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एक बेटी की मां का हलफनामा

मैं छह साल की बेटी की मां हूं और दूसरे की उम्मीद से हूं। पूरे आठ महीने गुजर चुके हैं और अब कभी भी मैं मातृत्व सुख ले सकती हूं। आठ महीनों के दौरान मन में उठे हर हलचल को ईमानदारीपू्र्वक दर्ज कर रही हूं, वैसे यह बिल्कुल निजी अनुभव है।

मेरा जीवन बहुत ही मजे से चल रहा था। मैं अपनी बेटी पर सारी खुशियां लुटा रही थी। तभी, कहीं से आहट हुई किसी के आने की। आहट बिल्कुल अपनी थी इसलिए उसे नजरअंदाज कर पाना असंभव सा जान पड़ रहा था। डाक्टरनी ने बड़े प्यार से मुझे समझाया कि तुम अपनी बेटी की खातिर ही इस बच्चे को जन्म दो। मैं अपने पति और बिटिया के बीच किसी तीसरे को बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं करती हूं इसलिए मुझे इस बच्चे को अपनाने में दो से तीन महीने लग गए। और पूरा समय मैं खुद को और अपनी बिटिया को समझाते हुए गुजारी कि यह तुम्हारा बच्चा है। तुम्हें ही इसका ख्याल रखना है और तुम्हें ही उसे प्यार करना है क्योंकि मैं और पापा ने तो सारा का सारा प्यार तुम्हें दे दिया है। और उसके लिए कुछ बचा ही नहीं है. वह शायद यह बात समझ रही है और जब भी मैं औऱ श्रुति बातें करती हैं तो वह खुद ही बच्चे की जिक्र छेड़ती है। मेरे खाने का जिसमें फल हो, टॉफी हो और दवा का पूरा ध्यान रखती है। मेरे बहाने टॉफी खाती है क्योंकि बाबू को मन कर रहा होगा टॉफी खाने का। वह धीरे धीरे समझ रही है। उसकी समझदारी दिन प्रतिदिन बढ़ रही है जो मुझे हमेशा खलती है कि वो मेरी छोटी सी बेटी सयानी हो रही है। शायद समय से पहले। मां (दादी) ने कहा है कि अब श्रुति मेरे साथ ही सोयेगी। पर ये कैसे संभव है - आप समझ सकते हैं कि जो बच्चा पूरे छह साल साथ सोया हो वो मां को कैसे अलग कर सकता है।

यह बहुत कठिन दौर होता है एक मां बाप के लिए। शायद बेटा होता तो मैं दादी के पास सोने दे भी देती या फिर वह खुद ही चला जाता। पर श्रुति मेरे साथ ही सोयेगी चाहे नया बाबू दादी के साथ सोये। दूसरे बच्चे के अस्तित्व को स्वीकारना बहुत ही मुश्किल होता है।

मुझे बेटा या बेटी किसकी चाहत है?

गुजरे आठ महीनों में मैं अपने आप को तैयार करती आई कि बेटी होने पर मैं कितना खुश हूंगी और बेटा होने पर कितना। पैमाना ना होने के कारण मैं बता नहीं पाऊंगी पर फिर एक बार ईमानदारीपू्र्ण कोशिश रहेगी खुद की अदालत में अपने को पेश करने की।

बेटी मुझे क्यों चाहिए-

1. बेटी मुझे इसलिए चाहिए क्योंकि शायद मैं बेटा नहीं पैदा कर पाऊं.

2. बेटी अच्छी होती है, दिल के करीब होती है. मां को ज्यादा समझती है.

3. मैं एक बेटी हूं और बेटियों को समझती हूं.



बेटा मुझे क्यों चाहिए-

1. बेटा - बेटा मुझे नहीं चाहिए.

ये पलायनवादी नीति के तहत मैं नहीं लिख रहीं हूं. सचमुच मुझे बेटा नहीं चाहिए.

मैं यह अच्छी तरह जानती हूं कि बेटा मुझे जन्म के समय ही दो पल की खुशी देगा और फिर ताउम्र ....

उन सारे लोगों से माफी मांगते हुए अपनी बात को आगे बढाऊंगी जिनके सिर्फ बेटे हैं. ( कोई भी इस बेटा, बेटी की चाहत को दिल से ना ले। बस ये सिर्फ भावना है एक गर्भवती महिला की या फिर बेटा ना हो पाने का डर। ये आपकी अपनी समझ पर निर्भर करता हैं। )

एक औऱत अपने कोख को साबित करने के लिए ही सिर्फ और सिर्फ बेटा पैदा करना चाहती है।

मेरी श्रुति जब होने वाली थी तो मैंने बेटे की चाहत में नौ महीने बिताए। मुझे बेटा ही होगा ऐसा ही मेरा विश्वास था। और जब डाक्टर ने मुझे बताया कि मुझे बेटी हुई है तो एक पल, सच सिर्फ एक पल, के लिए मैं दंग रह गई थी। अपने को संभाला और फिर उस पल के बाद मुझे कभी बेटी होने का गम नहीं हुआ.

पर मैं कभी भी उस पल के लिए अपने आप को माफ नहीं कर पाती हूं। मुझे खुद से लज्जा होती है कि मैने जाने अनजाने बेटे को महत्व दिया। अपनी बेटी को एक पल के लिए भुला दिया।

प्रेगनेंट वुमन को एडवाइजरों की कमी नहीं होती. सभी एड़वाइस देते रहते हैं औऱ कुछ खास औरतें उस वुमन पर पैनी निगाह भी रखती हैं। जैसे वह क्या खाना ज्यादा पसंद करती है - खट्टा या मीठा। शरीर में फुर्ती है कि नहीं, पेट के साइज पर भी बड़े आसानी से वह दावा करती हैं कि बेटा होगा या बेटी। वैसे लोगों की नजरों से मैं भी यदा कदा गुजर ही जाती हूं और मुझे सांत्वना मिल ही गई है कि मुझे बेटा होगा। नो डाउट मैं भी कुछ दिनों के लिए खुश हो गई कि चलो बेटा हो जाए तो गंगा नहा लूं। पर ये क्या मैं तो डिसाइड़ ही नहीं कर पाती कि क्या होने से मैं ज्यादा खुश होऊंगी। क्योंकि मैं यही चाहती हूं कि मुझे बेटा हो या बेटी जो भी हो वो मेरी श्रुति की ही तरह हो।

12 comments:

आशीष said...

इस पोस्‍ट पर मैं क्‍या टिप्‍पणी दूं, कुछ समझ में नहीं आ रहा है

Anonymous said...

आप बेटी चाहती हैं, सुनकर अच्छा लगा लेकिन बेटा नहीं चाहतीं?

कहीं आपको बेटा हुआ तो? उसे पूरा प्यार नहीं दे पायेंगी?

सचमुच, हतप्रभ हूं

इस दुनिया में पुरुषों के लिये कोई जगह नहीं होनी चाहिये

वो बुरे हैं
दमनकारी हैं
युद्ध पुरुषों की देन है
नशा, जुआ, आदी सभी कामों में पुरुष मुख्यत: पुरुष ही हैं

थू है पुरुषों पर

वो लोग जो

अपनी सारी ज़िंदगी सुबह आठ से रात आठ किसी बड़े व्यवसायी की फैक्ट्री में घिसे जाते हैं कि अपने बच्चों को बड़े स्कूल में पढ़ा सकें

पुरुष नहीं होते

वो बाप जो गलती करने पर अपने बच्चों को डांटता या मार भी देता था, और बाद में घंटो ग्लानि सहता था

पुरुष नहीं हो सकता

वो बेटा जिसने अपने पिता को परिवार के लिये पिसते देखा, और अब इसलिये पैसे जोड़ता है कि वो छुट्टियां बिताने वहां जा सकें जहां जवानी में न जा सके

पुरुष नहीं होगा

वो भाई जिसने बहन की शादी के लिये कर्ज लिया, और फिर बरसों उसे उतारने में बिता दिये

पुरुष नहीं था

पुरुष मतलब दमनकारी, स्वार्थी, बुरा

क्योंकि आपने कहा है न, बेटा मां के करीब नहीं होता

इसका बेटा नहीं, उसका बेटा नहीं, तेरा नहीं मेरा नहीं

बस बेटा, मतलब हर बेटा

सिर्फ इसलिये क्योंकि वो पुरुष है

क्या कभी कोई अच्छा 'आदमी' देखा नहीं आपने?

Anonymous said...

आप बेटे की कामना न करके बेटी की कामना कर रहीं हैं.
कुछ लोग बेटी की कामना न करके बेटे की कामना करते हैं.

उनमें और आप में फर्क ही क्या है?
बस अपनी अपनी चाहत ही का तो फर्क है!
फिर वे बुरे क्यों कहलाते हैं?

mamta said...

बेटा हो या बेटी इस बारे मे अधिक परेशान होने की जरुरत नही है। बस आप खुशी से, खुले दिल से आने वाले बच्चे का स्वागत कीजिये।
हमेशा दूसरा बच्चा आने पर पहला बच्चा समय से पहले ही बड़ा हो जाता है।

masijeevi said...

क्‍या 'प्रगतिशीलता' है...वाह।

अपने स्‍वास्‍‍थय का भरपूर ख्‍याल रखें।

Mired Mirage said...

पुनीता जी, इन सब चिन्ताओं में ना पड़ें । बेटी,बेटा जो भी हो स्वस्थ हो ।
२ बेटियाँ,२ बेटे,१ बेटी १ बेटा इन सभी कॉम्बिनेशन्स के अपने अपने लाभ हैं । और अकेले बच्चे को एक अपना बहन भाई मिल जाए तो सबसे बढ़िया रहता है ।
बेटा बेटी कोई भिन्डी बैंगन तो हैं नहीं कि हम चुनकर लाएँ । हमारे अपने हैं, हमें सदा जिलाए रखेंगें, क्योंकि वे हमारे अंश हैं परन्तु साथ साथ उनकी अपनी पहचान है ।
मेरा सुझाव तो होगा बिटिया को अभी से अलग सुलाना शुरू कीजिये। हो सके तो दादी के साथ भी नहीं। यह उसके अपने विकास के लिए बेहतर होगा । बच्ची को अपने बढ़ते पेट का हवाला देकर अलग सुलाएँगीं तो कल जब अनिवार्यतः ऐसा करना पड़ेगा और उसे जो बुरा लगेगा वह नहीं लगेगा । आप जो भी करें उसमें यदि जरा भी अपराधबोध दिखाएँगीं तो बच्ची उसे महसूस कर लेगी ।
मैं दो बेटियों (बड़ी व विवाहित )की माँ हूँ और अपने दो बच्चों के निर्णय से बहुत खुश हूँ । बहुत बार वे स्वयं कहती हैं कि या तो बच्चे ना पैदा करो, करो तो दो। नहीं तो एक बच्चा कितना अकेला रह जाएगा ।
आपको एक और स्वस्थ बच्चे की माँ बनने की कामना सहित,
घुघूती बासूती

while said...

Aapka halafnaama padhke mehsoos hua ki aap khud hi confused hai, ya ye sweekar nahi karna chahti ki aapka jhukaav bete ki taraf kuch to hai. Purush aur stree dono ke bina ye duniya adhuri hai. Santaan ke roop me dono hona achhi baat hai. par ye jyada zaroori hai ki dono sanskaarit ho. Buri nari se achha purush achha hota hai aur bure purush se achhi nari achhi. chahe beta ho ya beti aap pakshpaat nahi kar sakte. Do bete ya do betiya hona bhi kuchh adhurapan deta hai. Shayad ek hona jyada achha ho. Ek se jyada bete hone se maa-baap ke prati (hamare indian samaj ko dekhte hue)maa baap ke prati jimmedariyo me kami dekhne ko milti hai. Humara samaj hame rishto se apeksha rakhna sikhata hai jo ki ek se adhik me me batne se nishchit hi thik nahi rahta. Lekin mujhe lagta hai (shayad galat ho par....) ki do betiya hona do bete hone se jyada achha hai. Betiya aakhir samvedansheel hoti hai, rishto ki jimmedariyo ko behtar dhang se samjhti hai. Ye hamaare yahi nahi balki pure vishw ke sabhi samaajo me dekha jaa sakta hai. Kai samaj aise bhi hai jahaan mahilaao ko jyada adhikaar hai jaise Meghalaya - waha bhi mahilaao ko jyada jimmedaar dekha ja sakta hai. Hamesha maine is vishay par khoob vichar kiya hai aur bahut kuch likhna bhi chaha hai aaj mauka mila. Is baare me koi comment ya discussion karna chahe to mujhe khushi hogi.

शंकर आर्य said...

बाप लोगों के बस से बाहर है|
इस दुनिया को केवल माँ ही समझ और बचा सकती है|
कुछ विरले बाप "महसूस कर सकता था, छू सकता न था" की सीड़ी तक पहुँच सके हैं|
अभी बहुत लंबा सफर तय करना बाकी है|

anuradha srivastav said...

मातृत्व सुख को चाहत की बेडियों में ना जकडें । क्या होगा? क्या चाहती हैं? ये महत्वपूर्ण नहीं है पुनीता जी। महत्वपूर्ण है बच्चे का स्वस्थ्य होना -शारीरिक और मानसिक दोनों स्तर पर।

Anonymous said...

madam...aapke khayal bilkul ache nahi he....aap beti kehkar logo ki santavna batorna chahti hain..lekin aapki beti ka pita aur aapka pati bhi to kisi ka beta hi he...agar unki maa bhi aap jaisa soch leti to aapka..aapki bachchi shruti ka...aur aapke hone wale bachche ka kya hota...aur aapko bhi kya apne pita ka prem nahi mila...aur agar mila he to wo bhi kisi ke bete rahe honge, ye dhan rakhen.....

swapandarshi said...

जो भी बच्चा हो स्वस्थ हो, और आप स्वस्थ रहे.
मेरे भी दो लडके है, और अब लडकी की चाह पूरी करने के लिये एक डाल खरीदने का ही सहारा है.....
मेने दोनो ही बार सिर्फ एक स्वस्थ बच्चे की कामना की, और अपने बच्चो के साथ खुश हू. दोनो बार लडके होने का दोष पति के सर मडती हू. Y chromosome वही se aayaa hai.
meraa teen saal ka bachcha alag hee sotaa hai. par agar but he knows where to find his mom or dad

aapke samast parivaar ko badhaayee.

पद्मनाभ मिश्र said...

पुनीता जी;

आपका टिप्पणी अपने ब्लोग पर देखा. मै फिर उपलब्ध हूँ अपने बकवास के साथ एक बार जरूर दर्शन देवेँ. दर्शन देने के लिए यहाँ क्लिक करेँ .