो पिता क्यो नहीं ?
पुत्र से अग्नि दाह कराके स्वर्ग मिलता है , पुत्री का कन्यादान करके स्वर्ग मिलता हैं क्यो ?
दामाद के पेर छुये जाते है , पुत्र वधु से पेर छुयाए जाते है ?
फिर भी आप सब कहते है पुत्री परायी नहीं , चलो मान लेते हैं ?

आशीष महर्षि said...

अब तो खुश हैं ना आप, और हां बेटियां कब से पराई होने लगी

अजित वडनेरकर said...

मुहावरों से भाषा में लालित्य पैदा होता है, कथन के कई आयाम सामने आते हैं। इतनी लंबी बहस की ज़रूरत नहीं। सचमुच बेटियां पराई नहीं होतीं। विवाहोपरांत अपना स्वतंत्र संसार बसाने की ललक सभी में होती है। पुत्र भी ऐसा करता है। सामाजिक रीति-नीति के तहत बेटी का बहु के रूप में एक नए घर से रिश्ता बनता है इसलिए बेटी तो पराय धन जैसी कहावत बनी। सचमुच पराया जैसा भाव ढूंढना हो तो पूरी दुनिया के सामने भारतीय माता-पिता को रुसवा कर दीजिए और अपनी इस भावुक जिद को मत छोड़िये।
किसने कहा कि बेटियों को पिता गले नहीं लगाते। मुमकिन है कुछ लोग किन्हीं सस्कारों की वजह से ऐसा न करते हों । या (हो सकता है)शास्त्रों में उल्लेख हो और वे उसका पालन कर रहे हों। बावजूद इसके अपने-पराए की पहचान आंखों में झांककर भी तो की जा सकती है। अपना अलग संसार बसाने की चाह में घर छोड़ने वाली बेटियों की तुलना में माँ-बाप के पराए व्यवहार की वजह से घर छोड़ने वाली बेटियों का कोई आंकड़ा हो सकता है समाजशास्त्रियों के पास हो। मगर मुझे लगता है कि पराएपन वाली बात में सिर्फ भावुकता ही है , हकीकत नहीं।

anuradha srivastav said...

पढ कर अफसोस हुआ ...... आप अभी तक उन्हें समझ नहीं पायी। जिस तरह आप संकोच कर के रह गयी उसी रह वो भी।

Anonymous said...

e¡gxs f[kykSus ns u ldk eSa ;s esjh ykpkjh gS
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vrqy vtuch

Pravin said...

Didi jee - aapana paraya kutch nahi mahaj aapki manh:sthithi hai. Chachajee hamesa se hum sabo ke liye prerana punj rahe hai aur hamesa adarsh ashthapit kiye hia - aur sambhavtah ise karan woh bhale andar se aapke mathe pe haath rakhana bhi chahate ho par rakhe nahi - paraye to beta hota hai shaadi ke baad :)

sanjay said...

Betiyan kabhi parai nahi hoti hai. Aapki Vyatha padh kar man dravit hua. Mera Vyaktigat anubhav yeh hai ki riste kabhi paraye nahi hote. Papa ke aagman par aapne sirph bachpan ke dino ko yaad kiya. Bachapan ke dino me wo nakhuno ko katna, door tak sath me ghumne jana, papa ke pith par hi so jana etc., esme papa ka apni beti ke prati pyar ke sath-sath ek chhoti si bachchi ke prati pyar bhi samil tha. Aaj paristhitiyan badal gai, bachpan chhut gaya par wo papa ka apni beti ke prati pyar wilkul bhi kam nahi hua. Main Vyaktigat taur par ye manta hun ki beti ki shadi ke baad papa ka beti ke prati pyar/lagaw kai guna jyada badh jaata hai, jaise mano wo ek nadi se samundra men pariwartit ho gaya ho. Ise sirph papa ka hriday hi samajh sakta hai.Main phir kahunga ki pyar ka sidha sambandh aatma se hota hai. Aaj yadi aap punah pita-putri ke pyar ka ahsas chahti hain to aap apni aakhen band karen aur aatma ki sune. Main dawa karta hun ki aap punah khud ko usase jyada karib payengi jitna ki aap bachapan me thi basarte ki aap aatma ki sun saken. Yadi kuchh galat kah gaya to chhama chahunga kyonki main na to lekhak hun aur na hi likhne ka koi anubhav hai. Bas main to ek sipahi type hun.

sunita....................s.......smile said...

punita ji aap bilkul aisa na sochiye..mai bhi aap hee ke tarah socha kartee thee...betiyan paraye nahi hotee...waran parayee karna padta hai unko...per dil me to apne hi hotee hain na..hamaree sanskriti hee aise hai ki betiyon ko paraye ghar bhejna padta hai..per dil se to paraya nahi kiya jata...hume to jeevan me do jagah apnapan milta hai...

Anonymous said...

punit... apne scha kaha ki betiya prai ho jate hi. bl samay kuch mere sath bhi ho raha hi. mery kuch din bad sadi hone wali es samay mery ghar mai mery aesi aobhgat ho rahi hi jaise ki mai koi mehaman ho. jo kuch din ke liye hi aya hi.